अमेरिका ईरान–इज़राइल संघर्ष, आर्थिक संकट और भारत का सामाजिक संतुलन

क्या अमेरिका ईरान–इज़राइल संघर्ष भारत में सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है?

वी के पंत 

V K Pant , Writer

पश्चिम एशिया में ईरान–अमेरिका इज़राइल संघर्ष केवल एक दूरस्थ भू-राजनीतिक घटना नहीं है; इसका प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था के माध्यम से हमारे दैनिक जीवन तक पहुँच रहा है। भारत जैसे देश, जो वैश्विक ऊर्जा और व्यापार तंत्र से गहराई से जुड़े हैं, इस संकट के आर्थिक दबाव को महसूस कर रहे हैं।

लेकिन इतिहास और राजनीतिक विज्ञान यह भी बताते  है कि आर्थिक संकट केवल आर्थिक नहीं रहते—वे समाज की सोच, राजनीति की दिशा और लोगों के आपसी संबंधों को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम इन चुनौतियों का सामना समझदारी और सह-अस्तित्व की भावना से करेंगे, या उन्हें विभाजन और सांप्रदायिक तनाव में बदलने देंगे।

आर्थिक संकट और सामाजिक असुरक्षा

अर्थशास्त्री Karl Polanyi ने अपनी पुस्तक The Great Transformation में लिखा था:  “जब बाजार की शक्तियाँ समाज को अस्थिर करती हैं, तो समाज स्वयं को बचाने के लिए प्रतिक्रिया करता है और यह प्रतिक्रिया हमेशा तर्कसंगत नहीं होती।”

जब महंगाई बढ़ती है, रोजगार घटते हैं और भविष्य अनिश्चित हो जाता है, तो समाज में असुरक्षा और असंतोष पैदा होता है। यह असंतोष यदि सकारात्मक दिशा न पाए, तो वह किसी “दोषी” की तलाश में भटक सकता है।

पहचान की राजनीति का उभार

नोबेल विजेता Amartya Sen ने Identity and Violence में चेतावनी दी है: “जब लोगों को उनकी बहुआयामी पहचान से काटकर एक ही पहचान में सीमित किया जाता है, तो विभाजन और हिंसा की संभावना बढ़ जाती है।” 

आर्थिक संकट के समय लोग अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान में सुरक्षा खोजते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ सांप्रदायिक राजनीति को जमीन मिल सकती है।

इतिहास के संकेत: संकट और कट्टरता

इतिहासकार Eric Hobsbawm ने Age of Extremes में Great Depression का उल्लेख करते हुए दिखाया कि आर्थिक तबाही ने समाज को इस हद तक अस्थिर कर दिया कि लोगों ने सरल लेकिन खतरनाक समाधानों को स्वीकार कर लिया। 

•   Great Depression के बाद जर्मनी में कट्टर राष्ट्रवाद और नाजी राजनीति का उभार. 

•   2008 की वैश्विक मंदी के बाद कई देशों में प्रवासी विरोधी और दक्षिणपंथी राजनीति का बढ़ना.

• कई देशों में आर्थिक तनाव के समय सांप्रदायिक तनावों में वृद्धि के उदाहरण मिलते हैं.

राजनीति की भूमिका: दिशा या भटकाव

राजनीतिक चिंतक Hannah Arendt ने The Origins of Totalitarianism में लिखा: “असुरक्षित और अलग-थलग व्यक्ति उन विचारधाराओं की ओर आकर्षित होता है, जो उसे स्पष्ट दुश्मन और आसान उत्तर देती हैं।” यदि आर्थिक संकट के दौरान राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदारी नहीं निभाता, तो ध्यान असली मुद्दों से हटाकर भावनात्मक और सांप्रदायिक मुद्दों की ओर मोड़ा जा सकता है।

भारतीय संदर्भ: संवेदनशील संतुलन

भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और चुनौती भी। समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया  ने कहा था “आर्थिक असमानता और गरीबी सांप्रदायिकता की उर्वर भूमि तैयार करती हैं।” यदि वैश्विक संकट के कारण भारत में आर्थिक दबाव बढ़ता है, तो सामाजिक संतुलन बनाए रखना और भी कठिन हो सकता है।

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति और जनता का कर्तव्य

ऐसे समय में धर्मनिरपेक्षता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक सक्रिय जिम्मेदारी बन जाती है। भारत के आधुनिक विचारकों महात्मा गांधी, नेहरू, अंबेडकर, लोहिया तथा अन्य ने  बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि सामाजिक संतुलन केवल कानूनों से नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना से बनता है। इन विचारों के आलोक में आज की चुनौती और स्पष्ट हो जाती है—यदि आर्थिक संकट और वैश्विक तनाव के दौर में समाज अपनी संवैधानिक चेतना और बहुलतावादी दृष्टि को बनाए नहीं रखता, तो विभाजनकारी शक्तियाँ आसानी से उसे अपनी दिशा में मोड़ सकती हैं। इसलिए यह समय केवल आर्थिक प्रबंधन का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी निभाने का भी है।

धर्मनिरपेक्ष राजनीति करने वालों की जिम्मेदारी

1. सकारात्मक एजेंडा प्रस्तुत करना

धर्मनिरपेक्षता को केवल विरोध तक सीमित न रखकर रोजगार , शिक्षा ,स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय  जैसे मुद्दों पर ठोस कार्यक्रम देना होगा।

2. डर नहीं, विश्वास की राजनीति

Hannah Arendt के अनुसार: “राजनीति का उद्देश्य साझा दुनिया बनाना है।” इसलिए नेताओं को समाज में विश्वास और संवाद को बढ़ावा देना होगा।

3. नैतिक साहस

लोकप्रियता के दबाव में भी सही बात कहना ही सच्ची धर्मनिरपेक्ष राजनीति है। राम मनोहर लोहिया के अनुसार: “राजनीति का असली धर्म कमजोर के साथ खड़ा होना है।”

जनता (नागरिकों) की जिम्मेदारी

1. आलोचनात्मक सोच और सूचना की जांच

अफवाहों और भ्रामक खबरों से बचना आज सबसे बड़ा कर्तव्य है।

2. बहुआयामी पहचान का सम्मान करना:

Amartya Sen के अनुसार: “एक व्यक्ति केवल एक पहचान नहीं होता।” संकट के समय इस बहुआयामी पहचान का सम्मान नागरिक का परम कर्तव्य है। 

3. संवाद और सह-अस्तित्व

समाज का ताना-बाना रोजमर्रा के रिश्तों से बनता है—उन्हें मजबूत करना जरूरी है।

4. आर्थिक मुद्दों पर फोकस

जब नागरिक रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सवाल पूछते हैं, तो ध्यान भटकाने वाली राजनीति कमजोर होती है।

निष्कर्ष: 

असली परीक्षा का समय

ईरान–इज़राइल संघर्ष भारत के लिए केवल बाहरी संकट नहीं, बल्कि एक आंतरिक परीक्षा भी हो सकता है। सभ्यता की असली कसौटी संकट के समय उसका व्यवहार होता है। भारत के सामने चुनौती स्पष्ट है:

• क्या हम आर्थिक संकट को सामाजिक विभाजन में बदलने देंगे? 

• या इसे समझदारी, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों से संभालेंगे? 

अंततः, यह सरकार या नेताओं के अतिरिक्त,  नागरिक का भी निर्णय होगा किभारत डर और विभाजन की दिशा में जाएगा, या समझ और सह-अस्तित्व की दिशा में।

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लेखक परिचय:

वी. के. पंत Physics भौतिकी में स्नातकोत्तर हैं और भारत सरकार के दूरसंचार विभाग में इंडियन रेडियो रेगुलेटरी सर्विस (IRRS) के अधिकारी के रूप में सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। विज्ञान के साथ-साथ उनकी रुचि साहित्य, इतिहास और Gandhian philosophy में है। वे भारतीय समाज की संरचना, मानव सभ्यता के इतिहास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे विषयों पर नियमित अध्ययन और लेखन करते हैं।

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