पर्यावरण संकट , अहिंसक समाज और आहार शुद्धि

अबकी बार भी 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस बीत गया। यूं तो दिवसों की संख्या की कोई कमी नहीं है। कैलेंडर के दिन कम पड़ जाएंगे। इसी वजह से एक ही तारीख को एक से अधिक दिवस पड़ते हैं।  ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी दिवस की शुरुआत 1969 में सान्ता बारबरा (कैलिफोर्निया) में हो रहे छात्र आक्रोश के प्रदर्शन को पर्यावरणीय सरोकारों की दिशा में मोड़ने का परिणाम रहा कि 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हुई। आज दुनिया के लगभग 184 देशों में पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। इस तरह 22 अप्रैल को इंटरनेशनल मदर्स डे की शुरुआत हुई।
 आज जब भारत में मदद अर्थ डे मना रहे हैं तब हमारा देश अभूतपूर्व कोरोना संकट से जूझ रहा है। कोरोना के संदर्भ में यह बात जानने को मिल रही है कि यह वायरस जानवरों के माध्यम से इंसान तक पहुंचा है। कोरोना वायरस ने दुनिया का ध्यान चीन की वन्यजीवो की उस मण्डी की ओर खींचा है जहां हर तरह के जानवर का मांस खरीदा-बेचा जाता है। जिनका उपयोग खाने के लिए या दवाओं के लिए होता है। जानवरों की खरीद-फरोख्त के कारण वहां बहुत से जानवर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस संदर्भ में बीबीसी की यह खबर देखें।
https://www.bbc.com/hindi/international-51347957

यदि हम अपनी प्रकृति-पर्यावरण को लेकर थोड़ा भी गंभीर हैं तो पहले हमें यह दंभ छोड़ देना चाहिए कि इंसान का जीवन किसी अन्य जानवर पशु-पक्षी के जीवन से श्रेष्ठ है। 

विनोबा का साम्ययोग
स्वयं श्रम करते संत विनोबा भावे


गीता प्रवचन में बाबा विनोबा कहते हैं,
” ‘देह ही मैं हूं’ यह जो भावना सर्वत्र फैल रही है, इसके फलस्वरूप मनुष्य ने बिना विचारे ही देह -पुष्टि के लिए नाना प्रकार के साधन निर्माण कर लिये हैं। उन्हें देखकर भय मालूम होता है। मनुष्य को सदैव लगता रहता है कि यह देह पुरानी हो गयी, जीर्ण-शीर्ण हो गयी, तो भी येन-केन प्रकारेण इसे बनाये ही रखना चाहिए ;….. कहते हैं कि देह की रक्षा के लिए मांस खाने में कोई हर्ज नहीं है। मानो मनुष्य की देह बड़ी कीमती है! उसे बचाने के लिए मांस खाओ। तो पशु की देह क्या कीमत में कम है? और है, तो क्यों? मनुष्य-देह क्यों कीमती मानी गयी? क्या कारण है? पशु चाहे जिसे खाते हैं, सिवा स्वार्थ के वे दूसरा कोई विचार ही नहीं करते! मनुष्य ऐसा नहीं करता, वह अपने आसपास की सृष्टि की रक्षा करता है। अतः मानव-देह का मोल है, इसलिए वह कीमती है। परंतु जिस कारण मनुष्य की देह कीमती साबित हुई, उसी को तुम मांस खाकर नष्ट कर देते हो! भले आदमी, तुम्हारा बड़प्पन तो इसी बात पर अवलंबित है न कि तुम संयम से रहते हो, सब जीवों की रक्षा के लिए उद्योग करते हो, सबकी सार-संभाल रखने की भावना तुममें है। पशु से भिन्न जो यह विशेषता तुममें है उसी से न मनुष्य श्रेष्ठ कहलाता है?
इसके अलावा वे कहते हैं, आजकल वैद्यक-शास्त्र नाना प्रकार के चमत्कार दिखा रहा है। पशु की देह पर शल्यक्रिया करके उसके शरीर में – उस जीवित पशु के शरीर में रोग-जंतु उत्पन्न करते हैं और देखते हैं कि उन रोगों का उनपर क्या असर होता है। सजीव पशु को अधिक कष्ट देकर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है उसका उपयोग इस क्षुद्र मानव-देह को बचाने के लिए किया जाता है। और यह सब चलता है ‘भूत-दया’ के नाम पर।”

जिस तरह इंसान के जीवन का महत्व है उसी तरह अन्य जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, पेड़ों के जीवन का महत्व है। 

विक्टर स्मेटाचेक दुनिया के जाने-माने समुद्र जीव विज्ञानी हैं। वर्तमान समय में वह गोवा के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में मानद प्राध्यापक भी हैं।उन्होंने लंबे समय तक पशुओं के व्यवहार का अध्ययन किया और पाया कि बड़े शाकाहारी जानवर जैसे हाथी और ब्लू व्हेल प्रकृति के माली का काम करते हैं और प्रकृति की विविधता को बनाए रखने में मदद करते हैं।श्री सोपान जोशी ने विक्टर स्मेटाचेक के विचारों के आधार पर एक लेख लिखा है ‘कुछ लाख रसोइये चाहिए’। यह लेख इंडिया वाटर पोर्टल हिंदी पर प्रकाशित हुआ है। इसमें विक्टर के हवाले से वह लिखते हैं, 
” शाकाहार केवल अहिंसक जीवन का मार्ग भर नहीं है। विक्टर उसमें मनुष्य के उत्तरजीवन के जवाब देखते हैं। इसी वजह से कई बरस पहले वे पूरी तरह शाकाहारी बनने की कोशिश करने लगे। तब विक्टर को एक और विचित्र समस्या दिखीः दुनिया के ज्यादातर समाजों में शाकाहारी भोजन पकाने का कौशल आज बचा ही नहीं है। मांस पर आधारित भोजन ही पकाना आता है उन्हें। यूरोप और अमेरिका में भारतीय भोजन और शाकाहार फैशन की तरह फैलता जरूर दिखता है, लेकिन वहां शाकाहार पकाने वालों की घोर कमी है। इसमें भारत के युवाओं के लिए विक्टर को उम्मीद दिखती है। वे कहते हैं कि हमें हजारों की संख्या में ऐसे रसोइए तैयार करने चाहिए जो स्वादिष्ट शाकाहार पका कर खिला भी सकें और पकाना सिखा भी सकें। उन्हें इस बात का दुख भी है कि हम भारतीय अपनी सबसे सुंदर, संस्कारी परंपराओं में विश्वास खो चुके हैं और यूरोप की उस सफलता से घबराए बैठे हैं जो समय-सिद्ध तो है ही नहीं और जिसने जलवायु परिवर्तन के मुहाने पर लाकर हम सबको खड़ा कर दिया है। आज उन परापराओं में मनुष्य जाति के बचने के रहस्य छुपे हैं। उन रहस्यों को समझाने के लिए कुछ लाख रसोइये चाहिए! “
विक्टर स्मेटाचेक के विचारों पर आधारित सोपान जोशी जी के लेख को यहां पढ़ा जा सकता है।
https://m-hindi.indiawaterportal.org/content/kaucha-laakha-rasaoiyae-caahaie/content-type-page/38150
शाकाहार के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता पर विविधतापूर्ण भारतीय समाज में अलग-अलग स्थानों पर रहने वाले मनुष्यों का आहार भी भिन्न-भिन्न है। बेहतर तो यही होगा कि लोग स्वेच्छा से शाकाहार को अपनायें। इसके लिए किसी भी तरह का बाहरी दबाव डालना तो अनुचित ही होगा। यह तो अलग प्रकार की हिंसा हो जाएगी। जबकि उद्देश्य तो अहिंसक समाज बनाना है।
इस संदर्भ में विनोबा जी की यह बात भी द्रष्टव्य है, ” व्यक्ति अपने जीवन में कितनी आहार-शुद्धि कर सकता है, इसकी कोई मर्यादा नहीं। हमारे समाज ने आहार-शुद्धि के लिए तपस्या की है। आहार-शुद्धि के लिए भारत में विशाल प्रयत्न, प्रयोग हुए हैं। उन प्रयोगों में हजारों वर्ष बीते। उनमें कितनी तपस्या लगी, यह कहा नहीं जा सकता। इस भूमंडल पर भारत ही एक ऐसा देश है, जहां कितनी ही पूरी-की-पूरी जातियां मांसाशन-मुक्त हैं। जो जातियां मांसाहारी हैं, उनके भी भोजन में मांस नित्य और मुख्य पदार्थ नहीं है और जो मांस खाते हैं, वे भी उस में कुछ हीनता अनुभव करते हैं। मन से तो वे भी मांस का त्याग कर चुके हैं। मांसाहार की प्रवृत्ति को रोकने के लिए यज्ञ प्रचलित हुआ उसी के लिए वह बंद भी हुआ। श्रीकृष्ण भगवान् ने तो यज्ञ की व्याख्या ही बदल दी। श्रीकृष्ण ने दूध की महिमा बढ़ायी। श्रीकृष्ण ने असाधारण बातें कुछ कम नहीं की हैं, परंतु भारत की जनता किस कृष्ण के पीछे पागल हुई थी? भारतीय जनता को तो ‘गोपालकृष्ण’ ‘गोपालकृष्ण’ यही नाम प्रिय है। वह कृष्ण, जिसके पास गायें बैठी हुई हैं, जिसके अधरों पर मुरली धरी है, ऐसा गायों की सेवा करने वाला गोपालकृष्ण ही आबाल-वृद्धों का परिचित है। गोरक्षण का बड़ा उपयोग मांसाहार बंद करने में हुआ। गाय के दूध की महिमा बढ़ी और मांसाहार कम हुआ।


   फिर भी संपूर्ण आहार शुद्धि हो गई हो, सो बात नहीं। हमें उसे आगे बढ़ाना है। बंगाली लोग मछली खाते हैं, यह देखकर कितने ही लोगों को आश्चर्य होता है। किंतु इसके लिए उन्हें दोष देना ठीक नहीं होगा। बंगाल में सिर्फ चावल होता है। उससे शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल सकता। इसके लिए प्रयोग करने पड़ेंगे। फिर लोगों में इस बात का विचार शुरू होगा कि मछली ना खाकर कौन-सी वनस्पति खायें, जिससे मछली के बराबर ही पुष्टि मिल जाए। इसके लिए असाधारण त्यागी पुरूष पैदा होंगे और फिर ऐसे प्रयोग होंगे। ऐसे व्यक्ति ही समाज को आगे ले जाते हैं। सूर्य जलता रहता है, तब जाकर कहीं जीवित रखने योग्य 98° उष्णता हमारे शरीर में रहती है। जब समाज में वैराग्य के प्रज्वलित सूर्य उत्पन्न होते हैं और जब वे बड़ी श्रद्धापूर्वक परिस्थितियों के बंधन तोड़कर बिना पंखों के ध्येयाकाश में उड़ने लगते हैं, तब कहीं संसारोपयोगी अल्प-स्वल्प वैराग्य का हममें संचार होता है।”

— अंकेश मद्धेशियास्वतन्त्र लेखक

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