कुछ सेवायें तुरंत करनी होती हैं जबकि कुछ नियत समय पर: बाबा विनोबा

तत्वचिंतन जरूर करना चाहिए, लेकिन उसको एक दिशा चाहिए

विनोबा विचार प्रवाह ब्रह्मविद्या मंदिर तीर्थ बाबा विनोबा ने एक बार पत्र में लिखा कि ब्रह्मविद्या मंदिर की स्थापना को चार साल हो रहे हैं। मेरी अनुपस्थिति में वह चल रहा है, यह एक बहुत ही बड़ी साधना हो रही है। बहनें समझ सकती हैं, और समाज में सभी को समझा सकती हैं। ब्रह्मविद्या मंदिर का मूल विचार जिस मनुष्य का है, वह तो दूर दूर घूम रहा है, और कन्याएं लड़खड़ाती हुई मंदिर का संचालन कर रही हैं, जिनमें से बहुतों को उस प्रकार का अनुभव पहले नहीं था। यह अपने में ही स्वतंत्र प्रयोग है। इस पर तुम सब सोचो तो अभी तक वहां जितना हुआ है, वह कम नहीं हुआ है। इसका ख्याल आएगा।

तत्वचिंतन जरूर करना चाहिए, लेकिन उसको एक दिशा चाहिए। उसके बिना वह अप्रतिष्ठित बनता है। बाबा ने बहनों की शाबाशी करते हुए पत्र में लिखा कि तुम बहनों ने ब्रह्मविद्या शब्द उठा लिया है। इस विषम कालिकाल में इस शब्द को उठाने की हिम्मत तुमने की है, इसका कभी मैं ख्याल करता हूं तो मेरी आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगते हैं। बाबा ने बहनों के लिए कहा कि तुम सब धन्य हो।

ब्रह्मविद्या मंदिर में खेती, सफाई और घरकाम मिलकर तीन घंटे हर किसी को देने चाहिए।चाहे व्यक्ति छोटा हो, चाहे बड़ा हो, अपनी अपनी अभिरुचि, योग्यता जो भी हो, शिक्षा जो भी हो, हरएक के लिए यह तो आवश्यक ही है। यह शारीरिक श्रम का काम है, उसमें हमने कोई भेद नहीं किया है कि उसमें से कोई मुक्त रहे। कमजोरी, बीमारी आदि के कारण कोई न कर सके तो वह अलग बात है। लेकिन तीन घंटे का काम हरएक को करना ही चाहिए, यह सबका समान धर्म है।

खेती यानी प्रकृति के साथ एकता, सृष्टि की सेवा। स्वच्छता तो महायज्ञ है, क्योंकि हरएक के कारण गंदगी होती ही है। रसोई तो ब्रह्मचारी के लिए अनिवार्य है। यह हो नहीं सकता कि ब्रह्मचारी पुरुष स्त्री से रसोई करवाए और ब्रह्मचारिणी स्त्री किसी दूसरे से रसोई करवाए। आहार शुद्धि बुनियादी चीज है। तो उसमें सबको भाग लेना चाहिए।

बाबा ने 1963 में एक पत्र में बहनों को लिखा कि तुम लोगों का बहुत अच्छा चल रहा है। हरएक का अपना अपना कार्यक्रम है। लेकिन सबका मिलकर एक सम्मिलित कार्यक्रम योजनापूर्वक कुछ बने तो समूह जीवन बनेगा।

हमने छः घंटे काम में देने की बात मानी।उससे मनुष्य बहुत ज्यादा बंध नहीं जाता।काफी समय उसके पास रह जाता है। छः घंटे यानी आधा समय समझना चाहिए। उतना भी सबका सामूहिक न रहा तो सामूहिक साधना कैसे बनेगी। इस पर सोचो।

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सुग्येशु किम बहुना। ब्रह्मविद्या मंदिर में प्रेस थी, जिसमें तीन घंटे काम करने का तय था लेकिन उसके दो भाग थे। एक भाग बौद्धिक क्षमता का और दूसरा भाग शारीरिक कुशलता का। जैसे पुस्तकों की बाईंडिंग, पेस्टिंग आदि करने का काम है। इस कुशलता के काम में दक्षता की जरूरत होती है। दूसरा प्रूफ करेक्शन, संपादन आदि बौद्धिक भाग है, इसमें बौद्धिक क्षमता की जरूरत है। लेकिन गुण विकास की जरूरत तो दोनों में है।

किसी भी काम में गुणविकास के लिए अवसर की कमी नहीं है। दूसरा, इसमें उच्च नीचता की भी बात नहीं है। अगर कोई इस बार देखता हो, तो वह मन की मूढ़ता है और कुछ नहीं। इस प्रकार दोनों बौद्धिक और शारीरिक मिलकर छः घंटे काम करना होगा। फिर सवाल आएगा कि छः घंटे के बाद जो बचा हुआ समय होगा, उसमें क्या किया जाए? बाबा ने कहा कि इसमें एक दूसरे की सेवा की जा सकती है। इसके लिए कोई नियत समय नहीं होगा। सेवा की जरूरत तो किसी समय पड़ सकती है।

बाबा ने कहा कि यह तो सेवाधर्म है। कुछ सेवाएं ऐसी होती हैं, जो तुरंत करनी पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त सेवा के कुछ काम ऐसे होते हैं, जो नियत समय पर किए जा सकते हैं। फिर बाबा ने कहा कि जिन्होंने स्कूल में तालीम पाई है वे खेती, रसोई आदि के बारे में अध्ययन कर सात्विक और पौष्टिक रसोई बनाने का ज्ञान बढ़ाएं। आश्रम में एक एक विभाग का एक एक व्यक्ति रहेगा, और वह आमरण उसका विकास करता रहेगा। इससे उनकी मुक्ति में, भक्ति में, हमारी कल्पना में और समाज की कल्पना में तथा ईश्वर की दृष्टि में समानता होगी।

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