वायु प्रदूषण- दिल्ली की धूँध का निदान और उपचार

बढ़ती आबादी के परिवहन के लिए वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। निजी वाहनों के स्टेटस सिम्बल के शौक ने वाहनों की संख्या में भी बेतहासा वृद्धि की है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था आबादी के अनुपात में बेहद कमजोर है। ये कारण ही दिल्ली की हवा को जहरीली बनाने के लिए पर्याप्त हैं।

डॉ.आर.अचल

पिछले कई वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का संकट उत्पन्न हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी दुनिया के प्रदूषित शहरों में दिल्ली को छठें स्थान पर बताया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दिल्ली के ऊपर के शेष पाँच भारतीय शहर ही हैं, जिसमें कानपुर का स्थान प्रथम है, परन्तु इन पाँच शहरों की उपेक्षा करते हुए दिल्ली को लेकर ही विशेष चिंता व्यक्त की जाती रही है। दिल्ली का यह विशेष होना ही इसके प्रदूषण का कारण भी बना है।

आजादी के बाद से आजतक दिल्ली का विशेष रूप से ध्वंशात्मक विकास किया जा रहा है।नब्बे के दशक में पहली बार इस समस्या पर ध्यान देते हुए उद्योगों को विस्थापित करने की नीति अपनायी गयी, पर आस-पास के खेतों-जंगलों का विध्वंश कर शहर का विस्तार किया जाता रहा है।

उद्योगों के विस्थापन के बावजूद शिक्षा-स्वास्थ्य व प्रबंधन आदि के संबंधित कार्यों का राष्ट्रीय केन्द्र आज भी दिल्ली बनी हुई है। इस कारण दिनों-दिन आबादी निर्बाध गति से बढ़ती जा रही है।

एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली की आबादी प्रति वर्ष 4 लाख बढ़ जाती है, जिसमें 3 लाख लोग प्रतिवर्ष शिक्षा व रोजगार के लिए देश के अन्य हिस्सों से आते हैं। इस बढ़ती आबादी के उत्सर्जित अपशिष्ट से दिल्ली के चारों ओर कुड़े के पहाड़ बनते जा रहे हैं।जिसके निस्तारण का कोई हानिरहित उपाय नहीं खोजा जा सका है। उसके निस्तारण के लिए जलाने की प्रक्रिया का वायुप्रदूषण में विशेष योगदान है।

बढ़ती आबादी के परिवहन के लिए वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। निजी वाहनों के स्टेटस सिम्बल के शौक ने वाहनों की संख्या में भी बेतहासा वृद्धि की है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था आबादी के अनुपात में बेहद कमजोर है। ये कारण ही दिल्ली की हवा को जहरीली बनाने के लिए पर्याप्त हैं।

इसपर मौसम का बदलता मिजाज नीम चढ़ा करेला साबित हो रहा है। इसका कारण भी ध्वंसात्मक विकास ही है, जंगलों को काट कर कंक्रीट का जंगल उगा कर, हम विकास कर रहे हैं।

दिल्ली और राजस्थान के बीच घने जंगल तो कभी नहीं रहे पर उष्णकटिबंधीय वृक्ष बबूर, मंदार, करीर, खैरा आदि सघन वृक्ष तो थे ही, जिनका विनाश कर खेती योग्य जमीन बनाने से लेकर औद्योगीकरण और कालोनियाँ बनाने के लिए किया जाता रहा है, जिसका परिणाम है कि आज रेगिस्तानी शीत और लू बेरोकटोक दिल्ली तक पहुँच कर उसे दमघोटूं शहर में तब्दील कर दिया है।

दुर्योग यह कि इसका कारण और उपाय खोजने में भी सतही और भरमाने वाली बातें की जाती है। कभी दिल्ली के आस-पास के किसानों के पराली जलाने को कारण बताया जाता है, तो कभी आड इवन फार्मुला लागू किया जाता है, पानी के छिड़काव को आसान उपाय के रूप में देखा जाता है, जो हास्यास्पद विकल्प से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि दिल्ली के आस-पास गन्ने की खेती होती है, गेहूँ की पराली भूसा बनाने के लिए काट लिया जा रहा है, धान की खेती बहुत कम होती है।

राली जलाने की बात बेहिसाब प्लास्टिक के कूड़े जलाने के दुष्कृत्य को छुपाने के लिए की जाती है, या यूँ कहें तो बड़े लोगों का दोष छोटे लोगों के सिर मढ़ा जाता है।

पराली जलाने की बात बेहिसाब प्लास्टिक के कूड़े जलाने के दुष्कृत्य को छुपाने के लिए की जाती है, या यूँ कहें तो बड़े लोगों का दोष छोटे लोगों के सिर मढ़ा जाता है। इसके लिए ठोस उपाय यह है कि कूड़े के पहाड़ों का निस्तारण के लिए हानिरहित उपाय खोजा जाना चाहिए। प्लास्टिक की छँटनी कर शेष को खाद में बदल देने की तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। प्लास्टिक को जलाने के बजाय रासायनिक तरीके से निस्तारित किया जाना चाहिए।

आड इवन फार्मुला भी एक मजाक ही जैसा है। जहाँ तक मेरा अनुमान है कि निजी गाड़ियों की संख्या का 25 प्रतिशत केवल राजनैतिक-प्रशासनिक और व्यापारिक लोगों की है। इनकी गाड़ियाँ काफिले में चलती है।जिनपर यह फार्मुला नहीं लागू होता है। इनके लिए विशिष्ट बसों की व्यवस्था होनी चाहिए।कड़ाई से इनके निजी वाहनों पर रोक लगा कर इनके लिए सार्वजनिक वाहनों की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

पर्यावरण के प्रति जागरुकता व टैक्स बढ़ा कर निजी गाड़ियों व एसी के शौक को हतोत्साहित किया जा सकता है, अन्यथा दिल्ली मौत का कूँवा बन जायेगी।

पानी के छिड़काव को इसके उपचार के रूप में देखा जाता है। एक ओर जमुना सूख रही है, पीने के पानी की किल्लत है और दूसरी ओर कृत्रिम बरसात को विकल्प के मानकर, पानी का छिड़काव किया जा रहा है। यह विकल्प नितांत हास्यास्पद और विनाशकारी है। सूखते जल स्रोतों के युग में इतना पानी कहाँ से आयेगा, यह भी यक्ष प्रश्न है।

इस विकट समस्या का स्थायी हल तभी संभव है जब दिल्ली में हरित क्रांति किया जाय। कम जगह में उगने वाले ताड़, खजूर, सुपारी जैसे ऊँचे वृक्षों का रोपड़ अनिवार्य किया जाय। दिल्ली के चारों ओर पुनःवनों को स्थापित किया जाय, विशेषकर राजस्थान के रेगिस्तान और दिल्ली के बीच जंगलों को पुनर्स्थापित किया जाय।

दिल्ली की भीड़ कम करने के लिए दिल्ली के स्तर की सुविधाओं का अन्य शहरों तक विकेन्द्रीकरण किया जाय। गाँवो में रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य के संसाधन विकसित किये जाएं। दूरस्थ क्षेत्रों के उच्च शिक्षण संस्थाओं जैसे एम्स, जेएनयू, डीयू के स्तर को विकसित किया जाय।

साँस और एलर्जी के रोगियों, वृद्धों, बच्चों को बाहर निकलने से बचाना चाहिए। कामकाजी लोगों को नमक मिले जल से भाप लेना चाहिए। प्रातः सायं आयुर्वेद का नस्यकर्म करना चाहिए।

इन स्थायी उपायों के साथ अब इसकी चर्चा भी आवश्यक है कि आज के तात्कालिक संकट से आमजन को इसके दुष्प्रभाव से कैसे बचाया जाय। इसके लिए साँस और एलर्जी के रोगियों, वृद्धों, बच्चों को बाहर निकलने से बचाना चाहिए। कामकाजी लोगों को नमक मिले जल से भाप लेना चाहिए। प्रातः सायं आयुर्वेद का नस्यकर्म करना चाहिए।

नस्य कर्म का तात्पर्य यह है कि शुद्ध सरसों, अणुतैल, षडविन्दु तैल, गोघृत में से किसी एक को नाक में डालना चाहिए। इसकी विधि यह है कि बिना तकिये के सीधा लेटकर 4 से 6 बूँद नाक में डाल कर 3 से 5 मिनट सामान्य साँस लेते हुए आराम करना चाहिए।इसके पश्चात नमक मिले गुनगुने जल से गरारा करना चाहिए।

यदि यह संभव न हो सके तो शुद्ध जल का नस्य लेना चाहिए। इसके लिए प्रातःसायं मुँह धोते समय नाक से यथासंभव मात्रा में जल खींचे। इससे वायुप्रदूषण के हानिकारक प्रभावों से बचा जा सकता है। उसके अलावा मुलहठी, कुलंजन भी मुँह में डाल कर चूसने से गले में जमे धूल कणों के हानिकारक प्रभाव से बचाव संभव है।

(*संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट, आयोजन सदस्य-वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस एवं लेखक, विचारक हैं)

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