मानवीय विकास को विकास का आधार बनाना आवश्यक

संपूर्ण विश्व में विकास की प्रक्रिया और वैज्ञानिक आविष्कारों के द्वारा विकास प्रक्रिया को प्रभावित किया जाना जिस चरम अवस्था को प्राप्त कर चुका है और निरंतर नए कीर्तिमान स्थापित करता जा रहा है,  वह विचार का विषय है।

मानवीय विकास
डॉ. अमिताभ शुक्ल

विश्व के चंद विकसित देशों को छोड़कर, जिन्होंने आर्थिक और  वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ मानवीय और सामाजिक विकास के मध्य संतुलन स्थापित किया है, शेष विश्व की स्थिति चिंताजनक है।

इन देशों ने विकास की उच्च अवस्था प्राप्त करने के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन और वैज्ञानिक प्रगति के मध्य संतुलन स्थापित किया है।

डेनमार्क,  स्वीडन और नॉर्वे इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।

विकास के साथ अनेक समस्याओं का बढ़ता जाना वर्तमान काल की प्रमुख समस्या है।

विश्व के विकसित राष्ट्र अमेरिका और चीन उसके उदाहरण हैं।

आर्थिक विकास और वैज्ञानिक प्रगति के मानव जीवन पर विपरीत प्रभाव का ताजा उदाहरण वर्तमान की विश्वव्यापी त्रासदी है, जिससे विश्व के 200 से अधिक देश और 7.8 बिलियन जनसंख्या प्रभावित हुई है।

मानवीय विकास ही विकास का सर्वोच्च पैमाना

इन स्थितियों में जब विकास विनाश को बढ़ावा दे रहा है, महात्मा गांधी के विचारों पर आधारित विकास पद्धति की अनिवार्यता प्रतिपादित होती है।

महात्मा गांधी ने प्रकृति, प्राकृतिक संसाधनों, पूंजी संसाधनों के साथ मानवीय विकास का जो प्रारूप प्रस्तुत किया था, वह वर्तमान संदर्भों में मनुष्य की रक्षा करने के लिए ढाल का काम कर सकता है।

उदाहरणार्थ स्थानीय संसाधनों पर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से उत्पादन द्वारा पर्यावरण की रक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं।

इसमें उत्पादन के स्तर पर लागत-लाभ और उपभोक्ता की दृष्टि से कम कीमत पर वस्तुएं प्राप्त करने की सुविधा है।

पूंजी के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए “न्यास धारिता” अर्थात सामान्य शब्दों में उत्पादन कार्य के लिए  स्वेच्छा से समाज के अनेक व्यक्तियों द्वारा पूंजी निवेश किया जाए,  कोई स्वामी या मालिक न हो, वरन निवेश करता एवं कार्य करने वाले लाभ में सहभागी हों।

इसके परिणाम स्वरूप समाज में पूंजी के केंद्रीकरण एवं स्वार्थपूर्ण प्रयोग पर नियंत्रण, उत्पादन के प्रकार पर नियंत्रण एवं समान सहभागिता इत्यादि स्थापित किए जा सकते हैं।

पूंजी, सत्ता और स्वार्थों का गठजोड़

भारत में गांधीजी के प्रभाव स्वरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी न्याय धारिता के आधार पर समाज कार्य की अवधारणा बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुई थी लेकिन समय के साथ स्वार्थपूर्ण प्रवृतियों के विस्तार के कारण वह पूरा ढांचा ही चरमरा गया।

इसी प्रकार, पूंजी, सत्ता और निहित स्वार्थों के गठजोड़ के कारण जिस प्रकार की आर्थिक नीतियों का निर्माण संपूर्ण विश्व में और उससे प्रभावित देशों में हो रहा है, उसी की परिणिति वर्तमान आर्थिक समस्याएं हैं। अतः सरकारों से कोई उम्मीद किया जाना व्यर्थ है।

वैकल्पिक जीवन पद्धति के सामूहिक प्रयास आवश्यक

इस के लिए समाज में ही इस प्रकार के विचार उत्पन्न होने चाहिए और व्यक्तियों के समूह के द्वारा “वैकल्पिक विचार” और “विकास पद्धति” पर कार्य कर जीवन पद्धति का एक नया ढांचा निर्मित किया जा सकता है।

इस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर इटली और फ्रांस में “द सोसायटी आफ आर्क” का उद्धरण प्रासंगिक है, जिसके संस्थापक महात्मा गांधी से प्रभावित थे और उन्हें महात्मा गांधी ने शांति दास नाम दिया था।

इसके अनुयायियों द्वारा पूंजी रहित जीवन शैली का विचार अपना कर उत्पादन द्वारा धन अर्जित कर दान और कल्याण तक के कार्य सफलतापूर्वक किए जाते रहे।

इस प्रकार मनुष्य जीवन की रक्षा के लिए व्यक्तियों और व्यक्तियों के समूह को ही आगे आकर प्रयास करना होंगे।

लेकिन,  विडंबना यह है कि युवा पीढ़ी, जिसे लंबा समय इस विनाशपूर्ण विकास प्रक्रिया में बिताना है, उन्हें जीवन शैली के सही मार्ग पर प्रेरित करने  वालों का अभाव है, और अधिक आयु वाले इस प्रकार के उद्देश्यों के लिए अधिक समय देने में समर्थ नहीं हैं।

तब भी समाज में नई और पुरानी पीढ़ी में तालमेल बिठाकर इस प्रकार के सामूहिक कार्य विचार और जीवन शैली को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, विशेषकर भारत जैसे प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों वाले एक विशाल देश में वैकल्पिक विकास पद्धति को बढ़ावा दिया जाना वर्तमान संदर्भ में नितांत आवश्यक प्रतीत होता है।

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