उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन :कब तक तबाहियाँ लाते रहेंगे हम ?

केदारनाथ हादसे के बाद भी हमारी सरकार नहीं चेती

उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन . केदारनाथ हादसे के बाद भी हमारी सरकार नहीं चेती। और अब चमोली जिले के रेणी-तपोवन क्षेत्र में फिर से एक बड़ा हादसा हो गया है. चमोली की तबाही पर नैनीताल से वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह की चिंता है कि हिमालय में तबाहियाँ कब तक लाते रहेंगे हम ?

उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन से तबाहियों पर उत्तराखंड के जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का एक वीडियो कल से खूब वायरल हो रहा है, जिसमें गिर्दा अपने अंदाज में यह कविता पढ़ रहे हैं:-

बोल व्यापारी तब क्या होगा ?

सारा पानी चूस रहे हो, नदी समन्दर लूट रहे हो,

गंगा-यमुना की छाती पर, कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,

उफ तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक मनमर्जी,

जिस दिन डोलेगी ये धरती, सर से निकलेगी सब मस्ती,

महल-चौबारे बह जायेंगे, खाली रौखड़ रह जायेंगे,

बूँद-बूँद को तरसोगे जब, बोल व्यापारी तब क्या होगा ?

आज भले ही मौज उड़ा लो, नदियों को प्यासा तड़पा लो,

लेकिन डोलेगी जब धरती, बोल व्यापारी तब क्या होगा ?

विश्व बैंक के टोकनधारी तब क्या होगा ?

​गिरदा ने अपने देहान्त से दो साल पहले वर्ष 2008 में यह कविता लिखी थी। उस वक्त उत्तराखंड में ‘नदी बचाओ अभियान’ चल रहा था। इस कविता के लिखे जाने के पाँच साल बाद केदारनाथ का हादसा हुआ। उस वक्त भी इस कविता को खूब याद किया गया था।

केदारनाथ हादसे के बाद भी हमारी सरकार नहीं चेती। और अब चमोली जिले के रेणी-तपोवन क्षेत्र में फिर से एक बड़ा हादसा हो गया है। अभी 19 लोगों के शव मिले हैं और 202 लोग लापता बतायें जा रहे हैं। इनमें ज्यादातर ऋषिगंगा और तपोवन जल विद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले मजदूर हैं। सिर्फ 11 स्थानीय ग्रामीण हैं। ईमानदारी से कहा जाये तो यह हादसा और बड़ा हो सकता था। इतवार का दिन था और सुबह का वक्त। चेतावनी जल्दी से सब जगह फैल गई।

उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन तबाहियाँ को लेकर चिन्ता बहुत पुरानी है। 44 साल पहले हमने ‘नैनीताल समाचार’ का प्रकाशन शुरू हुआ था। उसके दूसरे ही अंक में पिथौरागढ़ जिले के तवाघाट में हुई दुर्घटना, जिसमें दर्जन भर से अधिक लोग जिन्दा दफ्न हो गये थे, के बारे में सुन्दरलाल बहुगुणा जी की एक रिपोर्ट छपी थी। रिपोर्ट का शी

लेकिन विकास की दौड़ में समझदारी की बातें अनसुनी कर दी जाती रहीं। कहाँ पर निर्माण कार्य किया जाना चाहिये कहाँ पर नही, यह तमीज न सरकारों को रही और न जन सामान्य को। पहाड़ी नदियों से सटा कर अंधाधुंध निर्माण कार्य हुए। आर्थिक उदारीकरण के बाद इस तरह का अदूरदर्शी विकास तेज हुआ। उत्तराखंड राज्य बनने तक यहाँ की नदियों पर जल विद्युत परियोजनायें बनाने की होड़ लग गई। प्रकृति अपने तरीके से लगातार चेताती रही। केदारनाथ हादसे से बड़ी चेतावनी और क्या हो सकती थी ? मगर उसे भी अनसुना कर दिया गया। ध्वंस के बाद दुबारा केदारनाथ बनाया गया तो वह सावधानियाँ नहीं बरती गयीं जो जरूरी थीं.

केदारनाथ हादसे के बाद भी हमारी सरकार नहीं चेती
केदारनाथ मंदिर के पास हादसे में भारी जैन धन हानि हुई थी

​सर्वोच्च न्यायालय की कमेटी भी नाकाम

केदारनाथ आपदा के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने डाॅ. रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की, जिसे यह देखना था कि उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन की उस आपदा में जल विद्युत परियोजनाओं का कितना योगदान है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि उच्च हिमालय में जहाँ घाटी का तल 2000 मीटर से ऊपर है, वह पैरा ग्लेशियल जोन के रूप में बहुत संवेदनशील है। अतः उच्च हिमालय में निर्माणाधीन 24 में से 23 योजनायें तत्काल रोक दी जायें। धौली गंगा में तो सभी प्रस्तावित परियोजनायें निरस्त कर दी जायें। 

तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने न्यायालय के निर्णय को खत्म करवाने के लिये खूब हाथ-पाँव मारे। ऋषि गंगा की यह परियोजना, जो वर्तमान में उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन त्रासदी का कारण रही है, 2016 में एक बार पहले भी बह कर नष्ट हो चुकी है। मगर फिर से बना दी गई। इस बार तो यह परियोजना विस्फोटकों के प्रयोग और स्टोन क्रशरों के लिये विवाद में रही। 

रेणी गाँव के कुन्दन सिंह ने इस मामले को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की थी। रेणी वह गाँव है, जहाँ से गौरादेवी ने चिपको आन्दोलन का शंखनाद किया था। बहुत बड़ी विडम्बना है कि रेणी गाँव इस बार सबसे पहले आपदा की चपेट में आया। वहाँ के 5 लोग अभी लापता हैं।

​जाहिरा तौर पर इस आपदा के पीछे ग्लोबल वार्मिंग है। भौतिकी अनुसंधानशाला (पी.आर.एल.) अहमदाबाद के भूविज्ञानी डाॅ. नवीन जुयाल, जो पिछले अनेक सालों से इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और इस हादसे से एक पूर्व तक वहीं पर थे, बतलाते हैं कि त्रिशूल पर्वत के उत्तरी पाश्र्व से निकलने वाली त्रिशूली गाड़  रेणी गाँव के चार-पाँच किमी. ऊपर जहाँ ऋषि गंगा से मिलती है, वहाँ पर ढेर सारी दरारें हैं और बारीक मिट्टी, बालू आदि का वहाँ पर ढेर था। 

3, 4 और 5 फरवरी को छिटपुट बर्फबारी के बाद 6 तारीख को बहुत तेज धूप थी, जिसने सतह के नीचे की बर्फ को पिघलाया होगा और वह मिट्टी, बालू को साथ लेकर भूस्खलन के रूप में नीचे को आया होगी। डाॅ. जुयाल कहते हैं कि उनके शोध छात्र अभी इस परिघटना को लेकर शोध कर रहे हैं और जल्दी ही उनकी जाँच पूरी हो जायेगी। वैसे भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान केन्द्र भी उपग्रह के चित्रों के आधार पर इसी नतीजे पर पहुँचा है।

​ऋषि गंगा परियोजना

उत्तराखंड हिमालय में यह भूस्खलन जान माल के इतने बड़े नुकसान का कारण नहीं बनता, अगर वह रेणी गाँव के लगभग आधा किलोमीटर ऊपर ऋषि गंगा परियोजना से न टकराता। इस परियोजना को ध्वंस कर उसके मलबे से उसकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई और वह 530 मेगावाट की तपोवन जल विद्युत परियोजना को नष्ट कर सका।  उसके बाद की सूचनायें तो जगजाहिर हैं।

विवादास्पद चारधाम मोटर रोड

​उत्तराखंड हिमालय में भूस्खलन से तबाहियों और विशेषकर केदारनाथ से हम कोई सबक नहीं सीखे। काश, इस दुर्घटना से सीख जाते। प्रकृति से हमने छेड़छाड़ जारी रखी तो ऐसी दुर्घटनायें होती रहेंगी। अभी चार धाम मोटर रोड, जिसे आल वेदर रोड भी कहा जाता है, का मामला सामने हैं। वैज्ञानिक और हिमालय के शुभचिन्तक इस परियोजना को विनाशकारी बतलाते हुए लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।

 मगर सरकार चार धाम मोटर प्रोजेक्ट रोकने के लिये राजी नहीं है। बतलाया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं इस परियोजना में बहुत अधिक रुचि ले रहे हैं। 

हजारों बेशकीमती पेड़ अब तक काट डाले

इस सड़क के निर्माण के लिये हजारों बेशकीमती पेड़ अब तक काट डाले गये हैं। मैदानी एक्सप्रेस वे की तर्ज पर अनावश्यक रूप से जगह-जगह सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने डाॅ. रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। मगर सरकार न तो इस समिति की संस्तुतियों को मान रही है और न इसे आजादी से अपना काम करने दे रही है।

कृपया इसे भी देखें :

कुछ सालों बाद यह परियोजना विनाश का तांडव रचेगी तो हम एक बार फिर चिन्तित हो जायेंगे। यह क्रम चलता रहेगा.

राजीव लोचन साह , वरिष्ठ पत्रकार, नैनीताल से

कृपया सुनें

https://anchor.fm/ram-dutt-tripathi/episodes/–eq6t6q #Chamoli

Rajiv Lochan Sah

“वरिष्ठ पत्रकार और 1977 से नैनीताल समाचार का सम्पादन प्रकाशन। उसी दौर में चिपको आन्दोलन में भागीदारी। तब से राज्य बनने तक और बाद भी सामाजिक-राजनैतिक आन्दोलनों में सक्रियता।”

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