काश दिल्ली पुलिस के अंदर भी एक प्रतीक प्रतीक बंदोपाध्याय होता!

अनुपम तिवारी , स्वतंत्र लेखक, लखनऊ 

विपत्तियों के इस दौर में जहां देश के अलग कोनों से लगातार नौकरियां छूटने और बेरोजगारी बढ़ने की खबरें आ रही हैं, व्यापार ठप्प पड़े है. लोग जीविका चलाने के लिए तमाम तरह के प्रयास कर रहे हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो नैतिकता के नए मानदंड स्थापित कर देते हैं चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े. अंग्रेजी वेबसाइट मिड डे में स्तंभकार अयाज अशरफ ने ऐसे ही एक शख्स की कहानी लिखी है. जो ऊंचे नैतिक मूल्यों के साथ साथ समकालीन आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाने का माद्दा रखती है.

कोलकाता के रहने वाले प्रतीक बंदोपाध्याय ने अपनी अच्छी खासी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी कि उनको मैनेजमेंट ने मातहत काम करने वाले एक अन्य कर्मचारी को नौकरी से निकाल देने का आदेश दिया था।

पिछले हफ्ते तक प्रतीक को कोई नहीं जानता था, वह राष्ट्रीय स्तर के एक अखबार की कोलकाता शाखा में स्पोर्ट्स डेस्क के मुखिया के तौर पर पिछले 8 सालों से कार्यरत थे. उनके मातहत 4 लोगों की टीम थी. वेतन के रूप में प्रति महीने 94 हज़ार रुपये की अच्छी खासी रकम लेते थे, परिवार में उनके अलावा उनकी पत्नी और 8 साल की एक बच्ची हैं. पत्नी भी सरकारी अध्यापक हैं अतः घर मे प्रतीक की तनख्वाह के अलावा 50 हज़ार रुपये उनकी पत्नी भी कमाती हैं. उनका निजी मकान है. मतलब एक आदर्श मध्यमवर्गीय परिवार में जो कुछ होना चाहिए सब उनके पास था. उक्त अख़बार ने पिछले वित्त वर्ष में करीब 400 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था जिससे अखबार की संपत्ति में करीब 1000 करोड़ का इजाफा भी हुआ था. मतलब उसकी स्थिति भी सुदृढ थी.

नया वित्त वर्ष आते ही समय ने पलटा खाया और अप्रैल में कोरोना संकट के मद्देनजर देश मे लॉक डाउन घोषित कर दिया गया. अखबार कंपनी को राजस्व घट जाने की चिंता सताने लगी. और इस घाटे की भरपाई के लिए सबके पहले कर्मचारियों के वेतन पर कैंची चलाई गई. प्रतीक भलीभाँति जानते थे कि अधिक लाभ के लालच में अंधी हो चुकी कॉर्पोरेट इकाइयां कैसे काम करती हैं. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है कि कुछ भी कर के पिछले वर्ष से अधिक लाभ कमाया जाए, या फ़िर कम से कम उतना लाभ तो अर्जित कर लिया जाए जो पिछले वर्ष हुआ था. इस टारगेट को पाने के लिए वह कुछ भी कर जाती हैं. घाटे को कम करने का सबसे आसान तरीका होता है, कर्मचारियों की छटनी. बेरोजगारी का सोच कर के ही प्रतीक के शरीर मे सिहरन दौड़ जाती थी.

अप्रैल के महीने में दिल्ली स्थित उच्च मैनेजमेंट से आदेश आया कि हर इकाई के हर सेन्टर में कम से कम एक ‘बेहद खराब परफ़ॉर्मर’ ढूंढा जाए और या तो उसको नौकरी से निकाल दिया जाए या फिर वेतन आधा कर दिया जाए. प्रतीक समझ गए कि उनको एक फाँसी का फंदा बना के पकड़ा दिया गया है और उसमें फसाने के लिए एक गर्दन ढूंढने के काम दिया जा रहा है. इससे झुंझला कर उन्होंने मैनेजमेंट को तुरंत जवाब दे दिया कि बलि का बकरा ढूंढने के बजाय वह खुद अपना इस्तीफा दे देंगे.

यह सुनते ही दूसरे पक्ष का भौंचक्का रह जाना अप्रत्याशित नहीं था, प्रतीक ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए बताया कि उनकी टीम के काम को लेकर पिछले 8 वर्षों से कभी प्रश्नचिन्ह नही लगा है और ऐसी टीम में से एक को बेहद खराब बताना न सिर्फ अन्याय होगा बल्कि अमानवीय भी होगा. यह सुनते ही उनको कोलकाता के मुख्य संपादक से बात करने की सलाह दी गयी.

संपादक महोदय ने प्रतीक को चेताया कि आज के जमाने मे कौन दूसरे के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगाता है? अधिक नैतिकता दिखाने के चक्कर मे वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेगा. उन्होंने प्रतीक को उसके लक्ष्यों के प्रति भी सचेत किया.

परंतु प्रतीक अपने निर्णय पर दृढ़ था. संपादक को उसने बताया कि आर्थिक रूप से वह अपने सहयोगियों से बेहतर है. चारों सहयोगियों पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ प्रतीक से कहीं ज्यादा है. उनके विपरीत प्रतीक को घर का किराया या कर्ज चुकाने की चिंता नही थी. नौकरी छूट जाने पर वह सड़क पर आ जायेगा, ऐसा भी नहीं था. घर मे पत्नी की तन्खवाह तो आती ही है. हारकर संपादक ने प्रतीक को सलाह दी कि उसे इस्तीफा देने के बजाय उस क्षण का इन्तजार करना चाहिए, जब मैनेजमेंट उसे खुद ही निकाल दे, इस तरह नियम के मुताबिक एक महीने का अतिरिक्त वेतन उसको दिया जाएगा, जो बेरोजगारी की स्थिति में उसके काम आएगा.

प्रतीक ने दो टूक जवाब दिया कि उसकी गरिमा का स्थान एक महीने के वेतन से कहीं ऊपर है. इस तरह 15 जून के दिन प्रतीक ने नौकरी की कुर्बानी दे डाली.

प्रतीक का इस्तीफा बिज़नेस के उन मूल्यों के उलट था, जिनके अनुसार नैतिक मूल्यों से ज्यादा जरूरी आर्थिक मजबूती हुआ करती है. उसने उस धारणा को भी गलत साबित कर दिया कि बिज़नेस हैड अपनी नौकरी बचाने के लिए मातहतों की नौकरी खा जाने में तनिक भी देरी नही करते.

कोविड 19 के कारण दम तोड़ रही विश्व अर्थव्यवस्था में आज ऐसे कई प्रतीकों की आवश्यकता है, जिनसे छोटे कर्मचारियों की गर्दन अनायास ही काट दिए जाने से बचाई जा सके.

असल मे हमें प्रतीकों की ज्यादा जरूरत राजनीति के क्षेत्र में है. उन तथाकथित चाणक्यों से राज्य को बचाने के लिए जो निजी स्वार्थ में अंधे हो कर राज्य हित की बलि चढ़ाने से भी गुरेज नही करते.

रंजन गोगोई का उदाहरण सामने है. वह उन 4 जजों में से एक थे जिन्होंने जनवरी 2018 में एक बहुचर्चित प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के देश को आगाह किया था कि सर्वोच्च अदालत की कारगुजारियां लोकतंत्र के अनुरूप नहीं चल रही हैं. गोगोई ने एक उम्मीद जगाई थी कि शायद देश के सर्वोच्च प्रतिष्ठानों में अब भी ऐसे लोग हैं जो कर्म पर दृढ़ हैं परंतु बाद में जब वह मुख्य न्यायाधीश बने और उसके बाद वहां से सीधे राज्य सभा पहुच गए, तो उम्मीदों का वह किला ताश के पत्तों के समान ढह गया.

अन्य उदाहरण अरविंद केजरीवाल का ले सकते हैं, विभिन्न विषयों पर नैतिकता के उच्च आदर्शों को प्रदर्शित करते वह, देश का ध्यान सहजता से आकृष्ट करने में सफल रहे थे. परंतु अब वह अपने ही बनाये मूल्यों से समझौता करते दिखते हैं, वह उन मुस्लिम या लेफ्ट लिबरल युवा नेताओं के पक्ष में जबान नही खोलते जिन को दिल्ली की जेलों में भर दिया गया है. इनका कुसूर यह था कि वह उस कानून का विरोध कर रहे थे जो उनके अनुसार जनविरोधी है. जबकि दिल्ली दंगों के कई आरोपी अब भी खुले घूम रहे हैं, जिनके उकसाने पर भीड़ ने दिल्ली की सड़कों पर वीभत्स रक्तपात किया था.

एक संदिग्ध तरीके से की गयी जांच में दिल्ली पुलिस ने यह साबित करने की कोशिश की है कि बिल का विरोध करते यह युवा ही दंगों के भड़काने के दोषी हैं. काश दिल्ली पुलिस के अंदर भी एक प्रतीक होता जो यह कहने की ताकत रखता कि पुलिस अपने कृत्यों के द्वारा दक्षिणपंथी ताकतों को ठीक उस तरह से सही ठहरा रही है जैसे गलवान घाटी पर चीन अपने अतिक्रमण को.

 

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