क्यूबा में भोजन और दवा के लिए प्रदर्शन बड़े संकट का संकेत!

साम्यवादी देश क्यूबा में इन दिनों भोजन और दवाई के लिए बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. सरकार इसके लिए अमेरिका को दोषी बता रही है. क्या यह क्यूबा में बड़े संकट का संकेत है?

‘आजादी’ की माँग करते और सरकार विरोधी नारे लगाते हुए क्यूबावासी रविवार को देश के विभिन्न शहरों की सड़कों पर उतर आए। भोजन और दवा की किल्लत से परेशान लोगों का इतना बड़ा प्रदर्शन पिछले करीब तीन दशकों में नहीं देखा गया। सोशल मिडिया ने इस प्रदर्शन को गति प्रदान की है. जैसे-जैसे समय बीतता गया , वैसे-वैसे देश के अन्य हिस्सों से प्रदर्शनों की खबरें सामने आती गयी.

सैन अंटारियों डी लॉस बैनोस से प्रारम्भ होकर देश के बाकी हिस्सों में फैल गया. जिससे राजधानी हवाना से लेकर आर्टमीसा, कार्डेनस, पाल्मा सोरियानों में भी प्रदर्शन प्रारम्भ हो गये हैं. इन  प्रदर्शनों में  लोगों का आक्रोश चरम पर दिख रहा है।हालांकि ये विरोध प्रदर्शन क्यूबा के लिए एक असामान्य सी घटना है क्योंकि वहाँ सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन की इजाजत नहीं हैं.

इससे पहले कास्त्रो के युग में मालेकोनाजो विद्रोह (सन् 1994) के समय लोग कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे. किंतु उस विद्रोह का प्रभाव सीमित रहा था एवं सरकार ने सख़्ती से उसका दमन किया था.

असंतोष के खिलाफ दमनकारी कार्रवाई के लिए कुख्यात क्यूबा में इन दिनों रैलियों के आयोजन में आश्चर्यजनक रूप से तेजी आई है। असल में इस विरोध प्रदर्शन के पीछे कई निहितार्थ हैं. क्यूबा आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर कई संकटों से घिरा है. वर्ष 2020, बीते तीन दशकों में क्यूबा की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बुरा साल था, जब उसमें तक़रीबन 10 से 11 फीसदी कि गिरावट दर्ज की गई. वहीं जून 2021 में इसमें 2 फीसदी की गिरावट हुईं.

क़ृषि क्यूबा में मुख्य व्यवसाय है. इसके अतिरिक्त कारीगर, छोटे व्यापारी, टैक्सी ड्राइवर जैसे सीमित आर्थिक गतिविधियों वाले लोग हैं, जो कुल श्रमिक आबादी का 13 फीसदी से अधिक नहीं हैं. क्यूबा में सर्वाधिक संभावना पर्यटन उद्योग को है, जो कोरोना महामारी और अमेरिकी प्रतिबधों के कारण संकट में है.

देश में मुद्रास्फीति बढ़ गयी है. खाद्य पदार्थों और दवाओं समेत कई बुनियादी चीज़ों की भारी किल्लत है. विद्युत आपूर्ति लगातार बाधित है. क्यूबा में विदेशी मुद्रा का भी संकट है.

जून माह में क्यूबा सरकार ने डॉलर में नगदी लेने पर रोक लगा दी. ये एक प्रकार से अमेरिकी मुद्रा पर लगाई गई बड़ी पाबंदी है. इसके साथ ही चीनी निर्यात से प्राप्त होने वाले राजस्व में भी भारी कमी आयी है. 

इसी में कोढ और खाज़ वाली स्थिति कोरोना संक्रमण के कारण पैदा हो गयी. कोरोना संक्रमण के नये प्रसार के दौर में पूरे दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप में क्यूबा इस महामारी से सर्वाधिक पीड़ित रहा. वर्तमान में भी संक्रमण की स्थिति सुधरती नहीं दिख रही है. वहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गयी है. स्थानीय लोग महामारी से होने वाली मौतों के लिए चिकित्सा सुविधाओं और दवाओं के अभाव तथा अस्पतालों में फैली कुव्यवस्था के साथ- साथ सरकार को दोषी ठहरा रहें हैं.

क्यूबा में भोजन और दवाई के लिए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन

हालात इस कदर गंभीर हो गये है कि लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अंतराष्ट्रीय समुदाय से दखल की माँग कर रहें हैं. इसके विपरीत क्यूबाई राष्ट्रपति मिगेल दियाज़ कनेल ने रविवार को अपने संदेश में देश कि वर्तमान स्थिति को विश्व के अन्य देशों के समान ही माना, जो अपने स्तर पर कोरोना संक्रमण से जूझ रहें हैं, और यह भी कि उनके देश ने अपना वैक्सीन बना लिया है. लेकिन वहाँ टीकाकरण की स्थिति संतोषजनक नहीं है. 

इस विरोध से ये सम्भावनाएँ भी लगाई जा रही हैं कि कहीं क्यूबा में साम्यवाद का पतन निकट तो नहीं है. वैसे ऐसी संभावनाएं पहले भी व्यक्त की जाती रहीं हैं. USSR के विघटन के बाद क्यूबा में कास्त्रों युग के अंत तथा कम्युनिस्ट व्यवस्था के ध्वंस की जो भविष्यवाणी की जा रही थीं, वो सारे कयास गलत साबित हुए. वर्ष 2016 में फिडेल कास्त्रो की मृत्यु को कम्युनिस्ट युग के अवसान के तौर पर देखा जा रहा था. इसके पश्चात् क्यूबा में व्यवस्था परिवर्तन की भविष्यवाणी की जाने लगी थीं. अपने सम्पूर्ण शासनकाल में कास्त्रो बन्धुओं ने सत्ता पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी, लेकिन वर्तमान में परिस्थितियां थोड़ी परिवर्तित होती दिख रही है. 

हालांकि इन परिवर्तनों की शुरुआत तभी हो गई जब 2008 में राउल कास्त्रो सत्ता में आए. वर्ष 2011 में व्यापारिक गतिविधियों के लिए कुछ सीमित अधिकार दिये जाने लगे. संविधान में संशोधन के पश्चात संपत्ति पर निजी मालिकाना अधिकार को मान्यता प्रदान किया गया. इसके साथ हीं साम्यवादी समाज के निर्माण के लक्ष्य से एक कदम पीछे हटते हुए समाजवादी स्वरुप की बात की जाने लगी, साथ ही बाजार की भूमिका का जिक्र होने लगा. जिस तरह निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ती जा रही है, उसे लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता था. 

इस वर्ष (2021) की शुरुआत में हीं क्यूबा सरकार ने निजी क्षेत्र को अधिकांश क्षेत्रों ने काम करने कि इजाजत देने कि घोषणा कर दी. क्यूबा की श्रम मंत्री मार्टा एलीना फेइतो के अनुसार केवल कुछ उद्योगों, जिनका संचालन सरकार करेगी, को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में निजी व्यवसाय को बढ़ावा दिया जाएगा. फेइतो के अनुसार सिर्फ 124 उद्योगो को निजी क्षेत्र की पहुंच से दूर रखा गया. 

 इस बीच अपने सम्बोधन में  राष्ट्रपति मिगेल कनेल ने इस संकट के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी प्रतिबधों और ट्रंप प्रशासन के दौरान लिए गये निर्णयों को दोषी ठहराया. उन्होंने USA से अपने देश पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की माँग की है. सरकार इसमें अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की भूमिका को भी संदिग्ध मान रही है. राष्ट्रपति कनेल ने विरोधियों को ‘किराये के लोगों’ के रूप में संम्बोधित किया. उन्होंने अपने समर्थकों को इस उकसावे का जवाब देने को कहा. राष्ट्रीय टेलीविजन पर अपने संबोधन में कनेल ने कहा कि, “हम देश के सारे क्रांतिकारियो, सारे कम्यूनिस्टों का आह्वान करते हैं कि जहां भी इस तरह भड़काने वाली गतिविधियां हों, वहीं सड़कों पर उतरें.” विदेशमंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज ने आरोप लगाया कि USA इन प्रदर्शनों को भड़काने के साथ हीं वित्तीय मदद भी मुहैया करा रहा है.
  क्यूबा, एक द्वीपीय देश है, जो पूंजीवाद के सबसे बड़े प्रतीक USA की दक्षिण- पूर्वी सीमा से महज़ 366 किमी दूर स्थित है. महज़ एक से डेढ़ करोड आबादी वाला यह देश अपने महकते सिगार, ह्वाइट रम, बेपरवाह जिंदगी, संगीत, रिंग में फुर्तीले बॉक्सर और खूबसूरत समुद्री किनारों के लिए प्रसिद्ध है.

क्यूबा की एक और खासियत हैं, कास्त्रो बंधुओ और चे ग्वेरा के नेतृत्व में उसने पूँजीवाद के गढ़ में साम्यवाद का झंडा गाड़ दिया. पूरे शीतयुद्ध के काल में यह देश अमेरिका के लिए चुनौती बना रहा था. तब सोवियत संघ इसके पीछे मजबूती से खड़ा रहा. USSR के अवसान बाद भी यह अमेरिकी ताकत के सामने झुका नहीं. 21 वीं सदी के दूसरे दशक में दोनों पक्ष अपनी कटुता कम करने के लिए तैयार लग रहे थे.

 सन् 2015 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो कि मुलाक़ात हुईं तो लगा की दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी. इस मुलाक़ात में क्यूबा ने अमेरिकियों को अपने यहाँ आने देने और निजी व्यवसायों को उचित अवसर उपलब्ध कराने की बात स्वीकार की थी.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ये सारी प्रक्रिया ठप पड़ गयी. ट्रंप प्रशासन ने ओबामा सरकार के प्रयासों को कम्युनिस्ट क्यूबा के तुष्टिकरण का प्रयास माना तथा क्यूबा के विषय में पुरानी नीति की तरफ लौट गये. किंतु ओबामा कार्यकाल के दौरान उपराष्ट्रपति और वर्तमान राष्ट्रपति बाईडेन ने क्यूबा के साथ सम्बन्ध सुधारने के प्रयास के संकेत दिये.

अब  जबकि क्यूबा अपने आतंरिक संकट में अमेरिका को दोषी मान रहा है, तब एक बार फिर इन देशों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका बलवती होती जा रही है. संभवतः अमेरिका अब तक अपने पड़ोसियों के प्रति यांकी साम्राज्यवाद और डॉलर कूटनीति से बाहर नहीं आ पाया है. उसे अब तक अपने एकल महाशक्ति होने का भ्रम है.

इधर चीन ने तेजी से इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए क्यूबा सरकार का समर्थन किया है. चीन ने इस मामले में किसी भी बाहरी पक्ष के दखल की आलोचना की है. साथ ही क्यूबा के राष्ट्रपति की अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने की माँग का समर्थन किया है. चीन का मानना है कि इस कारण से मूलभूत चीज़ों कि आपूर्ति में कठिनाईयां आ रही हैं.

 वजह जो भी हो लेकिन ये क्यूबा में एक बड़े संकट का संकेत है, अगर परिस्थितियों को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो वहाँ अस्थिरता का एक नया दौर प्रारम्भ हो सकता है.                                 

  शिवेन्द्र राणा, 

  ईमेल – Shivendrasinghrana@gmail.com 

 ट्विटर – @shivend33163533 

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