गांधी का राम राज्य : मनुष्य स्वतन्त्र बनने से क्यों डरता है और दूर भागता है

गाँधी का रामराज स्वराज्य है जो वास्तविकता है कोई कल्पना की वास्तु नहीं है। आज के सन्दर्भों में इसे समझना इसलिए आवश्यक हो गया है,  क्योंकि आज की राज्य  व्यवस्था में नागरिक की सहभागिता का कोई स्थान नहीं है। राज्य की सारी व्यवस्था ,उसकी सारी  संस्थाएं   केवल उनके संरक्षण में हैं जो आम आदमी के शोषक और उत्पीड़क हैं।

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी ,प्रयागराज
 
  उत्तरआधुनिकता कालके बाद कोरोना कालमे एक साथ भय ,आतंक, व्यवस्था ,अव्यवस्था ,लाकड़ौन ,अनलॉक ,आत्मविश्वास ,आत्मनिर्भरता ,बचाव ,आशंका ,मास्क आदि आदि बहुत ढेर से निर्देशों के साथ झेलते हुए रोज ही ऐसी गतिविधियों निरंतर आँख के समक्ष नाचती रहती हैं ,स्वप्न में कौंधती रहती है जो न तो सोने देती है न जगाने देती है।

अपने ही देश में मजदूर प्रवासी कहलाता हुआ महानगरों से अपने गांव को पलायन करता है। पैदल पैर लहू लुहान हो जाते हैं। न भूतो न भविष्यति श्रमिक ट्रेने रास्ता भटक  जाती हैं। पद पैसा ,प्रतिष्ठा से संपन्न एक देश का वी आई पी विलाप करता है की पास में पैसा होने के बाद भी यदि उच्च स्तरीय सोर्स सिफारिश न हो तो जीना दुर्लभ है ,ईश्वर ऐसा दिन किसी को न दिखाए।

अस्पतालों में बेड की कमी है ,मारामारी है सरकारों में विपत्ति  में भी खींचातानी है. हे प्रभु सामान्य जन किक्या गति होगी। गांवों ,शहरों में कोरोना के अतिरिक्त अन्य किसी मर्ज के इलाज के अस्पतालबंद हैं। गंभीर इलाज कीअनुउपलब्धता ?सबकुछ प्रभुके भरोसे। होहिये वही जो राम रचि रखा के कीर्तन से ही तसल्ली है ?
 

कोरोना वायरस निश्चित ही दैवीय प्रकोप है ,इसी सन्दर्भ में रामराज याद आगयाजिसके बारे में कहा गया –दैहिक ,दैविक ,भौतिक तापा रामराज काहू नहि व्यापा। राज्य की आदर्श कल्पना रामराज स्थापित करने की रही है जिसमे प्रजा को हर प्रकार के सुख कीप्राप्ति होगी। संसारिकशोषण से मुक्ति मिलेगी ,भूख ,बेरोजगारी ,रोग ,भय ,आतंक किकोई आशंका न होगी। वैयक्तिक उत्थान में कोई रुकावट न होगी दैविक आपदाओं में ऐसा राज प्रजा कोकोई कष्ट होने देगी। राज्य की यह आदर्श परिकल्पना क्या पाया नहीं जा सकता।?
     

 गांधी ने आजाद भारत के लिए जनजीवन की सुख सुविधा का केंद्र मानकर जिस राज्य व्यवस्था  के स्थापना कीकल्पना की थी उसे उन्होंने रामराज के नाम से ही पुकारा था। इस शब्द कोउन्होंने दो रूपों में परिभाषित किया। एक –उसका धार्मिकअभिप्राय जिसका अर्थ है पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य। दूसरा –राजनितिक अभिप्राय जिसका अभिप्राय है पूर्ण प्रजातंत्र।

इस शासन व्यवस्था में अमीरी ,गरीबी ,रंग और मतमतान्तर के आधार पर स्थापित असामान्यता नगण्य होती है। गांधीके रामराज की परिकल्पना पर प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक आचार्य शंकर दत्तात्रेय जावड़ेकर ने एक स्थल पर लिखा है कि  जिस राज्य को समाजकी न्याय बुद्धि का आधार है ,जहाँ के कानून समाज के न्याय बुद्धि के आधार पर खड़े हैं।

न्यायबुद्धि से व्यवहार करने वाले मनुष्य को जिस  समाज में किसी भी कानून से प्रतिबन्ध नहीं होता। जिस समाज के सब व्यवहार मनुष्य के अंतःकरण की न्याय बुद्धि को आसानी से मान्य हो जाते हैं ,अन्याय से धन कमाना या सत्ता का दुरपयोग करना जिस समाज में असम्भव है और जहाँ की राजसत्ता प्रजा के संगठित आत्मबल के समक्ष झुक सकती है वही रामराज है।
   

 गाँधी का रामराज स्वराज्य है जो वास्तविकता है कोई कल्पना की वास्तु नहीं है। आज के सन्दर्भों में इसे समझना इसलिए आवश्यक हो गया है,  क्योंकि आज की राज्य  व्यवस्था में नागरिक की सहभागिता का कोई स्थान नहीं है। राज्य की सारी व्यवस्था ,उसकी सारी  संस्थाएं   केवल उनके संरक्षण में हैं जो आम आदमी के शोषक और उत्पीड़क हैं।

साम्यवाद ,लोकतान्त्रिक समाजवाद ,लोक कल्याणकारी  राज्यवाद इन समस्त प्रणालियों ने शक्तिशाली राज्य के अलग अलग रूप प्रकट किये जिसमे सामान्य नागरिक समाज के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं समझता। वह अपनी सुरक्षा , भोजन ,वस्त्र ,आवास ,शिक्षा ,चिकित्सा आदि की जिम्मेदारी राज्य को सौंपकर निर्द्वन्द रहना चाहता है। यह निर्द्वँदता आजादी नहीं एक प्रकार की निर्लज्ज गुलामी है जिसके संबंध में एरिक फोम ने अपनी पुस्तक –फियर आफ फ्रीडम में लिखा है कि  –मनुष्य स्वतन्त्र बनने से डरता है और  उससे दूर भागता है ,क्योंकि स्वतन्त्र व्यक्ति की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।
   

   आमनागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह होकर अपनी स्वतंत्रता का सौदा राज्य से कर बैठा है जिसने आम नागरिक को परतंत्रता और निष्क्रियता की ओर धकेल दिया है। इसका निदान उत्तर आधुनिकतावादी विकास की धारणा को चुनौती स्वदेशी समाज के अस्तित्व को बरकरार रख कर देने में है   यही रामराज है।

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