असंभव है मुलायम सिंह होना

रतिभान त्रिपाठी

वह जनसभा के लिए खड़े होते तो लाखों किसानों के चेहरे गर्व से खिल उठते थे। वह चल पड़ते तो हजारों युवाओं का हुजूम उमड़ता था। वह आवाज दें तो लाखों लोग हुंकार भरते थे। वह गैरबराबरी के खिलाफ एक बुलंद आवाज थे। वह मुलायम सिंह यादव थे। 

समाज हो, राजनीति हो या निजी जीवन, व्यक्तित्व बहुत मायने रखता है। मुलायम सिंह यादव समाज, राजनीति और निजी जीवन, तीनों में अलहदा थे। जब कभी भी उनकी समालोचना होगी, उनका व्यक्तित्व किंवदंती सरीखा आंका जाएगा। उन्होंने सामाजिक जीवन जिया तो गरीबो-पिछड़ों की आंखों का तारा बन गए, उनके लिए मसीहा रहे। राजनीतिक जीवन में उन्होंने आकाश पाताल एक कर दिया, राजनीति की धारा मोड़ दी। निजी जीवन में प्रेम और वात्सल्य के पर्याय रहे तो यारों के यार भी रहे। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि मुलायम सिंह यादव होना कठिन ही नहीं, असंभव है। 

राजधानी लखनऊ के पत्रकार, नेता, मंत्री, विधायक, सांसद मुलायम सिंह यादव को लेकर तरह-तरह की बातें, प्रसंग और अपनी-अपनी आत्मीयता के किस्से बताते रहे हैं। इन किस्सों-प्रसंगों में निंदा कम, बड़ाई ही बड़ाई हुआ करती है। बहुत कम लोग ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तिगत तौर पर मुलायम सिंह की निंदा की होगी। नेता तो उनसे लाभान्वित और उपकृत होते ही रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव इकलौते नेता हैं जिन्होंने पत्रकारों को निजी तौर पर सर्वाधिक लाभ पहुंचाया। राजनीति और पत्रकारिता के कुछ लोग इसकी अलग-अलग मीमांसा कर सकते हैं, यह उनके अपने विचार हैं लेकिन फिर भी वह उनका सम्मान करते ही हैं।

लखनऊ में पत्रकारिता करने मैं देर से पहुंचा लेकिन यहां के अधिकांश चलता-पुरजा पत्रकार साथी मुलायम सिंह यादव द्वारा किए गए उपकारों के किस्से चटखारे लेकर सुनाते रहे हैं। किस पत्रकार को मुलायम सिंह यादव ने किस किस तरह उपकृत किया, इसकी अनगिनत कहानियां सुनने को मिलती हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि वह पत्रकारों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय नेता रहे हैं। उनका व्यक्तित्व सदाशयता से परिपूर्ण रहा है।

सामाजिक रूप में और राजनीतिक रूप में भी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी भी दल का शायद ही कोई नेता हो जो मुलायम सिंह यादव से उपकृत न हो। उन तक जो भी पहुंचा, अपनी फरियाद सुनाई, मुलायम सिंह ने शायद ही उस पर अपनी कृपा न बरसाई हो। मुलायम सिंह यादव मौजूदा राजनीति के शायद इकलौते नेता थे जिनका सम्मान सभी दलों के नेताओं के मन में था। उन्होंने दोस्ती की तो जमकर और राजनीतिक दुश्मनी भी की तो जमकर। 
  
राजनीतिक जगत में नेताजी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव से मेरा परिचय एक पत्रकार के रूप में व्यक्तिगत रूप से 1997 में हुआ जब इलाहाबाद में श्याम वाटिका यानी उनकी पार्टी के उस समय नेता रहे श्यामाचरण गुप्त के फार्म-हाउस में समाजवादी पार्टी का प्रशिक्षण शिविर चल रहा था। 

यह मुलाकात समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे बाबू जवाहर सिंह यादव ने कराई थी। परिचय ऐसा हुआ कि काफी नजदीकी हो गई। उन दिनों मैं दैनिक जागरण का रिपोर्टर हुआ करता था। मुलायम सिंह यादव मंच पर नहीं, बल्कि प्रशिक्षणार्थियों के बीच बैठे थे। अपने एक कार्यकर्ता को उठाकर मुझे अपने बगल बैठाया और बहुत सारी बातें करते रहे। मैंने दैनिक जागरण में उनका इंटरव्यू भी छापा। फिर उनसे फोन पर कभी कभार बातें होने लगीं। मेरे लिए यह कम अचरज की बात नहीं कि नहीं कि उसके बाद से हर होली दिवाली पर वह मुझे खुद फोन करके बधाई दिया करते थे। मैं इलाहाबाद का पत्रकार और वह उत्तर प्रदेश के धुरंधर नेता लेकिन यह उनकी आत्मीयता और बड़प्पन का उदाहरण है।


बात सन 2001 की है। समाजवादी पार्टी उन दिनों सत्ता में पहुंचने को संघर्ष कर रही थी। मुलायम सिंह यादव के पास अमर सिंह जैसे रणनीतिकार भी थे। पार्टी ने एक हिडेन एजेंडा सेट किया था। वह किसी संस्था के मार्फत फिल्मी दुनिया के महानायक अमिताभ बच्चन को मंचों पर बुलाते थे। अमिताभ को देखने के लिए भीड़ इकट्ठी होती थी। इस मौके का फायदा उठाकर मुलायम सिंह यादव और दूसरे नेता समाजवादी पार्टी का संदेश जनता तक पहुंचा ले जाते थे। इसी कड़ी में 21 अक्टूबर 2001 को नगर निगम की ओर से अमिताभ बच्चन का अभिनंदन समारोह होना था। मुलायम सिंह 20 अक्टूबर को ही इलाहाबाद पहुंच गए थे। उन्होंने 20 अक्टूबर को शाम 4 बजे के करीब होटल कान्हा श्याम में एक प्रेस कांफ्रेंस रखी। इलाहाबाद के उस समय के मेयर डॉ केपी श्रीवास्तव और होटल के मालिक श्यामाचरण गुप्त भी प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद थे। प्रेस कांफ्रेंस के बाद चाय पीते समय नेताजी मेरे पास आए और कान में धीरे से कहा कि आप सर्किट हाउस आइए, आपसे बात करनी है। मैंने कहा, अभी तो ऑफिस जाकर खबरें लिखनी हैं अध्यक्ष जी, देर रात आता हूं। तो बोले रात हमारी पार्टी के नेता रहेंगे, बात नहीं हो पाएगी। आप सुबह 6 बजे आइए। मैंने उन्हें अपनी मजबूरी बताई कि अध्यक्ष जी मैं बहुत रात में घर पहुंचता हूं, इतनी जल्दी जगना थोड़ा मुश्किल है। तो वो बोले कि मुझे पता है पत्रकारों की दिनचर्या लेकिन कुछ भी करके आप जरूर आइए।
मैंने ऑफिस जाकर वहां के गार्ड को सहेजा कि भइया, सुबह साढ़े 5 बजे मेरे घर के नंबर पर घंटी मार देना। एक जगह जाना बहुत जरूरी है और आप जानते हो कि सबसे देरी से मैं ही ऑफिस से निकलता हूं। बहरहाल, सुबह गार्ड ने फोन करके जगाया। मैं कुर्ता पायजामा पहनकर सुबह-सुबह 6 बजे सर्किट हाउस पहुंच गया। वहां देखा कि कुछ नेता अपनी-अपनी फाइलें लिये टहल रहे थे। नेताजी से मिलने आए थे। उनमें से एक नेता राम मिलन यादव को मैं पहचानता था। मुझे नेताजी के कक्ष की ओर जाते देखकर वह बोले, तिरपाठी जी, तनी हम हूं क नेताजी से मिलवाय देत्या, हम हूं आपन बात उनसे कहि लेइत। मैंने राम मिलन जी को आश्वस्त किया कि मैं नेताजी को बता दूंगा कि आप मिलने आए हैं और अच्छे नेता हैं।
मैं जैसे ही नेता जी के कक्ष वाले दरवाजे पर पहुंचा तो वहां खड़े सिक्योरिटी वाले ने मेरा हाव-भाव देखकर सवाल किया- आप रतिभान त्रिपाठी जी हैं। मैंने हां में सिर हिलाया तो बोले आइए, साहब आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं। मैं अंदर दाखिल हुआ तो देखते ही नेताजी बोले, आइए आइए, क्या हाल चाल है। परिवार में कौन-कौन है, बच्चे किस क्लास में पढ़ रहे हैं आदि आदि..।
कुछ देर में नेताजी अपने एजेंडे पर आ गए, जिसलिए बुलाया था। आगे विधानसभा के चुनाव आने वाले थे। वह मेरी नज़रों से अपनी पार्टी के राजनीतिक हालात जानना चाहते थे। अपनी समझ भर मैंने इलाहाबाद मंडल की राजनीतिक गणित बताई। लगे हाथ यह भी कहा कि नेताजी इलाहाबाद, कौशांबी और प्रतापगढ़ के बारे में तो मैं ठीक से जानता हूं लेकिन फतेहपुर के बारे में मेरी जानकारी उतनी दुरुस्त नहीं है। हां, उसके बदले मैं चित्रकूट के बारे में ज्यादा सटीक बता सकता हूं, इसलिए कि वह मेरा जिला है। मैंने उन्हें बताया भी।
मेरे चुप होते ही नेताजी बोले, आप कर्वी से चुनाव क्यों नहीं लड़ जाते। हमें नए लोगों की जरूरत है। आप जवान हैं, पत्रकार हैं, आपकी छवि अच्छी है। समाजवादी पार्टी साफ सुथरे लोग तलाश भी रही है। मैं अवाक था..वह कहते जा रहे थे। जब चुप हुए तो मैंने विनम्र भाव से कहा, अध्यक्ष जी, मैं पत्रकार हूं और मुझे पत्रकारिता ही करनी है। मैं शायद राजनीति के लिए नहीं बना। राजनीति में बहुत पैसे लगते हैं। बड़े छल-प्रपंच होते हैं। कहां चुनाव-उनाव के चक्कर में डाल रहे हैं। आपकी भावना का स्वागत और सम्मान है। फिर कभी ऐसा अवसर आया तो राजनीति में जाने के दूसरे रास्ते भी हैं, भविष्य में देखा जाएगा।
मैं कुछ और कहता, नेताजी बोले, अच्छा ठीक है। मेरे कहने से आप एक और काम कर सकते हैं। मैंने कहा, आदेश कीजिए। तो बोले आपने जो इलाहाबाद वाली अपनी किताब मुझे दी थी, आज वो अमिताभ बच्चन को भेंट कीजिए। मैंने कहा, उस किताब की एक भी काॅपी मेरे पास नहीं बची है। तो बोले, यहां कहां मिलेगी। मैंने कहा एएच व्हीलर्स की दुकान में मिलती है लेकिन आज इतवार है, दुकान सिविल लाइंस में है। यहां आज बंदी का दिन है। तो बोले आप प्रेस गैलरी में समय से आकर बैठ जाइएगा। उसका नाम लिखिए, मैं कुछ इंतजाम करता हूं। मैंने कहा अध्यक्ष जी, समाजवादी पार्टी का मंच है। मैं पत्रकार हूं। ऐसा करना उचित रहेगा? सवाल सुनते ही नेताजी कुछ कड़क हुए। बोले आप भी हद करते हैं। नगर निगम अमिताभ जी का अभिनंदन कर रहा है। मैं भी अतिथि हूं, वह भी अतिथि हैं। इसमें समाजवादी पार्टी कहां है। आप कार्यक्रम में समय से आइएगा।
मैं संकोच में था लेकिन नेताजी की आत्मीयता देख उनकी बात टाल न सका। मैंने यह बात घर आकर बताई तो मेरी बेटी ने कहा, पापा मैं भी चलूंगी। मुझे भी अमिताभ बच्चन से मिलवा दीजिए। छोटी थी। उसकी जिद टाल न सका।
इलाहाबाद के सबसे बड़े ग्राउंड केपी काॅलेज में विशाल समारोह। भीड़ का पारावार नहीं। ग्राउंड खचाखच। जाने माने शायर और डायलाॅग राइटर जावेद अख़्तर समारोह के मंच का संचालन कर रहे थे। सुरेश वाडेकर गाना गा रहे थे–अंधेरी रातों में, सुनसान राहों पर..हर ज़ुल्म मिटाने को..बस एक मसीहा निकलता है, जिसे लोग शहंशाह कहते हैं…अरे दीवानों… मुझे पहचानो.. मैं हूं कौन..डाॅन..डाॅन..डाॅन.. आदि आदि। मंच पर मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, सलीम शेरवानी, सहारा के ओपी श्रीवास्तव, शहर के मेयर डॉ. केपी श्रीवास्तव..तभी अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की इंट्री होती है। सब कुछ फिल्मी अंदाज में। तालियों की गूंज और जावेद अख्तर की आवाज ही वहां सुनाई पड़ रही थी। माहौल कुछ शांत हुआ। थोड़ी देर बाद समाजवादी पार्टी के नेता विनोद चंद दुबे मेरे पास आए। बोले, नेताजी बुला रहे हैं आपको। धीरे से कान में बोले, बात क्या है? बात तो मुझे पता थी लेकिन मैंने उनसे यही कहा कि पता नहीं। बहरहाल विनोद जी के पीछे पीछे मैं मंच पर जा पहुंचा। साथ में बेटी स्मिता भी। विनोद जी ने नेताजी को बताया तो कुर्सी पर बैठे बैठे ही उन्होंने अपने पीछे की रो वाली कुर्सी पर बैठ जाने के लिए मुझे इशारा किया। मैं बैठ गया। बेटी पास में खड़ी ही रही। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस समारोह में उस समय के इलाहाबाद के चहेते और तिलिस्मी स्टार अमिताभ बच्चन हों, वहां क्या मंच क्या मैदान.. भीड़ ठसाठस होगी ही।
कुछ देर बाद मुलायम सिंह यादव के भाषण की बारी आई। नेताजी भीड़ देख गदगद थे, झूमकर बोले। भाषण खत्म करके मेरे पास आए। फिर कसकर हाथ पकड़ा और पीछे से ही अमिताभ बच्चन जी के पास ले गए। उनसे बोले, बच्चन जी, ये रतिभान त्रिपाठी हैं। इन्होंने इलाहाबाद पर बहुत अच्छी किताब लिखी है। आपके बारे में लिखा है। आपके पिताजी का जिक्र किया है। आपको अपनी किताब भेंट करने आए हैं। मैंने देखा कि नेताजी के तत्कालीन सहायक शिवकुमार जो पाॅलिथीन में लपेटकर किताब लिये खड़े थे, फौरन निकाली। मैंने वह किताब अमिताभ बच्चन को भेंट की। मंच पर जया जी भी थीं। पति-पत्नी दोनों ने बड़े भाव से किताब ग्रहण की और पढ़ने का आश्वासन भी दिया।

लेखक रतिभान त्रिपाठी मुलायम सिंह यादव से मिलते हुए


यह किस्सा बयान करने का मेरा भाव यह कि मुलायम सिंह यादव अलबेले नेता थे। कहां मैं एक अदना सा पत्रकार, वह भी इलाहाबाद में, लखनऊ में भी नहीं कि मैं उनसे रोज रोज मिलता होऊं तो वह मुझे इस तरह ओब्लाइज़ करना चाहें। मैं तो दैनिक जागरण में रिपोर्टर ही था, वह तो उस अखबार के मालिकों को भली भांति जानते थे लेकिन उनकी आत्मीयता, पसंदगी का एक नमूना है। आप अंदाजा लगाइए कि मेरी किताब मंगवाने के लिए नेताजी ने क्या क्या उपाय नहीं किए होंगे। अपनी पार्टी के किसी नेता को फोन किया होगा। रविवार को सुबह सुबह एएच व्हीलर्स की दुकान खोलवाई होगी। किसी की खातिर ऐसी ज़हमत वही मोल ले सकता है जिसे वह दिल से पसंद करता हो और लाखों के मज़मे में उसका मान बढ़ाना चाहता हो। इतने बड़े दिल के नेता थे मुलायम सिंह यादव।
बात यहीं खत्म नहीं होती। समारोह के बाद अनेक अतिथि श्यामाचरण गुप्त के घर दोपहर के भोजन पर आमंत्रित थे। गुप्त जी मुझे व्यक्तिगत तौर पर पसंद करते थे। उन्होंने भोजन पर मुझे भी बुला रखा था। भोजन परोसा जा रहा था। मुलायम सिंह यादव और श्यामाचरण गुप्त अगल-बगल बैठे थे। तब तक नेताजी की नजर मुझ पर पड़ी तो श्यामाचरण जी का हाथ ठोंककर मेरी ओर इशारा करते हुए बोले, आप लोग इन्हें समझाते क्यों नहीं। मैंने आज सुबह इनसे कुछ कहा है और ये मेरी बात ही नहीं मान रहे। नेताजी की बात सुन श्यामाचरण गुप्त और पूर्व विधायक विजय मिश्र मेरे पास आए। बोले क्या बात है जो आप नेताजी का कहा नहीं सुन रहे हैं। मैंने श्यामाचरण जी को बताया कि कर्वी से चुनाव लड़ाने को कह रहे हैं। मेरे लिए यह कहां संभव है। श्यामाचरण जी बोले तो क्या ग़लत है। रुपए पैसे की चिंता न कीजिए। हम लोग तो हैं ही। लेकिन मुझे चुनाव तो लड़ना नहीं था। लक्ष्य पत्रकारिता ही था लेकिन नेताजी मेरे लिए अपने हृदय में कितनी सदाशयता रखते थे, यह एक छोटा सा उदाहरण है। उनसे जुड़े अनेक किस्से मेरे ज़ेहन में हैं। चाहें इलाहाबाद के पत्रकारों के लिए दूसरी पत्रकार काॅलोनी दिलाने के प्रयास से संबंधित हो या 2007 के अर्धकुंभ मेले में साधु-संतों की नाराज़गी दूर करने में सलाह लेने की बात हो। ऐसे किस्से फिर कभी….।

मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाते लेखक रतिभान त्रिपाठी


मुलायम सिंह यादव अबकी बार जब अस्पताल में भर्ती हुए तो पता नहीं क्यों, मन में बहुत खिन्नता का अनुभव हो रहा था। ऐसे लग रहा था, जैसे कुछ अपशकुन होने वाला हो। वह हो ही गया। आज सुबह करीब नौ बजे जब उनके निधन की खबर आई तो बहुत खेद हुआ।
उत्तर प्रदेश के लाखों गरीबों, किसानों, पिछड़ों और मजलूमों की आवाज बुलंद करने वाले, पिछड़ों के असल नेता मुलायम सिंह यादव भले ही आज इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके कार्य, उनकी कर्त्तव्यपरायणता, उनकी कीर्ति और राजनीति की नई लकीर खींचने का अंदाज़ इतिहास में सदा किया जाएगा। इन्हीं चंद शब्दों के साथ कीर्तिशेष नेताजी को मैं अपने श्रद्धासुमन अर्पित करता हूं।

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