गिलोय का लीवर पर दुष्प्रभाव नहीं

                                                           *डॉ.आर.अचल

डा आर अचल

इण्डियन नेशनल एसोसिएसन फॉर द स्टडी ऑफ द लीवर द्वारा प्रकाशित जर्नल के हवाले से टाइम्स ऑफ इण्डिया के 4 जुलाई अंक में प्रकाशित एक लेख के अनुसार गुडुची(गिलोय-Tinospora cordifolia) के सेवन से 6 मरीजों के लीवर खराब हुए है।मुम्बई के एक अस्पताल के यकृत रोग विशेषज्ञ डॉ आभा नागरल सहित कुछ चिकित्सकों ने इम्यूनिटी के बूस्टर के रूप में गुडुची के सेवन को लेकर सावधान किया है।मुम्बई के ही एक लीवर सर्जन डा.ए.एस सोईन ने इस तथाकथित शोध का समर्थन करते हुए 5 मरीजों में एक के मरने की बात भी कही है।

यह शोध समाचार ऐसे समय आया है जब पूरे देश में करोड़ो लोगों ने कोविड महामारी से बचने के लिए गुडुची का सेवन कर रहे है।ऐसे में यह शोध हास्यापद् लगता है कि कोरोड़ो लोगों मात्र 5 रोगियों के आधार पर गुडुची के पर दुष्प्रभाव का निष्कर्ष निकाल कर शोधपत्र प्रकाशित किया गया है,जबकि आयुर्वेद,यूनानी,सिद्धा,चीनी चिकित्सा विधाओं के अलावा लोक परम्परा में गुडुती का प्रयोग ज्वर और पीलिया एवं लीवर के रोगों हजारोंसाल से प्रयोग किया जाता रहा है। 

मैने 25 वर्ष के अपने प्रेक्टिस काल में सैकड़ो लीवर के रोगियों पर गुडुची का सकारात्मक प्रभाव देखा है,मेरे जैसे आयुर्वेद के हजारों चिकित्सकों,आयुर्वेद मेडिकल कालेजों,संस्थानों के चिकित्सकों ने लीवर संबंधी रोगों में गुडुची का साकारात्मक परिणाम पाया है।इससे संबंधित सैकड़ों शोधपत्र भी राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर प्रकाशित हो चुके है।जिसके अनुसार गुडुची यकृत (लीवर) रोगों के लिए एक निरापदएवं प्रभावकारी औषधि है।रोग प्रतिरोधक शक्ति के विकास अर्थात रोगों से बचाव के लिए गुडुची के प्रभाव को विश्वस्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिक भी समर्थन करते है। कोरोना कोविड काल में कोरोड़ो लोगों ने गुडुची या उससेबनी हुई दवाओं का सेवन कर अस्पताल जाने से बच गये हैं।शायद इसके कारण एलोपैथिक फार्मा कार्पोरेट के आर्थिक नुकसान हुआ है।इसीलिएस्वास्थ्य के बाजार में गुडुची को बदनाम कर,जनता को बेसहारा करने की साजिश रचा जा रहा है। संभव है इसी कारण  प्रतिक्रिया में यह भ्रामक शोध प्रकाशित किया गया है,जिसमें शोध के नियमों,आचार संहिता की पूर्णतः उपेक्षा कर, मिडिया के माध्यम भ्रम फैलाया जा रहा है।जबकि बुखार की प्रचलित एलोपैथिक दवा पैरासिटामल के लीवर पर दुष्प्रभाव को सिद्ध करते हुए 1974 से आजतक  विश्व स्तर पर 189 शोध पत्र प्रकाशित किये जा चुके है,फिर एक अपरिहार्य औषधि के रूप में धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा रहा है।

शोध के मानको के अनुसार इस तरह के शोध के लिए सबसे जरूरी है,रोगी द्वारा सेवन की गयी औषधि की पहचान करना। जिसके लिए फार्माकोग्नोसी के विशेषज्ञ का इस शोध में शामिल होना आवश्यक है।रोगी द्वारा प्रयोग की गयी औषधि की पहचान व जैवरासायनिक अध्यनन भी नहीं किया गया है। शोध में कोई ऐसा विशेषज्ञ शामिल नहीं है,केवल रोगी द्वारा बताये गये नाम के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाल लिया गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि शोध में शामिल 5 रोगियों के बीमारी के इतिहास का विश्लेषण भी नहीं किया गया है।जैसे उन्हे तथा कथित गुडुची के सेवन से पहले क्या बीमारी थी,उनके लीवर की क्या स्थिति थी,वे इसके पहले कौन सी दवायें ले रहे थे,उनकी जीवनशैली क्या थी?

इस शोध का सबसे खतरनाक पहलू शोधहीन पत्रकारिता है,जिसमें बिना विधिवत अध्ययन या साक्ष्य के, कुछ चिकित्सकों बयान के आधार पर समाचार प्रकाशित कर भ्रम की स्थिति पैदा किया है।यहाँ तक की इस अखबार में प्रकाशित वनस्पति का चित्र गुडुची,गिलोय (Tinosporacordifolia) का चित्र नहीं है,यह टिनोस्पोरा क्रिस्पा का चित्र है,जिसका प्रयोग आयुर्वेद में नहीं किया जाता है। पत्रकार को कम से कम टीनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया के मोनोग्राफ के संबंध में डब्ल्यूएचओ के प्रकाशनों को देखना चाहिए था,जिसमें बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का उल्लेख है,इससे भ्रामक पत्रकारिता से बचा जा सकता था। यह गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग इस बात का संकेत देती है कि एलोपैथिक दवा उद्योगों और मीडिया का कॉकस पारंपरिक हर्बल दवाओं और हर्बल उद्योगों की लोकप्रियता सेभयभीत हो रहे हैं।इस लिए शोध के मानकों को ताक पर रख कर तथाकथित इस प्रकार के शोध समाचार प्रकाशित किया गया है।दर असल गुडुची का लीवर पर दुष्प्रभाव को प्रचारित करना शोध नहीं साजिश है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि गुडुची एक ऐसी वानस्पतिक औषधि है,जिसका प्रयोग भारत ही नहीं चीन.ताइवान,श्रीलंका,थाईलैण्ड आदि में भी बिना चिकित्सकीय सलाह से किया जाता है।

गुडुची संबंध में आयुर्वेद में एक लोकोक्ति कही गयी है कि राम-रावण युद्ध में घायल व मृत वानर सेना को पुनर्जीवित व स्वस्थ के लिए इन्द्र में अमृत वर्षा किया जिससे जमीन पर गिरी अमृत बूँदे गुडुची के रूप उग आयी,इसीलिए इसे अमृता भी कहा गया है।आज भी वर्षा होते ही जहां देखिये वही गुडुची दिखने लगती है।यह भारत तथा दक्षिण एशिया के प्रत्येक क्षेत्र में पायी जाती है।इसे हिन्दी में गिलोय,बंगाली में गुलंच,मराठी में गलवेल,मलयालम में अम्रितु,गुजराती में गलो,तमिल में शिन्दिलकोडी,कन्नड़ में अमरवल्ली,फारसी में गिलोई अंग्रेजी में टिनोस्पोरा कहते है।इसकी तीन प्रजातियाँ टिनोस्पोरा कोर्डिफोलिया,टिनोस्पोरा मालावारिका,टिनोस्पोरा क्रिस्टा पायी जाती हैं जिसमें मलाबारिकम को पद्मगुडुची कहते है।औषधि के रूप में कार्डिफोलिया और मालाबारिका का प्रयोग किया जाता है,दोनो के गुण समान होते है,परन्तु किस्टा का प्रयोग औषधि के रूप में नहीं किया जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार गुडुती के तने का क्वाथ,चूर्ण,घन स्तव का औषिय प्रयोग किया जाता है।यह त्रिदोष नाशक,बलदायक,ज्वर,भूख की कमी,मूत्ररोग,त्वचारोग, पित्तसारक, विषनाशक, मेधा वर्धक है।

इसके पत्तो का साग भी खाया जाता है।अष्टांग हृदय में इसे रसायन कहा गया है,इसके सेवन से कोई रोग न होने की बात कही गयी है,जिसका प्रयोग करने पर सकारात्मक परिणाम देखा गया है।आधुनिक शोधों में भी इसका इम्यूनिटी बढ़ाने का गुण सिद्ध हो चुका है।आधुनिक जैवरासायनिक विश्लषण में गुडुची के तने में गिलोइन ग्लूकोसाइड्स(C23 H32O10 5Ho),गिलोइनीन (C17H18O5),ग्लाइकोस्टेराल (C28H48O) मुख्यतः तीन रसायनिक यौगिक पाये जाते हैं,इसके अतिरिक्त बर्वेरिन और मोम जैसे एक पदार्थ मिलता है।अब तथा कथित शोधकर्ताओं के यह भी बताना चाहिए था कि इसमें कौन सा रसायन लीवर के लिए हानिकारक है,यदि यह संभव नहीं था जनता में भ्रम फैलाने से बचना चाहिए था।

                                   *संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट जर्नल एवं संयोजक सदस्या-वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस

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