ओली और प्रचंड में फिलहाल युद्धविराम

लेकिन खतरा बरकरार, समझौते में राष्ट्रपति विद्यादेवी की भूमिका

यशोदा श्रीवास्तव, काठमांडू। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व पीएम प्रचंड के बीच अंततः समझौता हो गया।

समझौते के तहत प्रचंड को खास लाभ मिलता नहीं दिखा।

अलबत्ता उन्हें पूरे अधिकार के साथ कार्यकारी अध्यक्ष बने रहने को कहा गया है।

लेकिन वे सरकार के कामकाज में मनमाना हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे।

इस समझौते के पीछे राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की अहम भूमिका मानी जा रही है। वे पर्दे के पीछे हैं।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने बताया कि पीएम ओली और प्रचंड के बीच पैदा हुए सारे विवादों का समाधान कर लिया गया है।

यह समाधान शनिवार को प्रधानमंत्री कार्यालय बालुआटार में 13 सदस्यीय हाई पावर कमेटी की बैठक में हुआ।

कहा कि प्रचंड रहेंगे तो कार्यकारी अध्यक्ष ही लेकिन वे अध्यक्ष के सारे अधिकारों का प्रयोग कर सकेंगे।

हालांकि दोनों के बीच यह मेल मिलाप कब तक कायम रह सकेगा,नेपाल के राजनितिक टीकाकारों को इसमें संशय है।

काठमांडू में अगले कुछ दिनों में भारत और नेपाल के बीच होने वाली बड़ी उच्चस्तरीय बैठक की दृष्टि से ओली और प्रचंड के मेल मिलाप को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ओली की टीम भारत विरोधी, प्रचंड पक्षधर

अभी ओली की टीम में भारत विरोधियों की भरमार है जबकि  प्रचंड स्वयं और उनकी टीम के अधिकांश सदस्य भारत से मधुर संबंध के पक्षधर हैं।

पूर्व भारत विरोधी प्रचंड में भारत के प्रति यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों में आया है।
यह समझौता ओली के लिए बड़ी राहत है।

करीब दो माह से ओली और प्रचंड के बीच सत्ता को लेकर लुकाछिपी का खेल चल रहा था।

नेपाल की राजनीति का हाल यह था कि ओली की कुर्सी जाने में अबतब जैसी स्थिति थी।

बता दें कि ओली के नेतृत्व वाली नेकपा एमाले व प्रचंड के नेतृत्व वाली नेकपा माओवादी तीन साल पहले हुआ आम चुनाव एक साथ मिलकर लड़े थे।

यह बात यद्यपि कि सामने नहीं आयी लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों के बीच फिफ्टी फिफ्टी का समझौता था।

लेकिन ओली के सत्ता न छोड़ने से दोनों के बीच गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए थे।

इधर ओली की तबियत बिगड़ गई।

उन्हें अपनी दूसरी किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

इस बीच ढाई महीने और गुजर गए। प्रचंड खामोश थे।

ओली की तबीयत ठीक होने पर छिड़ी सत्ता की जंग

लंबे स्वास्थ्य विश्राम के बाद जब ओली सरकार चलाने में सक्रिय हुए,उसके फौरन बाद से प्रचंड और ओली के बीच सत्ता की जंग शुरू हो गई।

बीच में लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी का मुद्दा आ गया।

ओली ने इसे देशभक्ति का मुद्दा बनाकर भारत पर नेपाल के भूक्षेत्र पर कब्जे का झूठा आरोप मढ़ दिया।

उन्होंने इस मुद्दे को इतना गर्माया कि यहां तक कह दिया कि भारत उनकी सरकार गिराना चाहता है।

चूंकि ओली से इस्तीफे कि मांग प्रचंड कर रहे थे।

इसलिए ओली समर्थकों ने प्रचंड को भारत के हाथ की कठपुतली प्रचारित करना शुरू कर दिया।

घोर अंतरविरोध से जूझ रहे ओली ने अयोध्या को लेकर भी विवादित बयान दिया कि वह नेपाल के वीरगंज में है।

उन्होंने भारत पर नेपाल की संस्कृति पर अतिक्रमण करने का भी आरोप लगाया।

इस बयान से भी ओली की खूब किरकिरी हुई।

सत्ता के इस जोर आजमाइश में प्रचंड के नरम पड़ने के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं।

लेकिन इस मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस सांसद अभिषेक प्रताप शाह का कथन बड़ा स्पष्ट है जो कई संभावनाओं की ओर इंगित करता है।

उनका कहना है कि अभी फिलहाल ओली पूर्ण बहुमत मे हैं लेकिन सरकार पर ग्रहण लग चुका है।

येन-केन-प्रकारेण यदि ओली अपनी सरकार बचा लेते हैं तो यह महज कुछ दिन के लिए ही मुमकिन है।

अभिषेक शाह ने अपनी पार्टी का रुख साफ करते हुए कहा कि नेपाली कांग्रेस किसी से बंधी हुई नहीं है।

लेकिन नेपाल को मध्यावधि चुनाव से बचाने और राजनीतिक अस्थिरता रोकने के लिए जो भी सरकार बनाने की स्थिति में होगा, उसे समर्थन दे सकती है।

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