लॉक डाउन में घर पर मछली

साल के जंगल में ताल की रोहू

अम्बरीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

फ़ोटो अम्बरीश
अम्बरीश कुमार

हफ्ता भर पहले सुबह टहलते हुए पत्रकार मित्र से बात हो रही थी तभी पता चला कि लखनऊ में मछली सरकार की तरफ से आन लाइन बेंचने की व्यवस्था की गई है .

मैंने दिलचस्पी दिखाई तो दूसरे दिन ही एक बड़े अफसर का संदेश फोन पर देखा जिसमें उन्होंने पूछा कि मुझे कितनी मछली चाहिए और कौन सी यानी रोहू ,कतला ,सोल ,सिंघी आदि में क्या चाहिए .

मैंने बताया कि अपना आधा परिवार शुद्ध शाकाहारी है .इसलिए किलो डेढ़ किलो से ज्यादा नहीं चाहिए .वह भी इसलिए कि जो आएगा वह आधा किलो मछली लेकर तो आएगा नहीं .बहरहाल कुछ देर बाद ही मत्स्य विभाग के भेजे हुए कोई सज्जन आए और डेढ़ किलो के करीब रोहू दे गए .उन्होंने आने से पहले सड़क पर ही खुद को सेनेटाइज किया और बहुत हाइजिन वाली पैकिंग में रोहू दे गए .

अब लाकडाउन के समय लखनऊ में फिशरीज डिपार्टमेंट की तरफ से मछली की सप्लाई का फैसला स्वागत योग्य है .रोहू ,कतला आदि तीन सौ से चार सौ रुपए किलो यहां मिल जाएगी .इनसे संपर्क फोन से कर आर्डर दे सकते हैं .इस टिपण्णी के अंत में संपर्क नंबर दिया जा रहा है .

मछली खाना चाहिए .प्रोटीन का अच्छा स्रोत है .लखनऊ में आलमबाग से लेकर हजरतगंज तक वे खुद सप्लाई करते हैं और अन्य इलाकों में दूसरे .

अपने को मछली का शौक छतीसगढ़ से लगा .वह भी मित्रों के चलते .वह भी लखौली के डाक बंगले में नियमित होती दावतों के चलते .ये दावत हर रविवार होती .शहर से तीस किलोमीटर दूर महानदी से निकली एक नहर के किनारे जो साल सागौन के जंगल से घिरा था .

मछली पालन

दरअसल यह शुरू हुआ वर्ष 2001 में .जब इंडियन एक्सप्रेस में रहते हुए ही अपने को छतीसगढ़ में जनसत्ता लांच करने की जिम्मेदारी दी गई .काम आसान नहीं था .काफी समय देना पड़ता था .इस पर एक दिन हिंदुस्तान के तत्कालीन ब्यूरो चीफ प्रदीप मैत्र ने कहा ,अंबरीश जी आप सब एडिटर की तरह क्यो काम करते है सारा घूमना फिरना बंद हो गया .तब तय किया रविवार का दिन बाहर काटा जाएगा .अपनी मंडली में उस समय प्रदीप मैत्र ,प्रकाश होता ,लव कुमार मिश्र ,अमिताभ तिवारी ,अल्लू चौबे ,राजकुमार सोनी आदि साथ रहते ही थे  .वरिष्ठ अफसर और निदेशक जनसंपर्क सीके खेतान भी यदा कदा कई दावतों में शामिल होते थे .

पर जनसत्ता निकलते- निकलते इस टीम में बदलाव हुआ और कई हट गए तो कई नए जुड़ गए .राज नारायण मिश्र अपने साथ जुड़े सूफी हो चुके राजनारायण मिश्र ने बाहर कुछ इंतजाम शुरू किया और व्यवस्था भी .कुछ दावत खेतों के बीच आयोजित हुई तो बाद में आरंग की तरफ २९ किलोमीटर दूर महानदी से निकली एक नहर के किनारे सिंचाई विभाग का भुतहा डाक बंगला सभी को पसंद आया गया जो लखौली में साल के पेड़ों से घिरा निर्जन इलाके में था और लगातार कई रविवार के लिए हमारे लिए बुक कर दिया गया .

इसमे दस बजे हम लोग जाते और परिवार के रूप में होता और अपना परिवार भी होता .दो कमरे जिसकी खिड़कियां   टूटी हुई थी वह आराम के लिए था ..पर ज्यादातर बैठकी बाहर ही बड़े लान में होती जो लान कम जंगल ज्यादा था और आने पहले चौकीदार साफ़ कर देता था ..उसके बाद लकड़ी इकठ्ठा होती और करीब बारह बजे तक चूल्हा जल जाता .इस बीच ठंढा गर्म दोनों तरह के पेय भी आ जाते और फिर तरह तरह की चर्चा .
नहर के किनारे यह डाक बंगला जंगल में मंगल मनाने जैसा था .इस महफ़िल में सामिष भी थे तो निरामिष भी और दोनों का खाना बनता .

प्रकाश होता ओडिशा के है और उनकी पत्नी बहुत अच्छा खाना बनाती है पर उन्हें मैंने अपने दिशा निर्देशन में ठेठ उत्तर भारतीय तरीके से सरसों और खट्टे देशी टमाटर में रोहू बनाने को कहा और जो बना तो चौकीदार के लिए भी नहीं बच पाया .

छत्तीसगढ़ में हर जगह ताल तालाब  हैं और मछली बड़े पैमाने पर पाली जाती है .हम लोग रोहू लेकर ही आते थे .रायपुर की मछली मंडी वैसे भी बहुत बड़ी है .यहां से कोलकाता तक मछली जाती है .उसी दौर में मछली की जो आदत पड़ी वह अभी भी जारी है .अ

ब लाकडाउन के समय लखनऊ में फिशरीज डिपार्टमेंट की तरफ से मछली की सप्लाई का फैसला स्वागत योग्य है .रोहू ,कतला आदि तीन सौ से चार सौ रुपए किलो यहां मिल जाएगी .

इनसे संपर्क फोन से कर आर्डर दे सकते हैं .दीपक कश्यप -9450096839 (फोन )

One Comment

  1. वाह अम्बरीश जी . मेरा भी यही शौक है .लखनऊ में 90 से 94 तह नभाटा बंद होने तक अकेला रहता था .काम ख़त्म करके नरही से एक पूरी रोहू लेता था .टाइम्स के कुछ बंगाली दोस्तों से मछली बनाना सीखा ..२ दिन वाह एक मछली चल जाती थी ..शानदार खाना है ,जब तक कोई कांटा गले में न अटके 🙂 अब जब कभी दिल्ली प्रेस क्लब की मछली खता हूँ …शायद आपने भी खाई होगी …शानदार रेसिपी है उनकी

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