आने से पहले मैं “स” और “ श” का उच्चारण सीख कर आई

— गीता श्री, पत्रकार 

जब मैं दिल्ली आई ही थी. यहाँ आने से पहले मैं “स” और “ श” का उच्चारण सीख कर आई थी. उसका अभ्यास कॉलेज में ही कर लिया था. उस पर तो कंट्रोल हुआ लेकिन एक उच्चारण पर किसी ने ध्यान नहीं दिलाया . वो है – र और ड़ का फ़र्क़. न और ण का फ़र्क़ ! बोलने में. लिखने में कोई दिक़्क़त नहीं थी. बस उच्चारण का फ़र्क़ था. एकाध बार मेरे मित्रों ने मुझे बहुत चिढ़ाया – “घोरा सरक पर फ़राक फराक दौरता है “
मुझे कहते – ठीक से बोल कर दिखाओ. मैं कोशिश करती कि घोड़ा बोलूँ , मगर घोरा ही निकले. फिर घोड़ा से मैंने माफ़ी माँगी. बोलने से बचने लगी. मित्रों ने चिढ़ाना नहीं छोड़ा. एक बार की बात है. विनोद भारद्वाज जी के साथ एक पार्टी से लौटते हुए मैंने उनसे कहा – विनोद जी , मैं उर ( उड़) रही हूँ. …!
मैं अगले दिन भूल गई. उनको याद रहा. वे जब भी मिलते , मुझे छेड़ते – मैं उर रही हूँ…
मैं झेंप जाती. वे कहते – बहुत अच्छा लगता है जब आप बोलती हैं. झेंपिए मत. अब ये मेरे लिए चैलेंज . कैसे ठीक करुं? ये सब स्कूल से ही सीखते हैं या परिवेश से. हमारे ज़िले में ये समस्या है. समूचे बिहार में ऐसा नहीं है.
तो बाद में मैंने अभ्यास किया. अकेले में ख़ूब घोड़ा , उड़ना बोला. इतना कि घोड़ों को हिचकी आने लगी होगी और पंक्षियो ने उड़ान भर ली होगी.
ख़ैर ! लोग मुझसे बात करते तो समझ जाते कि खांटी बिहारी है और सीधे क़स्बे से निकल कर आई है. “मैं “ की जगह “हम” बोलती थी. हम जा रहे, हम कर लेंगे, हम देख लेंगे

धीरे धीरे ये भी ठीक किया. दोस्त लोग चिढ़ाते थे – हम .. मतलब कितने लोग ?
फिर धीरे -धीरे आदत बनाई कि हम की जगह मैं बोलूँ. अब सामंती परिवार से हूँ तो वहाँ आज भी हम ही बोलते हैं, मैं की अवधारणा नहीं है. इसका सामाजिक कारण है. वहाँ समूह में बात होती है, समूह की बात होती है. व्यक्तिवाद नहीं है. इस पर फिर कभी. तो क़िस्सा कोताह ये कि अब हमने काफ़ी हद तक सुधार कर लिया है. कभी -कभी कस्बाई उच्चारण झांक जाता है. उसके लिए विद्वानों की सभा से माफ़ी माँगते हुए कुछ बातें बताना चाहती हूँ.
जिस दिन मैं अपने हरियाणा के दोस्त से मिली – वो कभी प्रेस नहीं बोलता था. प्रैस बोलता था. हमें पुकारता – ओ सुण !
फिर एक मध्य प्रदेश का मित्र . वो कभी बैंक ना बोले. ऑफिस में साथ काम करते थे . बोलते – मैं बेंक जा रहा हूँ, पेसे निकालने.
वे फ़िल्मों पर लेख लिखते – बड़े बेनर ( बैनर) की फ़िल्म . हम उनकी कॉपी सुधारते जाते. उन्हें बताते , उनकी आदत गई नहीं. अंत तक ऐसे ही बोलते रहे, लिखते रहे. इन दो मित्रों ने मुझे सिखाया कि कुछ भी हो, अपनी भाषा , बोली का फ़्लेवर नहीं छोड़ो. यही पहचान है तुम्हारी. किसी की ख़ातिर क्यों बदलना? लिखने में गलती नहीं होनी चाहिए. फिर मैं एक बार अपने शहर गई. सरदार जी की रेडीमेड कपड़ों की दूकान है. वो समझे मैं दिल्ली से आई हूँ तो लगे अंग्रेज़ी बोलने. फिर हिंदी पर आए. शहर छोड़ने से पहले जब कपड़े लेने गई थी , तब तक बज्जिका में बात करते थे. दिल्ली से लौटते उनको लगा कोई तोप आई है.
मैंने उनसे कहा- अपने एकदम्मे बदल गेली. सरदार जी मेरी दीदी की तरफ़ मुड़ कर बोले- ई गीता त तनिको न बदलई हो.. ओइसने हई !! हम त बूझली कि दिल्ली के हवा लागल होतई उनके चेहरे पर ख़ुशी का जो भाव था, वह शब्दों से परे. तो हम कुलीन लोगों के बीच संभल कर उच्चारण करते हैं और अपने शहर में ज़ुबान को फ़्री कर देते हैं. जो मुँह से निकले. हिंदी में या बज्जिका में.कोनो दिक़्क़त ?? हिंदी की प्रतिष्ठा कम हो जाती है तो बोलिए !

ज़ुबान काट लेंगे … दांत से.

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