राम मंदिर में दान की लूट कैसे रुके? व्यवस्थागत खामियां और सार्वजनिक ट्रस्ट की अनिवार्य आवश्यकता

 विफलता की मूल जड़: 'निजी' बनाम 'सार्वजनिक' ट्रस्ट

राम दत्त त्रिपाठी (वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व बीबीसी संवाददाता)

Ram Dutt Tripathi
Ram Dutt Tripathi , senior journalist

भूमिका: करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर प्रहारअयोध्या में प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक इमारत का निर्माण नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर फैले करोड़ों सनातनियों और रामभक्तों की अगाध श्रद्धा, त्याग और सदियों की प्रतीक्षा का प्रतिफल है। देश-विदेश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी गाढ़ी कमाई का अंश इस पावन कार्य में दान और चढ़ावे के रूप में समर्पित कर रहे हैं। लेकिन हाल ही में राम मंदिर के चढ़ावे में बड़े पैमाने पर हुई हेराफेरी और लूट की घटनाओं ने हर सच्चे रामभक्त को झकझोर कर रख दिया है। विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट में यह सामने आना कि मात्र 40 दिनों के भीतर गर्भगृह और काउंटर से 70 से अधिक बार चोरी व गबन की वारदातों को अंजाम दिया गया, एक अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय है।

इस मामले में कुछ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने, आठ लोगों की गिरफ्तारी और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय व ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे जैसी प्रशासनिक हलचलों ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि भीतर सब कुछ ठीक नहीं था। परंतु, वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी, जिन्होंने पिछले 40 वर्षों से अयोध्या आंदोलन और राम मंदिर निर्माण की बहुत करीब से रिपोर्टिंग की है, का मानना है कि सवाल केवल कुछ व्यक्तियों को जेल भेजने या कुछ पदाधिकारियों के बदल जाने का नहीं है। **असली सवाल यह है कि हमारी पूरी संस्थागत व्यवस्था (Institutional System) कहां और क्यों फेल हुई? केवल कुछ मोहरों को जेल भेज देने या चेहरों को बदल देने से इस राष्ट्रीय आस्था के केंद्र की शुचिता बहाल नहीं हो सकती। जब तक इस विफलता के मूल कारणों पर चोट नहीं की जाएगी, तब तक श्रद्धालुओं के इस पावन चढ़ावे को सुरक्षित रख पाना असंभव होगा।**

लूट का मौका क्यों मिला? आंतरिक चेतावनियों की अनदेखी

यह चोरी कोई अचानक या अनजाने में हुई घटना नहीं है, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और वित्तीय लूपहोल (खामी) का नतीजा है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि मंदिर प्रबंधन के भीतर ही कई जिम्मेदार लोगों ने इस गड़बड़ी को पहले ही भांप लिया था। राम मंदिर निर्माण में लगे एक प्रमुख इंजीनियर दीनानाथ वर्मा और लेखा व कैश विभाग की देखरेख करने वाले पदाधिकारियों ने बहुत पहले ही ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व को आगाह कर दिया था।

उन्होंने स्पष्ट रूप से इत्तला दी थी कि नकदी का गबन : दान काउंटरों पर आने वाले नोटों की गड्डियों में भारी विसंगतियां थीं। कागजों पर जितनी संख्या दिखाई जा रही थी, तिजोरियों और जमा खातों में उतनी राशि नहीं पहुंच रही थी।ट्रस्ट के पूर्व लेखाकार महीपाल सिंह और इंजीनियर दीनानाथ वर्मा के कहना है कि उन्होंने इसके बारे में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को बताया था, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय उनको ही बाहर कर दिया गया। 

सामग्री की खरीद में कमीशनखोरी:

मंदिर परिसर और कार्यालयों के निर्माण के लिए आ रहे माल (जैसे सीमेंट, एल्युमिनियम की खिड़कियां-दरवाजे) में ओवर-बिलिंग हो रही थी। यदि वास्तव में 200 बोरी सीमेंट की खपत हो रही थी, तो खातों में 300 बोरियां दर्ज की जा रही थीं।इसकी जानकारी भी टेस्ट के पदाधिकारियों को दी गई थाई। 

बहुमूल्य धातुओं की रसीद न होना

 देश भर से आए श्रद्धालुओं ने भव्य राम मंदिर के लिए कई-कई किलो चांदी की ईंटें, चांदी के दीये, खड़ाऊं और मूर्तियां दान कीं। भक्तों ने श्रद्धावश इसके वीडियो भी बनवाए, लेकिन उनमें से कई दानों की कोई आधिकारिक और पुख्ता रसीद प्रणाली लागू नहीं की गई।

यदि शुरुआत में ही, जब जमीन खरीद के विवाद सामने आए थे या जब ये आंतरिक शिकायतें आईं थीं, तभी केंद्र या राज्य सरकार द्वारा सख्त एसआईटी (SIT) जांच कराकर बड़ी कार्रवाई कर दी गई होती, तो अपराधियों का ऐसा दुस्साहस कभी न होता।

 विफलता की मूल जड़: ‘निजी’ बनाम ‘सार्वजनिक’ ट्रस्ट

इस पूरे वित्तीय झोल और प्रबंधन की विफलता का सबसे बड़ा कारण वह कानूनी ढांचा है जिसके तहत इस ट्रस्ट का गठन किया गया था। जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवादित भूमि भगवान राम लला विराजमान के पक्ष में देकर सरकार को मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन के लिए व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया, तब केंद्र सरकार ने एक “प्राइवेट ट्रस्ट” (निजी न्यास) का स्वरूप तैयार कर दिया।

इस ढांचे में तीन सबसे बड़ी कमियां थीं:

 1. व्यावसायिक कॉम्पिटेंस (योग्यता) का अभाव: ट्रस्ट के मुख्य नीतिगत पदों पर उन लोगों को बिठाया गया जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) या विश्व हिंदू परिषद (VHP) द्वारा नामजद थे। यद्यपि इन संगठनों का आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान रहा है, परंतु एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के धार्मिक संस्थान, जहां प्रतिदिन लाखों लोग आते हैं और हजारों करोड़ का टर्नओवर है, उसे संभालने के लिए जिस आधुनिक प्रशासनिक, प्रबंधकीय और वित्तीय विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, वह इन पदाधिकारियों के पास नहीं थी।

 2. सख्त ऑडिट का न होना: प्राइवेट ट्रस्ट होने के कारण इसके खाते आम जनता, विधायी नियंत्रण या किसी कड़े सरकारी वैधानिक ऑडिट के दायरे से बाहर रहे।

 3. पदेन अधिकारियों की मूक मूकदर्शिता: ट्रस्ट में जिलाधिकारी (DM), उत्तर प्रदेश सरकारा के गृह सचिव, केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव गृह सचिव और नृपेन्द्र मिश्रा जैसे वरिष्ठ लोग शामिल तो रहे, लेकिन व्यावहारिक नियंत्रण गैर-प्रशिक्षित निजी हाथों में ही रहा, जिससे नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का पूरी तरह अभाव दिखा।

 तिरुपति और वैष्णो देवी का गवर्नेंस मॉडल क्या सिखाता है?

भारत में सदियों से कई ऐसे विशाल मंदिर रहे हैं जहां प्रतिदिन करोड़ों का चढ़ावा आता है, लेकिन वहां इस प्रकार की अराजकता नहीं दिखती। इसका कारण उनका संस्थागत ढांचा है।

तिरुपति बालाजी (आंध्र प्रदेश): 

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) का प्रबंधन आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित एक विशेष कानून (Act) के तहत होता है। यह एक Statutory Public Trust (वैधानिक सार्वजनिक ट्रस्ट) है। इसके बोर्ड में केवल धार्मिक लोग नहीं होते, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, शीर्ष स्तर के आईएएस (IAS) अधिकारी, वित्तीय विशेषज्ञ और चार्टर्ड अकाउंटेंट शामिल होते हैं। वहां तकनीक और ऑडिट की ऐसी त्रिस्तरीय व्यवस्था है कि चढ़ावे की एक पाई भी इधर-उधर नहीं हो सकती।

श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड:

 इसका गठन भी विशेष विधायी अधिनियम के तहत किया गया है, जिसके अध्यक्ष पदेन राज्यपाल होते हैं और संचालन आईएएस स्तर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) करते हैं। वहां की संपूर्ण व्यवस्था पारदर्शी, जवाबदेह और पूरी तरह ऑडिटेड होती है।

यदि इन बड़े मंदिरों को सरकारी और विधायी अधिनियम के नियमों के तहत पूरी शुचिता और गरिमा के साथ चलाया जा सकता है, तो अयोध्या के राम मंदिर को एक निजी संस्था या ‘परिवार’ की तरह क्यों चलाया जा रहा है?

श्रद्धालुओं के दान की सुरक्षा के लिए ठोस नीतिगत सुझाव

भविष्य में ऐसी किसी भी ‘लूट’ या भक्तों की आस्था पर प्रहार को रोकने का एकमात्र स्थायी और नीतिगत समाधान यही है कि वर्तमान व्यवस्था को पूरी तरह बदला जाए:

 1. संसद या यूपी विधानसभा द्वारा कानून बने: केंद्र सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार को तत्काल विधायी कदम उठाते हुए अयोध्या की 68 एकड़ सरकारी भूमि और राम मंदिर परिसर को नियंत्रित करने के लिए एक Statutory Public Trust (सार्वजनिक वैधानिक ट्रस्ट) का कानून बनाना चाहिए।

 2. पुराने ट्रस्ट का विलय: वर्तमान ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को भंग कर उसे इस नए सार्वजनिक वैधानिक ट्रस्ट में समाहित कर देना चाहिए।

 3. विशेषज्ञों का बोर्ड: नए बोर्ड में आध्यात्मिक गुरुओं और धर्माचार्यों के साथ-साथ लीगल एक्सपर्ट्स, प्रशासनिक अधिकारियों (IAS) और वित्तीय विशेषज्ञों (Financial Experts) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।

 4. डिजिटल रसीद और बारकोडिंग: नकद से लेकर सोने-चांदी के एक-एक दानों की प्रविष्टि बारकोड और डिजिटल रसीद के जरिए रियल-टाइम में होनी चाहिए। पूरे खाते का वार्षिक ऑडिट भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) या किसी शीर्ष स्वतंत्र ऑडिट एजेंसी द्वारा किया जाना चाहिए।

 निष्कर्ष और नागरिकों का दायित्व

प्रभु श्री राम का मंदिर सत्य, मर्यादा और धर्म का प्रतीक है। इसके प्रबंधन में किसी भी प्रकार का अधर्म या भ्रष्टाचार असहनीय है। समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारा जाए।

देश के सभी जागरूक नागरिकों, सामाजिक संगठनों, सांसदों और विधायकों का यह दायित्व है कि वे माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह मांग करें कि राम मंदिर के लिए तिरुपति की तर्ज पर एक ‘सार्वजनिक ट्रस्ट’ बनाया जाए। केवल संस्थागत पारदर्शिता और कड़े नियम ही राम मंदिर के चढ़ावे को सुरक्षित रख सकते हैं और भक्तों की आस्था को अक्षुण्ण रख सकते हैं।


लेखक परिचय: लेखक राम दत्त त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व बीबीसी संवाददाता हैं। उन्होंने पिछले चार दशकों से अयोध्या आंदोलन, इसके विधिक पहलुओं और राम मंदिर निर्माण की प्रक्रियाओं की अत्यंत निकटता से निष्पक्ष रिपोर्टिंग की है।


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