क्या भारतीय गाँव खत्म हो रहे हैं? अशोक से आज तक ग्राम व्यवस्था का सच
(मीडिया स्वराज डेस्क )
भारत की राजधानी कई बार बदली, राजा , महाराजा, साम्राज्य उठे और गिरे, लेकिन गाँव बना रहा।
मौर्य से मुगल और अंग्रेज़ों से आधुनिक भारत तक — गाँव इस सभ्यता की रीढ़ रहा।
फिर ऐसा क्या हुआ कि आज वही गाँव, जिसे कभी “लिटिल रिपब्लिक” कहा जाता था, कई जगह सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन केंद्र जैसा दिखने लगा है?
यह सिर्फ भावनात्मक सवाल नहीं — हकीकत से जुड़ा सवाल है।
अशोक से गुप्त काल: केंद्रीकरण के बीच स्थानीय जीवन
Ashoka के समय केंद्रीकृत शासन था, कर वसूली व्यवस्थित थी, पर गाँव अपनी सामाजिक संरचना के साथ जीवित था।
गुप्त काल में भूमि अनुदानों के बावजूद ग्राम-स्तरीय सभाएँ सक्रिय रहीं।
सत्ता ऊपर थी, पर जीवन नीचे।
मुगल काल: राजस्व व्यवस्था, पर सामाजिक स्वायत्तता
Akbar के शासन में भूमि राजस्व प्रणाली परिष्कृत हुई।
कर निर्धारण हुआ, ज़मींदार आए, पर पंचायतें सामाजिक विवाद सुलझाती रहीं।
गाँव आर्थिक इकाई था . सामाजिक रूप से संगठित और जीवंत।
ब्रिटिश काल: पहली बड़ी दरार
स्थायी बंदोबस्त और नकदी फसलों की नीति ने गाँव की आत्मनिर्भरता तोड़ी।
हथकरघा , बुनकर, कुम्हार, लोहार — मशीन और आयातित वस्तुओं के सामने टिक नहीं सके।
गाँव बाज़ार का हिस्सा बना, पर नियंत्रण स्थानीय नहीं रहा।
आज का भारत: पंचायत है, पर शक्ति कितनी?
73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला।
लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतें, लाखों निर्वाचित प्रतिनिधि — यह लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन:
• पंचायतों की आय का बड़ा हिस्सा केंद्र/राज्य अनुदानों पर निर्भर
• स्थानीय कराधान शक्ति सीमित
• योजनाएँ ऊपर से तय
NITI Aayog की आकलन रिपोर्टें भी ग्राम-स्तर पर वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने की जरूरत रेखांकित करती हैं।
क्या यह विकेंद्रीकरण है — या प्रशासनिक विस्तार?
आँकड़े जो कहानी कहते हैं
• भारत की लगभग 63–65% आबादी अब भी ग्रामीण
• कृषि का GDP में योगदान ~15–17%
• पर कार्यबल का ~45% कृषि पर निर्भर
अर्थात — गाँव श्रम देता है, पर आय का बड़ा हिस्सा शहरों और कॉर्पोरेट संरचनाओं में केंद्रित है।
कुटीर उद्योगों की गिरती संख्या और युवाओं का पलायन इस संकट को और गहरा करते हैं।
ग्राम स्वराज बनाम केंद्रीकृत विकास
Mahatma Gandhi गाँव को लोकतंत्र की जड़ मानते थे — आत्मनिर्भर, नैतिक और विकेंद्रीकृत।
इसके विपरीत, आधुनिक विकास मॉडल बड़े उद्योग और केंद्रीकृत योजना पर आधारित रहा, जिसकी दिशा तय करने में Jawaharlal Nehru की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
आज डिजिटल शासन और DBT पारदर्शिता बढ़ाते हैं, पर स्थानीय नीति-निर्माण सीमित भी कर सकते हैं।
असली सवाल
क्या गाँव अब भी निर्णय लेता है —
या केवल फाइलें और पोर्टल अपडेट करता है?
क्या पंचायत स्थानीय लोकतंत्र है —
या सरकारी कार्यक्रमों की शाखा?
इतिहास बताता है कि गाँव तब फलता है जब उसे निर्णय और उत्पादन की स्वतंत्रता मिलती है।
वर्तमान संकेत देता है कि यह स्वतंत्रता सीमित हो गयी है।
Media Swaraj का सवाल
गाँव विकास का “लाभार्थी” नहीं — लोकतंत्र की नींव है।
यदि पंचायतों को वित्तीय और नीतिगत स्वतंत्रता नहीं मिली, तो ग्राम स्वराज केवल पाठ्यपुस्तक की अवधारणा बन जाएगा।
( With help from AI tools )


