क्या पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर चलेंगे पवार की राह पर ?

जगदीप सिंह सिंधु, वरिष्ठ पत्रकार

क्या पंजाब में क्या कैप्टन अमरिन्दर चलेंगे पवार की राह पर चलेंगे, यह सवाल चर्चा का विषय है. पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ समय से चल रही हलचल के परिणाम आखिरकार धरातल पर असंतुष्ट खेमे की जीत के रुप में सामने आ ही गये. अपनी कार्यशैली और महाराजा के अन्दाज के कारण पिछले काफी समय से कैप्टन अमरिन्दर अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के निशाने पर रहे.

कांग्रेस के केंद्रीय  नेतृत्व से अच्छे संबंधों  के कारण कै अमरिन्दर अपनी स्थिति  को बार – बार संभालने मे सफल होते रहे. 2017 में कांग्रेस ने 10 बरस के वनवास के बाद कै. अमरिन्दर की अगुवाई में ही पंजाब मे फिर से सत्ता प्राप्त की थी.

कैप्टन अमरिंदर ने अपनी सियासत की छवि  के केंद्र मे अपनी राजसी विरासत  को हमेशा रखा. अपने विरोधियों को छोटा बनाने और बौना करने के मौके भी कभी नहीं चूके .अपनी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा की परदेदारी भी नहीं की .राष्ट्रीयता और राष्ट्रसेवा की प्राथमिकता को अपने भूतपूर्व सैनिक होने से जोड़ कर बार – बार सामने भी रखते रहे.पंजाब से एक विशेष मोह के कारण कैप्टन ने पंजाब प्रदेश को  ही अपनी कर्मभूमि बनाये रखा पांच बार पंजाब विधानसभा के चुनाव मे सफल रहे तीन बार प्रदेश कांग्रेस के मुखिया रहे .

हाल के पंजाब के घटनाक्रम में नवजोत सिंह सिद्धू को अहमियत मिलने और खुद को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने से कैप्टन अमरिंदर नाराज हैं। आनेवाले 2021 के पंजाब विधानसभा के चुनाव के लिये कांग्रेस की बढ़ी हुयी चुनौतियों ,बदलते समीकरणों  और किसानों के आन्दोलन से बदले हालात को देखते हुये कांग्रेस आलाकमान ने भी कै  की कार्यशैली को ‘आई  ऐम  सौरी  कैप्टन ‘ कह कर विराम लगा दिया . आलाकमान पर दबाव बनाने की रणनीति के माहिर कैप्टन अमरिन्दर को ऐसे निर्णय की उम्मीद नहीं थी. लेकिन अभी कुछ इंतजार कर रही आलाकमान कितने और समय तक कैप्टन  को स्वीकार करेगी यह प्रश्न भी बना  हुआ है.

राजनीति  के सफर में  कैप्टन अमरिन्दर ने कई मौकों पर पार्टी हाई कमान को अनदेखा  करते हुये फैसले लिये थे. 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार में भारतीय फौज के स्वर्ण मंदिर में की गयी कार्यवाही के फैसले से आहत हो कर पार्टी छोड़ दी थी. हरियाणा के साथ पानी बंटवारे को लेकर भी पार्टी के मत व सुझाव के विरूद्ध  सतलज यमुना लिंक नहर  समझौता रद्द  कर दिया था.अपने राजनीतिक कद को पार्टी के समानांतर रखने के प्रयासों में खुले बयान देने से भी नहीं हिचके. अपने खिलाफ लगे आरोपों को कभी गंभीरता से न मानते हुये उपहास व तंज करके खारिज करना कैप्टन की  नियति  रही है .पंजाब मे हुये राजनीतिक घटनाक्रम मे कै. अमरिन्दर के बेबाक बयानों का योगदान भी कम नहीं .

सोनिया गांधी के सलाहकारों पर सवाल उठाना व राहुल गांधी  प्रियंका वाड्रा की राजनीतिक समझ को कटघरे मे खड़ा  करने वाले बयान मे कैप्टन अमरिन्दर की हताशा साफ दिखाई देती है . नवजोत सिद्धू को आनेवाले 2021 के विधानसभा चुनावों में हराने  के लिये किसी मजबूत उम्मीदवार को खड़ा  करने के बयान  से कैप्टन पार्टी से नाता तोड़ने के संकेत स्पष्ट कर रहे हैं .

चुनावों के करीब होने के कारण तेजी से बदलते समीकरणों में  कई तरह की होने लगी हैं. अचानक विपक्षी राजनीतिक  दलों को कैप्टन अमरिन्दर मे संभावनाएँ  दिखाई  देने लगी.भाजपा सुर बदल कर अब कैप्टन अमरिन्दर की राष्ट्रीयता की प्रशंसा करने लगी. भाजपा से बढती नजदीकियों की चर्चा पहले भी  कैप्टन अमरिन्दर बारे मे खूब जोर पकड़ती रही है. हालाँकि राष्ट्रीयता के सवाल को  कैप्टन अमरिन्दर ने नवजोत सिंह सिद्धू के बारे मे बयान दे कर खुद खड़ा  किया है .राज्य को सीमावर्ती क्षेत्र बताते हुये पाकिस्तान से होनेवाले खतरों की आशंका को इस समय पे फिर से गिना दिया .

राजनीति में पाँच  दशक की लम्बी पारी खेलते हुये 2017 मे अपने आखिरी चुनाव की घोषणा कर चुके कैप्टन अमरिन्दर अपना कोई  राजनीतिक वारिस नहीं स्थापित कर पाये. प्रदेश में पार्टी को संगठित कर एक जुट रखने में भी असफल ही सिद्ध हुए .उमर के  इस पड़ाव पर एक बार फिर खुदको आजमाने की चाह से भी मुक्त नहीं हो सके. कांग्रेस में  रहते हुये अब ये संभावनाएँ  बहुत सीमित हो गयी हैं. अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये नये विकल्प की तलाश ही एकमात्र रास्ता बचता है.

पंजाब ने  विभिन्न कठिन दौरों से गुजरते हुये सत्ता के कई उतार चढ़ाव  देखे हैं. कई दौर राष्ट्रपति शासन के भी रहे .आजादी के बाद से ही पंजाब मे राजनीतिक सत्ता परंपरागत रुप से कांग्रेस और अकाली दल के बीच ही हस्तांतरित होती रही है .

बदली हुई परिस्थितियों मे कै.अमरिन्दर ने अपनी संभावनाओं  को अभी स्पष्ट नहीं किया.भाजपा की कोशिश आपदा में अवसर खोजने की है. लेकिन एक विचारधारा से बंध कर लंबे समय तक राजनीति में खुद को बनाये रखने वाले ऐसे कद के नेता के लिये इस विकल्प से ज्यादा सशक्त एक नयी राह चुन कर अपने  अनुभव और सामर्थ्य से राजनीति में  एक अलग विरासत को  बनाया जाना हो सकता  है .

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