भारत चीन सीमा विवाद में अमरीका , जापान और आस्ट्रेलिया ने क्वाड का पेंच फँसाया

सेना के लद्दाख़ में चीनी तैयारियों की पूर्व सूचना क्यों नहीं थी?

                                               शिव कांत, बीबीसी हिंदी रेडियो के पूर्व सम्पादक, लंदन से 

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चीन के पंद्रह जून के हमले के बारे में भारत के विदेश मंत्रियों के बीच वीडियो बैठक हो चुकी है। दोनों देशों के सैनिक कमांडरों के बीच तीन बार बातचीत हो चुकी है। लेकिन चीन न तो गलवान घाटी से अपने मोर्चे पूरी तरह हटाने को तैयार है और न ही अपने घाती हमले का कोई स्पष्टीकरण देने को तैयार है जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख में भारतीय सेना के मोर्चों का दौरा करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे चीन की घुसपैंठ को बर्दाशत नहीं करेंगे। जवाब में चीन ने सिनजियांग में अपनी सेना के युद्धाभ्यास का वीडियो जारी करके अपनी सैनिक शक्ति का नमूना दिखाने की कोशिश की है। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना और लड़ाई के साज़ो-सामान का जमाव करते जा रहे हैं।

भारत का कहना है कि उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात सेना को हालात बिगड़ने पर अपने हथियारों का प्रयोग करने की छूट दे दी है। सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए भारत और चीन के बीच 1993, 1996 और 2005 के समझौतों के तहत यह तय हुआ था कि सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त लगाते समय विरोधी सेना के सामने आने पर हथियार नहीं चलाएँगे। लेकिन पंद्रह जून को काँटेदार तारों से लैस छड़ों और लाठियों से हमला करके चीनी सेना ने इस समझौते का उल्लंघन किया और उसके लिए माफ़ी माँगने को भी तैयार नहीं है। उल्टा भारत को कोसते हुए चीन उसपर शांति समझौते को तोड़ने की एकतरफ़ा कोशिश करने का आरोप लगाता है। अमरीका और यूरोप के कूटनयिक प्रेक्षकों को चिंता है कि चीन के हमले और भारत के के हथियारों के प्रयोग की छूट देने के फ़ैसले के बाद सीमा पर ख़ूनी झड़प होने का ख़तरा बढ़ गया है।

अचानक ऐसा क्या हो गया? 

सवाल उठता है कि अचानक ऐसा क्या हो गया है कि चीन दशकों से चले आ रहे समझौते को तोड़ कर भारत से झगड़ा मोल लेना चाहता है। इसका पहला कारण तो यही है कि समझौते निभाने के मामले में चीन कभी भरोसे का देश नहीं रहा है। अपने हितों के लिए बयान और नीतियाँ बदलना और समझौते तोड़ना उस की फ़ितरत में है। चीन ने अपनी स्थापना से लेकर 1962 की लड़ाई तक के 13 बरसों में भारत के साथ अपनी सीमा को लेकर इतनी बार अपने बयान और नीतियाँ बदली हैं कि सिर घूमने लगता है। दूसरा कारण चीन की यह धारणा है कि भारत कोविड-19 महामारी और अमरीका के साथ चल रहे व्यापार-युद्ध के कारण कमज़ोर हुई चीन की स्थिति का फ़ायदा उठा कर चीन पर हावी होना चाहता है। चीन में यह धारणा भी है कि भारत अमरीका के इशारे पर जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन की घेराबंदी कर रहा है।

तीसरा और सबसे अहम कारण यह है कि कोविड-19 महामारी और अमरीका के साथ चले व्यापार युद्ध की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था ऐसे बिंदु पर पहुँच चुकी है वह भारी बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष का कारण बन सकती है। शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी बैल्ट एंड रोड़ या BRI योजना में हज़ारों करोड़ डॉलर डूब चुके हैं। सरकारी बैंकों और कंपनियों पर कर्ज़ का बोझ इतना बढ़ गया है कि वे दिवालिया हो सकती हैं। ऐसे हालात में चीन चाह कर भी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए उतनी बड़ी रकम ख़र्च नहीं कर सकता जितनी बड़ी उसने 2008 वित्तीय संकट से उबारने के लिए की थी। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधान मंत्री केविन रड ने अपने एक लेख में लिखा है कि चीन इस समय आर्थिक संकट के दोराहे पर है। या तो उसे वे आर्थिक सुधार करने होंगे जिन्हें वह जन-असंतोष के डर से पिछले छह वर्षों से टालता आया है। या फिर उसे आर्थिक संकट का जोखिम उठाना होगा। लोगों का ध्यान इस समस्या से हटाने के लिए चीन ने चारों तरफ़ मोर्चे खोल लिए हैं।

चीन की पुरानी योजना 

भारत की तरफ़ का मोर्चा उसकी बरसों से चली आ रही योजना का हिस्सा भी है। लड़ाई से पहले सितंबर 1962 तक भारत की सेना लद्दाख के दक्षिण में पड़ने वाली पैंगोंग झील पर स्थित खुर्नाक किले से लेकर उत्तर में कराकोरम दर्रे तक गश्त लगाती थी। पैंगोंग झील की आठों पहाड़ियाँ, कोंका दर्रा, पूरी गलवान घाटी और डैपसैंग के मैदान भारत में थे। लड़ाई में चीनी सेना पैंगोंग झील के एल मोड़ पर पड़ने वाली पहाड़ी संख्या चार और गलवान घाटी पार करके श्योक नदी के पास तक आ गई थी। लेकिन युद्ध विराम के बाद, युद्ध से पहले वाली सीमा पर लौट गई। चीन की तभी से यह योजना रही है कि बिना लड़ाई लड़े धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए उस सीमा तक पहुँच जाए जहाँ वह लड़ाई के दौरान पहुँचा था और वापिस हटा था। भारत का कहना है कि लड़ाई से पहले की सीमा ही वास्तविक नियंत्रण रेखा है। दोनों देशों के बीच यह भी तय हुआ था कि उस नियंत्रण रेखा के बीस-बीस किलोमीटर के दायरे में कोई पक्ष स्थाई सैनिक अड्डा नहीं बनाएगा।

मुश्किल यह है कि इन दोनों रेखाओं में कुछ जगहों पर पचास किलोमीटर तक का फ़ासला है। यही वजह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कोई समझौता नहीं हो सका। भारत की वाजपेई सरकार ने 2003 में तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था। उसके बाद से चीन ने नियंत्रण रेखा पर बातचीत करना छोड़कर वहाँ शांति बनाए रखने के बारे में बातचीत करना शुरू कर दिया। लेकिन शांति के इस झाँसे के पीछे चीन की असली रणनीति वही रही। बिना लड़ाई लड़े, धीरे-धीरे इलाके को हड़पते हुए उस सीमा तक पहुँच जाना जहाँ से उसे युद्धविराम के बाद लौटना पड़ा था। लद्दाख के हड़कंपी तापमान और दुर्गम पहाड़ी भूगोल ने भी चीन के इस छलपूर्ण इरादे को पूरा करने में मदद की। निर्जन, ठंडा और दुर्गम इलाका होने के कारण लद्दाख की सीमा पर भारत और चीन केवल पैट्रोल चौकियाँ कायम रखते थे। सेना लगातार तैनात नहीं रहती थी।

 

भारत – चीन सीमा पर झड़प और विकल्प

चीनी हमला सुनियोजित 

इसी का फ़ायदा उठाते हुए चीन ने पहले नियंत्रण रेखा से अपनी तरफ़ पड़ने वाले बीस किलोमीटर के क्षेत्र में सड़कें और पक्के मोर्चे बनाना शुरू किया और जहाँ-जहाँ मौक़ा मिला, वहाँ तक घुस आए जो भारत के विचार में, नियंत्रण रेखा के पार पड़ने वाला भारत का क्षेत्र था। पिछले साल उन्होंने पैंगोंग झील पर यही किया और पहाड़ी पाँच और चार के बीच कई पक्के मोर्चे, निगरानी टावर, हैलीपैड और नौका स्टेशन बना लिया। उसके बाद हॉट स्प्रिंग और गलावान घाटी में यही हुआ। गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार लद्दाख में रहने वाले चरवाहों ने भी चीनी सेना के धीरे-धीरे घुस आने और चरवाहों को रोके जाने की शिकायतें की हैं। भारत की सेना को गश्त करने से रोका जाने लगा जिसकी वजह से झड़पें होने लगीं और गलवान नदी के मोड़ पर पड़ने वाली भारत की पैट्रोल चौकी के पास वह घातक हमला हुआ जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। अमरीका की जासूसी एजेंसियों का कहना है कि यह हमला सुनियोजित था और इसका आदेश चीनी पश्चिमी कमान के प्रमुख जनरल जाओ जोंगची ने दिया था।

भारतीय सेना को चीन की तैयारियों की सूचना क्यों नहीं थी? 

अमरीका और यूरोप के अख़बारों में छपे लेखों में यह सवाल भी उठाया गया है कि भारतीय सेना को चीन के इस घाती हमले की तैयारियों की भनक क्यों नहीं थी? जासूसी संस्थाओं और टोही उपग्रहों के ज़रिए चीन के सैनिकों के जमाव और आक्रामक इरादों की पूर्व सूचना होती तो भारतीय सैनिक बराबर की संख्या में जाकर हमले का मुँहतोड़ जवाब दे सकते थे। यह सही है कि भारत के पास चीन जितने टोही उपग्रह नहीं हैं। लेकिन क्या भारत को अमरीका, रूस और नेटो संगठन के टोही उपग्रहों से चीनी इरादों की पूर्व सूचना मिल सकती थी? पंद्रह जून की झड़प तो हाथापाई की झड़प थी। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना के बड़े जमाव के बाद होने वाली झड़पें और गंभीर हो सकती है और ऐसी परिस्थितियों में चीनी सेना के इरादों की पूर्व सूचना न होना बहुत भारी पड़ सकता है।

अमरीका क्या चाहता है? 

पूर्व सूचना दो ही रास्तों से मिल सकती है। या तो भारतीय सेना अपने जासूसी तंत्र को मुस्तैद बनाए या फिर रूस या अमरीका के उपग्रहों से चीनी सेना की गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद ले। अमरीका और यूरोप के देश भारत जैसे लोकतंत्र को आँखें दिखाने की तानाशाही चीन की हिमाकत से नाराज़ हैं। इसलिए वे कूटनीति और सैनिक साज़ो-सामान से भी मदद करने को तैयार हैं। लेकिन वे चाहते हैं कि भारत चीन पर स्थाई रूप से अंकुश लगाने की अमरीका और मित्र देशों की कोशिशों में शामिल हो। इसके लिए अमरीका ने क्वाड नामक संगठन की रूपरेखा भी रखी है जिसमें अमरीका और भारत के साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमरीका के सामरिक गठबंधन की तरह सामरिक गठबंधन में बदला जा सकता है। या फिर नेटो की तरह का कोई नया गठबंधन भी तैयार किया जा सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अपनी निर्गुट और बहुध्रुवीय नीति को छोड़ कर अमरीका के सामरिक गुट में शामिल होना चाहेगा? क्या उसे ऐसा करना चाहिए? क्या ऐसा करने से चीन और असुरक्षित और नाराज़ नहीं होगा? जहाँ तक चीन की बात है। तो चीनी विशेषज्ञों की राय तो यही है कि चीन, भारत को लेकर यह धारणा पहले ही बना चुका है कि भारत अब अमरीका के गुट में है। भारत के निर्गुट रहने से चीन के व्यवहार में कोई अंतर नहीं आने वाला। उल्टा उसका एक सरदर्द कम हो जाएगा। रही भारत के निर्गुट रहने और विश्व में अपनी अलग जगह बनाने की बात। तो पिछले सत्तर सालों में निर्गुट रहकर भारत ने ऐसा कौन सा तीर मार लिया है जो लोकतांत्रिक देशों के सामरिक गुट में रहकर नहीं मार पाएगा। चीन के बहकावे में आकर नेपाल तक तो भारत के ख़िलाफ़ खड़ा होने को तैयार है। 62 और 71 की लड़ाइयों के बाद संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर नज़र डाल कर देखें तो पता चलेगा कि कितने निर्गुट देश भारत के समर्थन में खड़े हुए थे।

सोवियत बनाम अमरीकी – यूरोपीय हथियार 

चीन जैसी विस्तारवादी तानाशाही और छल-छद्म के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक देशों के मोर्चे में शामिल होना देश के क़द को छोटा नहीं बल्कि बड़ा ही करता है। सेना विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि भारत को सोवियत विमानों और हथियारों की बजाए अमरीकी और यूरोपीय विमानों और हथियारों को ख़रीदना चाहिए जो चीन के लिए भारी पड़ सकते हैं। सोवियत संघ ने अपने विमानों और हथियारों से आज तक कोई उल्लेखनीय जंग नहीं जीती है। ऊपर से चीन की प्रतिरक्षा तकनीक कई मामलों में सोवियत संघ जैसी ही है। इसलिए उसका मुकाबला अमरीका और यूरोप की बेहतर तकनीक से करना चाहिए न कि सोवियत तकनीक से। अमरीकी तकनीक की वजह से ही इस्राइल अपने अरब पड़ोसियों पर हमेशा से हावी रहा है। मुश्किल यह है कि भारत के प्रतिरक्षा और कूटनीति पर अभी तक वह सोवियत रंग चढ़ा हुआ है जो हर परीक्षा में कच्चा निकला है।

कोरोना ने अब लातीनी अमरीका को दबोचा 

बाकी दुनिया की बात करें तो कोविड-19 की महामारी ने अब लातीनी अमरीका को दबोच लिया है। यूरोप से भी ज़्यादा कोविड-19 के केस अब लातीनी अमरीका में हैं। ब्रज़ील, मैक्सिको, चिली, पेरू और अर्जेंटीना सभी बेहद बुरे दौर में हैं। अमरीका के भी 50 में से 36 राज्यों में कोविड-19 के केस बढ़ रहे हैं। पिछले हफ़्ते तीन दिन कोविड-19 के नए केसों की संख्या 50 हज़ार से अधिक थी। अमरीका में कोविड-19 के रोगियों की संख्या तीस लाख पार कर गई है और मरने वालों की संख्या 1,30,000. दूसरा स्थान ब्रज़ील का है जहाँ 16 लाख से ज़्यादा लोग बीमार हैं और 65 हज़ार की मौत हो चुकी है। रूस को पीछे छोड़ कर कोविड केसों की संख्या की दृष्टि से भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर आ पहुँचा है। सबसे बड़ी चिंता की ख़बर यह है कि दुनिया के लगभग 240 वैज्ञानिकों ने लंबे शोध के बाद दावा किया है कि कोविड-19 महामारी हवा से भी फैल सकती है। उनका कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन महामारी फैलने के ख़तरे को कम करके आँक रहा है। वे संगठन को ज्ञापन देने वाले हैं। यदि यह बात सही है तो मास्क लगाना अनिवार्य करना होगा।

लंदन में पब खुलने से भीड़ और चहल-पहल

लंदन में पीने के बाद सावधानी  हवा 

अच्छी बात यह है कि साढ़े तीन से चार महीनों के लॉकडाउन के बाद यूरोप में जनजीवन खुल रहा है। होटल, शराबखाने, रेस्तराँ, जिम और क्लब खुल गए हैं। लोगों से मास्क पहनने और आपस में थोड़ी बनाए रखने को कहा जा रहा है। लेकिन सप्ताहांत के दौरान लोगों ने शराबख़ानों और क्लबों में पीकर जिस तरह सड़कों पर नाच-गाना किया है उससे साफ़ हो गया है कि पीने के बाद सारी सावधानी हवा हो जाती है। इसका कितना और कैसा असर होगा इसका पता करीब दो हफ़्ते बाद लगेगा। 

इस बीच ऑस्ट्रेलिया के मैलबर्न शहर के तीन रिहाइशी टावरों में महामारी फैलने और स्पेन के कैटेलोनिया प्रांत में महामारी फैलने के बाद लॉकडाउन करना पड़ा है। यूरोप के देशों ने हवाई यातायात भी खोला है। विडंबना यह है कि अमरीका और भारत की उड़ानें बंद रहेंगी पर चीन की उड़ानें शुरू हो रही हैं। हवाई यातायात शुरू होने और क्लब-रेस्तराँ खुलने के बाद महामारी कितना काबू में रह पाएगी इसका अंदाज़ा दो हफ़्तों के भीतर हो जाएगा। ऐसा लगता है कि जनजीवन को पाबंदियों से आज़ाद करना रोकथाम के लिए पाबंदियाँ लगाने से भी कठिन साबित होने वाला है। मारूफ़ देहलवी साहब का शेर है:

दर्द-ए-सर में है किसे संदल लगाने का दिमाग़,

उसका घिसना और लगाना दर्द-ए-सर ये भी तो है!

 

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