अमेरिकी चुनाव : जिसका डर था वही बात हो गयी!

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शिव कांत, बीबीसी हिंदी रेडियो के पूर्व संपादक, लंदन

अमेरिका के ऐतिहासिक और रोमांचक राष्ट्रपति चुनाव में वही हो रहा है जिसका डर था। चुनावी के दिन और उससे पहले हुए भारी मतदान के कारण काँटे की टक्कर वाले पाँच बड़े राज्यों पेंसिलवेनिया, मिशिगन, विस्कोन्सिन, जॉर्जिया और उत्तरी कैरोलाइना में मतगणना पूरी करने में समय लग रहा है। जो वोट अभी तक नहीं गिने जा सके हैं, उनमें बहुतायत डाक से डाले गये वोटों की है जो कई राज्यों में अभी तक आ रहे हैं।

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लेकिन मतगणना पूरी होने की प्रतीक्षा किये बिना ही, रुझानों और टेलीविज़न चैनलों में दिखाई जा रही प्रबल संभावनाओं के आधार राष्ट्रपति ट्रंप ने आधी रात को बुलाये संवाददाता संमेलन में अपनी भारी जीत का दावा कर दिया है। अपने 6 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं का धन्यवाद करते हुए उन्होंने कहा, ‘बीमार मानसिकता वाले कुछ लोग हमें वोट देने वाले लोगों के जनादेश को छीनना चाहते हैं। रात बीतने के बाद भी मतगणना को जारी रखना बहुत बड़ी धोखाधड़ी है। हम उनके इरादों को कामयाब नहीं होने देंगे और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटायेंगे।‘

ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान भी डाक से डाले जाने वाले वोटों में धाँधली होने की आशंका जतायी थीं जिनका कोई आधार नहीं था। उन्होंने बार-बार इस बात को दोहराया था कि हार-जीत का फ़ैसला चुनावी रात तक हो जाना चाहिए। आज के तकनीकी के ज़माने में भी चुनावी रात के बाद कई दिनों तक मतगणना करते जाना और हार-जीत को लटकाये रखना सही नहीं है। वास्तव में उनकी बात निराधार है क्योंकि अमेरिका में आज तक राष्ट्रपति के किसी भी चुनाव की हार-जीत की चुनावी रात तक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

यह बात किसी के समझ में नहीं आ रही है कि राष्ट्रपति ट्रंप बाक़ी बचे वोटों की गिनती को उन 6 करोड़ से ज़्यादा लोगों के जनादेश को छीनने की कोशिश क्यों बता रहे हैं जिन्होंने उनको वोट दिया है। इस तरह के बयानों से उनके दक्षिणपंथी अतिवादी समर्थकों को हिंसा पर उतरने का बहाना मिल सकता है। पिछले महीने भर में अमेरिका के कुछ राज्यों में 15 लाख से अधिक हथियारों की ख़रीद हुई है जो चिंताजनक है।

लेकिन सारी आशंकाओं के बावजूद कल का चुनाव शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ है और चुनावी दिन से पहले हुए डाले गये 10 करोड़ से ज़्यादा वोटों के बावजूद चुनाव के दिन भी भारी मतदान हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने सारे पूर्वानुमानों को धराशाई करते हुए फ़्लोरिडा, टैक्सास और ओहायो जैसे उन बड़े राज्यों में प्रचंड बहुमत हासिल किया है जिनमें जो बाइडन से कड़ी चुनौती मिलने के कयास लगाये जा रहे थे।

अधिकतर राजनीति प्रेक्षक इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप भारी ऐतिहासिक मतदान और महामारी की रोकथाम में सरकार की चिंताजनक नाकामी के बावजूद कई बड़े राज्यों में पिछले चुनाव से भी भारी जनादेश कैसे हासिल कर ले गये हैं। चुनावी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि पूर्वानुमानों के विपरीत सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा अर्थव्यवस्था और दंगे-फ़साद से सुरक्षा का रहा जिसके लिए मतदाताओं ने जो बाइडन की तुलना में ट्रंप पर भरोसा जताया है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन ने अपनी रैलियाँ इंटरनेट के ज़रिये या कारों में बैठे हुए लोगों के सामने कीं ताकि लोग महामारी से बचे रहें। इसके विपरीत राष्ट्रपति ट्रंप ने महामारी के ख़तरे की परवाह न करते हुए शहर-शहर जाकर खुली रैलियाँ की जिनमें हज़ारों लोगों की भीड़ उमड़ती रही। ऐसा लगता है कि इन रैलियों ने मतदाताओं को ट्रंप से विमुख करने की बजाय उनकी ओर आकर्षित किया है। उनके उल्टे-सीधे बयानों को भी लोगों ने उनकी साफ़गोई के रूप में देखा है और उनसे दूर होने के बजाय उनकी तरफ़ गये हैं।

पिछले चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ माने जाने वाले तीन उत्तरी राज्यों विस्कोन्सिन, मिशिगन और पेंसिलवेनिया में हालाँकि अभी लाखों वोटों की गिनती बाकी है जिनमें से अधिकांश डाक से डाले गये हैं। फिर भी अब तक हुई दो-तिहाई से तीन-चौथाई मतों की गणना में ट्रंप को इतनी बड़ी बढ़त मिल चुकी है कि बाकी बचे वोटों में से यदि अधिकांश वोट जो बाइडन को नहीं मिले तो उनका जीतना मुश्किल दिखाई दे रहा है।

यदि वे जीत भी गये तो ट्रंप की रणनीति अपने ख़िलाफ़ आने वाले नतीजों को 14 दिसंबर तक लटकाये रखने की होगी। ऐसा होने पर राज्य अपने-अपने विजेता की घोषणा नहीं कर पायेंगे और मामला अमेरिकी कांग्रेस के नवनिर्वाचित प्रतिनिधि सदन के पास चला जायेगा जहाँ विजेता का फ़ैसला देशभर में हासिल हुए वोटों और इलेक्टोरल कॉलेज या निर्वाचक मंडल के सदस्यों की संख्या के बजाय जीते हुए राज्यों की संख्या के आधार पर होगा।

पिछले चुनाव में ट्रंप को 30 राज्यों में जीत हासिल हुई थी। इस बार भी जीते गये राज्यों की संख्या के मामले वे जो बाइडन से आगे ही रहेंगे। यदि ऐसा हुआ तो 1824 का इतिहास दोहराया जायेगा जब प्रतिनिधि सभा ने जीते राज्यों की संख्या के आधार पर जॉन किंसी एडम्स को राष्ट्रपति चुना था। डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक इस फ़ैसले को जनादेश की अवमानना मानेंगे और देश में राजनीतिक विभाजन और गहरा हो जायेगा।

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