आम लोगों से जुड़े कवि हृदय पत्रकार थे रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय
त्रिलोक दीप, वरिष्ठ पत्रकार

रघुवीर सहाय मशहूर कवि होने के साथ ही बेहतरीन और संवेदनशील पत्रकार थे। उन्होंने सैकड़ों लोगों को पत्रकार बनाया था। वरिष्ठ पत्रकार और संडे मेल के कार्यकारी संपादक त्रिलोक दीप ने उनके साथ  कई वर्षों तक  साप्ताहिक दिनमान में काम किया था। इस आलेख में वे बता रहे हैं उनसे जुड़ी अब तक अज्ञात और मर्मस्पर्शी यादें:

‘दिनमान’ में आने से पहले मैं रघुवीर सहाय को उस तरह से नहीं जानता था जैसे अज्ञेय को जानता था ।

शायद इसलिए कि मैंने अज्ञेय की कुछ कालजयी किताबें पढ़ रखी थीं या इसलिए भी कि रायपुर के मेरे अध्यापक ने मुझे गद्य ही पढ़ाया था,पद्य से मैं वंचित रह गया ।इसलिए रघुवीर सहाय जी को स्कूल के दिनों में नहीं पढ़ पाया था ।

लेकिन ‘दिनमान’ में नियुक्ति होने के बाद उनके बारे में सुना कि वे जितने उच्चकोटि के कवि हैं, पत्रकारों में भी  वे उतने ही श्रेष्ठ हैं ।

दिनमान में  मेरी नियुक्ति के समय वे ‘नवभारत टाइम्स ‘ में विशेष संवाददाता थे ।

शुरू के कुछ वर्षों में दिनमान के लोग भी टाइम्स ऑफ इंडिया, एकनॉमिक टाइम्स और नवभारत टाइम्स के लोगों के साथ टाइम्स हाउस यानी 7, बहादुर शाह मार्ग मे ही बैठा करते थे । सभी पत्र-पत्रिकाओं के लोगों के बीच परस्पर सहयोग और सौहार्द्र की भावना थी ।

कमोबेश हर कोई एक दूसरे को जानता पहचानता था ।

सभी सम्पादकीय कर्मचारियों की दूसरी मंज़िल पर बैठने की व्यवस्था थी ।दरवाज़ा खोलने पर सब से पहले ब्यूरो पड़ता था जहां एकनॉमिक टाइम्स,टाइम्स ऑफ़ इंडिया तथा  नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता बैठते थे।

महाराष्ट्र टाइम्स के इंदूरकर जी भी वहीं बैठा करते थे ।क्योंकि सभी लोगों के गुज़रने का रास्ता उधर से था लिहाजा ब्यूरो में मौजूद लोगों से दुआ सलाम हो जाया करती थी ।

नवभारत टाइम्स के ब्यूरो प्रमुख आनंद जैन से मेरी दोस्ती थी क्योंकि हम लोग राजनयिक पार्टियों में मिला करते थे ।एकनॉमिक टाइम्स में सतिंदर सिंह थे,जिन्हें मैं सत्ती कहता था,से भी मित्रता  थी ।सत्ती कभी अकाली नेता मास्टर तारासिंह के सचिव रह चुके थे और वे उस पार्टी की कहानियां अक्सर सुनाया करते थे ।

वे पंजाबी के बहुत अच्छे कहानीकार भी थे ।उनकी कुछ कहानियां मैंने हिंदी में अनुवाद करके छपवाई भी थीं। उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद खुशवंत सिंह ने किया था जो ‘Dreams in Debris ‘नाम से पुस्तक के रूप में छ्पा है । सुबह अक्सर सत्ती मिल जाया करते थे ।

एक दिन  हमेशा की तरह मैं ब्यूरो की तरफ से निकल रहा था कि सत्ती ने मुझे पीछे से आवाज़ दी,’ओए दीप ऐदर आ ‘। मैं जब सत्ती के पास पहुंचा  तो उसने एक व्यक्ति से परिचय कराते हुए कहा  कि ‘मिलो इनसे, यह हैं श्री रघुवीरसहाय ।’

मैंने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया। वे बोले,’हां वात्स्यायन जी ने आपके बारे में बताया था ।मैंने भी कई बार आपको संसद भवन में देखा था कभी स्पीकर चेम्बर के पास तो कभी किसी सांसद से बातचीत करते हुए ।चलिए अच्छा लगा आपसे मिल कर,अब तो भेंट होती रहेगी ।’

मैं सत्ती का शुक्रिया अदा करके दिनमान की तरफ चला गया ।दिनमान में  कोई भी व्यक्ति फ़ील्ड के लिए चिन्हित नहीं था ।करीब करीब सभी लोगों को फ़ील्ड में भेजा जाता था ।

इसी क्रम में कभी कभी ऐसी  स्थिति भी पैदा हो जाती कि मुझे स्थानीय,राष्ट्रीय और राजनयिक स्तरों पर रिपोर्टिंग के लिए जाना पड़ता तथा ऐसे ही अवसरों पर रघुवीर सहाय से भेंट हो जाती ।अब हम दोनों  एक दूसरे और उनके काम से वाकिफ हो चुके थे ।लिहाजा 1968 में उन्होंने जब दिनमान का कार्यभार सम्भाला तो परस्पर परिचय  जैसी कोई दिक्कत पेश नहीं आयी।

एक बार पीआईबी के प्रमुख यू.एस. तिवारी ने मुझे बताया था कि रघुवीर सहाय कुछ अलग किस्म का पत्रकार है ।इन की रिपोर्टिंग हट कर होती है । न वह सपाट होती है और न ही सरकारी विज्ञप्ति पर आधारित ।उसमें अलग तरह की लय होती है,भाषा में लालित्य होता है जिससे कभी कभी काव्यत्व की झलक मिलती है ।

तिवारी जी पीआईबी के सबसे से वरिष्ठ अधिकारी थे जिनकी कला और साहित्य में भी अभिरुचि थी ।

एक दिन जब मैंने रघुवीर जी को यू.एस. तिवारी की उनकी लेखकीय शैली का उल्लेख किया तो उन्होंने हंसते हुए मात्र इतना भर कहा था,’वे बेहतरीन अधिकारी हैं और पढ़े लिखे भी ।कम ही अफसर हिंदी में लिखे आलेखों या रपटों को इतनी शिद्दत से पढ़ते हैं जितने तिवारी जी ।’

रघुवीर सहाय के कवि,उनकी कविता की शैली और समय समय पर  उन में होने और किए जाने वाले प्रयोगों पर खासा लिखा गया है लेकिन उन की पत्रकारिता पर जितना लिखा जाना चाहिए था उतना शायद लिखा नहीं गया ।

यह भी संभव है कि लिखा गया हो लेकिन मेरी नजरें उन्हें तलाश न पायीं हो ।लिहाजा मैं अपने अनुभव और विचारों को अपने तईं ही सीमित रख कर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

रघुवीर सहाय फ़ील्ड रिपोर्टिंग के महत्व को समझते थे ।उन्होंने नवभारत टाइम्स में रहते हुए तो फ़ील्ड रिपोर्टिंग की ही थी,दिनमान का सम्पादक बनने के बाद भी उनका यह शौक बरकरार रहा ।

वे मानते थे कि किसी भी घटना या दुर्घटना को उस स्थल पर जाकर जिस करीबी और बारीकी से समझा जा सकता है वह सम्पादक की कुर्सी पर बैठे हुए नहीं किया जा सकता है।घटनास्थल पर आपको सब तरह के लोग मिलेंगे,कुछ चश्मदीद गवाह भी,कुछ समाज सेवी भी ,तो कुछ  राजनीतिक नेता भी,कुछ बेलाग तथा बेबाक लोगों के साथ साथ कुछ धुर तटस्थ लोग भी मिलेंगे।इस तरह बातचीत के साथ जो संवाद तैयार होगा वही उस घटना या दुर्घटना के साथ न्याय करने की स्थिति में होगा ।

वे अक्सर अपने साथ कैमरा भी रखा करते थे ताकि घटनास्थल के चित्र भी ले सकें ।उनकी 1971-72 में  बंगलादेश की रिपोर्टिंग वैसी ही सराही गयी थी जैसे 1966-67 में वात्स्यायन जी की गोआ एआईसीसी महा अधिवेशन की रिपोर्टिंग ।

तब किसी ने सहास्य टिप्पणी की थी,’क्यों न हो आखिर तीनों रेडिओ में जो साथ साथ थे-सच्चिदानंद वात्स्यायन , रघुवीर सहाय और मनोहर श्याम जोशी ।तीनों लिक्खाड़, बहुभाषाविद और कवि ।

शुरू शुरू में मनोहर श्याम जोशी भी कविताएँ लिखा करते थे तथा रघुवीर जी और जोशी जी का दोस्ताना भी तब मशहूर हुआ करता था ।वास्तव में रघुवीर सहाय के बारे में लिखने और बताने लायक इतना है कि भटकाव हो ही जाता है ।

चलिये अब मुद्दे पर आते हैं । रघुवीर सहाय ने जब विधिवत दिनमान की संपादकी संभाल ली तो मेरी पुरानी वात्स्यायन जी के समय वाली बीट जारी रहीं अर्थात् विदेश ,प्रतिरक्षा के साथ साथ और भी ।

सन् 1969 में लेह लद्दाख में कांग्रेस ए और कांग्रेस बी में आपसी झगड़े की खबरें राष्ट्रीय अखबारों में जब छपी तो दिल्ली के पत्रकारों ने इसे गंभीरता से लिया ।डिफेन्स कवर करने वाले पत्रकारों ने लेह जाने की मांग की ।

एक पत्र रघुवीर सहाय को भी मिला ।मुझे तलब किया गया और श्रीनगर जाने को  कहा गया जहां से डिफेंस वाले पत्रकारों के एक दल को लेह ले जाएंगे ।मैंने रघुवीर जी को सलाह दी कि यह जिम्मेदारी  आप जवाहरलाल कौल को दें। वे कश्मीरी हैं और वहां के हालात को मुझ से बेहतर जानते और समझते हैं ।

अभी तक मैं खड़े खड़े उनसे बात कर रहा था ।रघुवीर जी मुस्कराये और बोले, आप बैठ जाओ ।मेरे बैठने पर वे बोले,”मैं भी कौल साहब की बहुत इज़्ज़त करता हूं और जिस तरह से उन्होँने पिछ्ले दिनों बिहार और उत्तरप्रदेश की घटनाओं को कवर किया है वे कबिलेतारीफ हैं ।आपके  साथ मुमकिन है कोई विदेशी पत्रकार भी हो जो हिंदी भी न जानता हो ।वह भी तो इस घटनाक्रम को कवर करेगा ।उसका अपना  नज़रिया होगा ।अब होगा यह कि सरकार सहित सभी लोग उसकी रपट पढ़ना गवारा करेंगे ।क्यों! उसका दृष्टिकोण जानने के लिये ।जब विदेशी पत्रकार इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है तो एक भारतीय क्यों नहीं कर सकता ? “

अब मैं निरुत्तर हो गया और श्रीनगर के लिए निकल गया ।

वहां पहुंचने पर कुछ और पत्रकारों से भेंट हुई ।मुझे नवभारत टाइम्स के समाचार संपादक पंडित हरिदत्त शर्मा और समाचार भारती के विद्या सागर का नाम ही इस समय याद पड़ रहा है । अंग्रेज़ी के भी कुछ पत्रकार थे ।

हम से पहले हिंदुस्तान टाइम्स के राज गिल भी हो आये थे जो मेरे दोस्त थे ।उन्होंने भी मुझे ब्रीफ कर दिया था ।श्रीनगर और लेह के रास्ते में कुछ ऐसी जानकारियां भी मिलीं जो मेरे लिए नये संवाद लिखने को प्रेरित करती थीं जैसे जून की तपती दुपहरी में गुमरी के पास बर्फ की चट्टानें तोड़ कर फौजी जीप के निकलने का रास्ता बनाना,द्रास को दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा स्थान बताना और  पहला स्थान देखने को प्रेरित करना,करगिल में रात गुज़ारना,जहां 90 फीसद मुसलमान रहते हैं और उसके आसपास की पहाडियों में एक तरफ पाकिस्तानी और दूसरी तरफ चीनी फौजें टकटकी लगाये तैनात हैं।

करगिल और लेह के रास्ते में एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे के दर्शन करना जहां कभी सिखों के पहले गुरु नानक देव आये थे,लेह में कुशक बकुल से मुलाकात और वहां हेमिस गुम्पा सहित कई गुम्पा देखना तथा चीनी सीमा से सटे चंगला चुशुल की यात्रा । यह काफी महत्वपूर्ण और विविध आयामी यात्रा हो गयी ।

दिल्ली पहुंच कर अपनी लेह की इस प्रायोजित  यात्रा के इन तमाम आयामों की जब रघुवीर जी को जानकारी दी तो उन्होंने उत्फुल्ल होते हुए कहा कि मैं जानता था कि तुम एक यात्रा से इतने सारे संवाद बनाने और निकालने में सक्षम हो ।

एक तो मैंने प्रतिरक्षा की स्टोरी बनायी जो क्लियरिंग के लिए भेज दी,दूसरी राजनीतिक संवाद  तैयार किया  तथा दो- तीन और ।लद्दाख पर पुस्तक लिखने के बारे में भी सोचा और उसके लिए कुछ अतिरिक्त सामग्री भी जुटायी ।

 इसके बाद मुझे और कई लंबी प्रायोजित  यात्राओं पर भेजा गया ।मुझे जो याद पड़ रही हैं वे थीं बिहार की भूदान तथा राजस्थान की खादी ग्रामोद्योग की अध्ययन  संबंधी यात्राएं । पटना से कार द्वारा कमोबेश सारे बिहार की यात्रा के साथ साथ नेपाल के बिराटनगर भी हो आया ।

रेणु जी ने सलाह दी कि जब आप पूर्णिया और सहरसा जा ही रहे हो तो वहां बिहारी सिखों से मिलना न भूलना ।दिनमान के लिहाज़ से बढ़िया स्टोरी होगी और इससे आपकी व्यक्तिगत जानकारी बढ़ेगी,सो अलग ।पूर्णिया और सहरसा दोनों स्थानों पर बिहारी सिखों से मुलाकात हुई जो पूरी तरह से गुरुसिख थे ।वे लोग गुरु ग्रंथ साहब से पाठ कर सकते थे,अपने मधुर कंठ से कीर्तन भी करते थे शुद्ध गुरुबाणी का लेकिन पंजाबी बोल नहीं सकते थे ।

उनके पाठ और कीर्तन में भी बिहारी लहजा झलकता था लेकिन सिख धर्म के प्रति उनकी पूरी श्रद्धा और आस्था थी ।

इस प्रकार भूदान के अलावा मेरे और कई संवाद तैयार हो गये,बिराटनगर का जो हुआ,सो अलग ।इसी प्रकार खादी ग्रामोद्योग की राजस्थान की इकाइयां दिखाने के लिए हम कुछ पत्रकारों को दिल्ली से कार द्वारा ही ले जाया गया । ।

कार में मेरे साथी थे हिन्दुस्तान टाइम्स के राज गिल,जो बेहतरीन पत्रकार के अतिरिक्त कहानीकार और उपन्यासकार भी थे ।इस यात्रा में खादी के  विभिन्न उत्पादों के अलावा राजस्थान की कला,जीवन शैली,रेगिस्तानी टीले,जैसलमेर की विश्व प्रसिध्द हवेलियाँ भी देखीं ।

बाड़मेर के आगे  गदरा रोड  भी गये जहां हमारी सेना का कब्ज़ा हो गया था ।वहां पर लगे मील पत्थर पर बैठ कर  हमारे एक साथी ने अपनी फोटो भी खिंचवाई ।बाड़मेर में एक ध्वस्त  पाकिस्तानी टैंक रखा था जो हमारी सेना के हाथ लगा था ।इस प्रकार इन प्रायोजित यात्राओं से भी कई अतिरिक्त और रोचक संवाद प्राप्त  हो गये ।

रघुवीर सहाय मेरी यात्राओं से जुड़ी स्टोरीज़ में पूरी दिलचस्पी लिया करते थे ।

जब मैंने उन्हें बताया कि बिराटनगर से मेरी विदेश यात्रा की शुरुआत भी हो गयी,इस पर रघुवीर जी की टिप्पणी थी ‘अभी आगे आगे देखिए’।

मेरी अपनी निश्चित बीट के अलावा ये गैरबीट की यात्राएं भी मेरी लिए बहुत ही उपयोगी और ज्ञानवर्धक सिध्द हुईं।

सन् 1975 में  जब मुझे पश्चिम जर्मनी का निमंत्रण प्राप्त हुआ तो मैंने सबसे पहले  इसकी जानकारी रघुवीर सहाय को दी । विदेश मंत्रालय की मार्फत जब मुझे पश्चिम जर्मनी के राजदूत का मौलिक पत्र मिला तो उसे भी मैं ने सबसे पहले रघुवीर जी को दिखाया जिन्होंने अपनी सीट से खड़े होकर मुझसे हाथ मिलाकर बधाई दी ।

 बाद में मुझे समझाते हुए कहा कि यह यूरोप की आपकी पहली यात्रा है ।खुल कर देश देखो, दिनमान के पाठकों की रुचि का जो लगे या दीखे उसे नोट करो और कैमरे में भी कैद करो।उन्हें मैंने लंदन और पेरिस यात्रा बाबत भी बताया ।

इसी प्रकार मैंने रघुवीर जी को 1977 में सोवियत संघ से प्राप्त निमंत्रण की जानकारी देते हुए बताया था कि यह यात्रा पूर्व और पश्चिम यूरोप के आठ देशों की है ।उस समय पूर्व यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट सरकारें थीं और पश्चिम में लोकतंत्री प्रणाली वाली सरकारें । उनमें आपसी तालमेल के संबंधों के अध्ययन के साथ साथ भारत के रिश्तों का जायजा भी लेना था।

सन् 1979 में मुझे अमेरिका का एक महीने का निमंत्रण पत्र मिला ।जून के मध्य में मुझे वहां जाना था और उससे दो हफ्ते पहले ब्रितानी हाउस ऑफ़ कॉमन्स का चुनाव था ।

रघुवीर जी ने प्रबंधन को एक नोट भेज कर ऑफ़िस की तरफ से एक सप्ताह का ब्रितानी चुनाव कवर करने की अनुमति ले ली ।

लेकिन मैंने  अमेरिका की इस यात्रा को  विश्व यात्रा में परिवर्तित कर लिया यानी इंग्लैंड,कनाडा, अमेरिका के होनोलूलू से जापान और हांगकांग को भी जोड़ लिया ।

यात्रा पर निकलने से पहले रघुवीर जी के आग्रह पर हम दोनों ने एक शाम इकट्ठी बितायी । यह बातचीत निजी रुचियों से लेकर पत्रकारिता के आयामों के अलावा विदेश यात्राओं पर भी हुई ।

रघुवीर जी की ड्रिंक करने की अपनी कलात्मक शैली थी।उन्हों ने यह भी बताया था कि धीमी आंच पर बनने वाले मीट का कैसा स्वाद होता है और अगर वह चूल्हे पर रख कर बनाया जाये तो उसके क्या कहने ।

रघुवीर जी को खाने-पीने के अलावा पकाने का  भी शौक था ।उन्होंने फ़ील्ड रिपोर्टिंग के मुझे कुछ टिप्स दिये तथा विदेशों में चीज़ों को देखने और उनमें भारतीय पाठकों की जानकारी और  रुचि बाबत चीज़ों को सहेजने की सलाह  भी दी  ।उनके कई तरह के अध्ययन और  आकलन से मैं चौंका भी और सीखा भी ।

 क्योंकि हमारी यह मुलाकात बिल्कुल निजी और गोपनीय थी इस विशेष बातचीत में हम दोनों ने ही दिलखोल कर अपनी अपनी बातें कही थीं ।

 उन्होंने मुझे बताया था कि मेरी विदेश यात्राओं पर केवल भीतर ही नहीं बाहर भी शक़ की नज़रों से देखा जाता है । दूतावासों से मेरी निकटता और वहां दिनमान पहुंचाने पर भी कुछ लोगों को एतराज़ था ।

रघुवीर जी में एक सिफत थी । वे सुनी सुनायी बातों पर विश्वास नहीं किया करते थे ।कुछ दूतावास अपने यहां सांस्कृतिक सचिव रखा करते थे जिनका काम भारत की कला, संस्कृति और साहित्य का अध्ययन करना होता था ।

ये सचिव समय समय पर देश के कवियों,साहित्यकारों और हिंदी के संपादकों को आमंत्रित करते रहते थे ।

ऐसे ही कुछ अवसरों पर जब मैंने बताया कि मैं दिनमान का संपादक हूं तो कभी कोई उत्तर देता कि हम इस पत्रिका के बारे में जानते हैं और आपके बारे में भी।

 तो कोई अपने यहां से दिनमान की प्रति लाकर दिखा देता ।इसका राज़ पूछने पर मुझे तुम्हारे बारे में बताया जाता और यह भी जानकारी दी जाती कि तुम किसी खास विषय पर उनके देश की प्रतिक्रिया जानने के लिए आये थे ।

उस विषय पर जब वे आलेख तैयार करते थे उसमें मात्र हमारा उल्लेख भर होता ।बहुत ही संतुलित आलेख होता था ।सच पूछा जाये तो हम लोग भी सन्तुलित अध्ययन चाहते हैं जो दिनमान के संवादों से मिलता था और हमारे देश में पसंद किया जाता था ।

रघुवीर जी ने  मेरी अमेरिका यात्रा को लेकर भी एक जानकारी साझा करते हुए बताया था कि कुछ तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों ने अमेरिकी अधिकारियों से मुझे निमंत्रित किये जाने का यह कह कर विरोध  किया था कि एक तो मैं जूनियर पत्रकार हूं और दूसरे मैं साप्ताहिक पत्र में काम करता हूं ।

विरोध करने वालों को अमेरिकी अधिकारियों का  टका सा जवाब मिला था कि यह हमारा विशेषाधिकार है कि हम किसे आमंत्रित करते हैं,किसे नहीं ।

रघुवीर जी से मुझे यह भी पता चला था कि सर्विसेज के बहुत से  ऐसे  अधिकारी हैं जिन्होंने प्रतियोगिताओं की तैयारी में अन्य अनेक पुस्तकों के साथ साथ   दिनमान के विदेश और अर्थजगत स्तंभ  पढ़ कर भी  की थी ।’इसलिए मुझे आप पर गर्व है और आपसे कोई शिकायत नहीं ।सच पूछा जाये तो विदेश से मिलने वाले आपको निमंत्रण पत्र दिनमान की मैं उपलब्धि मानता हूं ।’रघुवीर जी का मुझे यह आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।

रघुवीर सहाय की किस किस खासियत की मैं चर्चा करुँ । वे सहृदय थे, मानवीय करुणा और संवेदनाओं से परिपूर्ण थे,परस्पर सद्भावना और सौहार्दपूर्ण व्यवहार के लिए वे सर्वत्र जाने जाते थे ।

जितने लोगों की प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में उन्होंने सहायता की थी उसकी निश्चित गणना के बाबत तो मैं कुछ नहीं कह सकता लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि वह हज़ारों में थी ।

इस आंकड़े को लेकर लोगों को दुविधा हो सकती है जिसका निराकरण करना आवश्यक है ।रघुवीर जी 14 वर्षों तक दिनमान के संपादक रहे ।उन्होंने उन सभी पाठकों के पत्र अपने ‘मत-सम्मत  ‘ स्तंभ में छापे जिन्हें वे दूर दूर तक नहीं जानते थे ।

केवल उन्हीं पाठकों के पत्र दिनमान में छ्पा करते थे जो पठनीय होते थे और हमारे मापदंड पर खरे उतरते  थे । कुछ पाठक अपने राज्यों के संवाद भी भेजते थे,सही और सटीक पाये जाने पर वे भी दिनमान में छ्पा करते थे  ।

ऐसे लोगों से न तो दिनमान के संपादक और न ही किसी और सम्पादकीयकर्मी का कुछ लेना-देना होता था ।

पूरे देश और कुछ हद तक विदेश में भी दिनमान की अपनी निष्पक्षता की  साख थी । रघुवीर सहाय के संपादक कार्यकाल में मैंने अपने देश और विदेश के विस्तृत दौरे किये थे ।

 देश में कस्बों,छोटे से लेकर बड़े शहरों में मैं जाया करता था ।कई कई जगह लोग दिनमान की प्रति लाकर दिखाते हुए कहते कि देखिए मेरा यह पत्र छ्पा है तो कोई दिनमान में छ्पा अपना संवाद दिखाता जो उसने हाईलाईटर से हाईलाईट किया होता था ।

वह बताता कि दिनमान में छपे इस समाचार की वजह से वह फ़लां दैनिक का स्थानीय संवाददाता बन गया और उसे एक निश्चित पे-पैकट मिलता है । राज्यों की राजधानी में बहुत से ऐसे लोगों से भी मुलाकात हुआ करती थी जो दिनमान के किसी संवाद को दिखा कर राज्य सरकारों की सुविधाएं प्राप्त किया करते थे ।

उन दिनों दिनमान का न तो किसी राज्य और न ही विदेश में कोई  अधिकृत संवाददाता हुआ करता था  ।ये सभी स्वघोषित स्थानीय और राज्य संवाददाता दिनमान में छपे अपने पत्रों और संवादों के ज़रिये हमारा प्रतिनिधित्व कर रहे थे ।

संभव है कुछ लोगों के पास संपादक का अपने क्षेत्र की सामग्री भेजने संबंधी पत्र रहा हो जिसका इस्तेमाल ऐसे ‘तथकथित ‘ संवाददाता दिनमान के अधिकृत संवाददाता के तौर पर करते हों ।

लिहाजा ऐसे स्वघोषित संवाददाताओं की संख्या हज़ारों से कम नहीं रही होगी । ऐसे स्वघोषित संवाददाता उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान में अधिक तो हिमाचल, जम्मू,हरयाणा ,गुजरात और महाराष्ट्र में भी पाये जाते हैं ।

‘दिनमान’के ऐसे कई स्वसंवाददाता इस समय कई क्षेत्रीय अखबारों में संपादक हैं तो कई अन्य उच्च पदों पर आसीन  हैं । इन लोगों ने अभी भी अपने पास दिनमान की अपने नाम वाली प्रतियां संभाल रखी हैं ।

रघुवीर जी ने कुछ लोगों की सीधे सहायता भी की थी । विदेशों में भी दिनमान का कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं होता था लेकिन पश्चिम जर्मनी से रजत अरोड़ा और राम नारायण यादव,लंदन से सत्येंद्र श्रीवास्तव तथा कभी कभी नरेश कौशिक और वॉशिंगटन से रवि खन्ना संवाद भेजा करते थे ।

नरेश कौशिक दिनमान से बीबीसी गये थे जबकि रवि खन्ना वायस ऑफ़ अमेरिका में काम करते थे और 1979 की अमेरिकी यात्रा में मुझ से मिले थे और राजधानी का नगर दर्शन कराया था। उनके जीजा डॉ आर पी आनंद मेरे साथ लोक सभा सचिवालय में काम करते थे ।उन दिनों वह होनोलुलु में थे ।उनसे भी मेरी लंबी मुलाकात हुई थी और हमने अपने पुराने साथियों को याद किया था ।

रघुवीर सहाय अपनी मानवीय सहायता और  करुणा के लिए भी जाने जाते थे । 1971 में बंगलादेश के अभ्युदय के बाद वे वहां के साथ साथ बॉर्डर की स्थिति का आकलन करने के लिए गये  तू अगरतला में उन्हें रोते हुए  एक लड़का मिला जिसने बताया कि आततायियों ने उसके माँ बाप और बहन की हत्या कर दी है,वह किसी तरह से बच गया है ।

रघुवीर जी ने उसे ढ़ाढ़स बंधाया और उसे अपने साथ दिल्ली अपने घर ले आये ।उसे दिलासा दिया ।वह कुछ काम करना चाहता था ।किसी से कह कर उसे काम दिलवा दिया ।दो तीन हफ्ते वह रघुवीर जी के घर पर ही  रहा ।बाद में वह दूसरी जगह शिफ्ट कर गया लेकिन हर शनिवार-रविवार उनके यहां आ जाया करता था।

रघुवीर जी की पत्नी बिमलेश्वरी सहाय (जिन्हें रघुवीर जी बट्टू जी कहते थे) ने बताया कि वह परिवार से बहुत हिलमिल गया था ।बाद में कोलकाता चला गया  जहां उसने शादी कर ली ।काफी समय तक उससे संपर्क बना रहा । 

ऐसे ही यूरोप से एक पत्रकार आये थे रोजर मूडी। वे भी रघुवीर जी के घर पर रहे करीब एक बरस ।बीच में दो महीने के लिए पाकिस्तान गये थे । वे अंग्रेज़ी में अपनी रिपोर्टें टाइप करते जिनका अनुवाद रघुवीर जी खुद  किया करते थे ।

उन का परिचय दिल्ली में  कई लोगों से कराया ।उन्हें व्कभी कभी अपने साथ  ऑफ़िस भी लाते थे ।ऐसे ही एक बार हाथरस गये और किसी का एम्स में इलाज कराने के लिये अपने घर ले आये थे ।बिमलेशवरी जी बताती हैं कि सहाय जी को दुख तकलीफ किसी से देखी नहीं जाती थी ।

कुछ लोगों का मानना है कि लोगों की मदद करने का माद्दा उन्हें अपनी पत्नी से ही मिला था  । रघुवीर जी अपने मधुर,शिष्ट और हमदर्द स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। मैंने उन्हें कभी उंची आवाज़ में बोलते नहीं सुना था।

वे हर किसी का दुखदर्द बड़ी संजीदगी से सुनते थे और जो कुछ भी उनसे बन पड़ता था उसकी सहायता भी करते थे ।

मैंने उन्हें प्रायः कार मेकैनिक,मोची,ड्राईवर, चपरासी आदि की तकलीफ़ों को पूरी तवज्जो के साथ सुनते हुए उनकी हर संभव मदद करते हुए देखा था ।

एक बार मैं और जितेंद्र गुप्त उनकी कार में बैठे बियर पी रहे थे ।

किसी ने उनकी कार के शीशे पर दस्तक दी ।दस्तक देने वाले को रघुवीर जी ने डांट कर भगाया नहीं बल्कि उसकी परेशानी सुनकर उसे दूर किया ।

वे वास्तव में आम आदमी के संपादक थे ।उनसे उनकी सर्जनात्मक निकटता भी थी,पत्रकारी और इंसानी भी ।

शायद यही वजह थी कि उनकी शव यात्रा में साहित्यकारों और पत्रकारों के अतिरिक्त आमजन का भी भारी समूह था ।

निगम बोध घाट में उनकी अन्त्येष्टि में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर तथा भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा कुछ मंत्री भी शामिल हुए थे ।  आमजन लोगों में से कुछ की प्रतिक्रिया थी कि हम नहीं जानते थे कि ये इतने बड़े साहब हैं ।हम से तो ऐसी बातें किया करते थे जैसे वह हम में से ही एक हों।इतनी सादगी थी उनमें कहीं किसी तरह का बड़प्पन नहीं ।

‘दिनमान ‘ से नवभारत टाइम्स में तबादले के बाद वे खासे खिन्न रहने लगे  थे ।वहां उन्हें सहायक संपादक  बना कर भेजा गया था ।इसे वे अपनी अवनति  मानते थे ।जिस व्यक्ति ने 14 साल तक डंके की चोट पर संपादकी की हो,भला किसी की अधीनता वह कैसे स्वीकार कर सकता है ।

बेशक़ नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक ने उनके अनुभव और वरिष्ठता का सम्मान करते हुए उन्हें पूरी छूट दे रखी थी लेकिन दिनमान से उन्हें हटाया जाना उन्हें सदा सालता रहा ।

एक दिन उन्होंने नवभारत टाइम्स से त्यागपत्र दे कर अपने आप को स्वतंत्र कर लिया । बहुत लोगों ने उन्हें नयी पत्रिका निकालने की सलाह दी ।

हमारे एक मित्र वरिष्ठ पत्रकार शंभू नाथ शुक्ल तो एक लाख रुपए का चेक लेकर उनके पास इस निवेदन के साथ पहुंच गये कि आप काम शुरू कीजिए और पैसा आ रहा है ।

रघुवीर सहाय ने उनकी सदायशता के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि जब कभी भी मैं इस बाबत सोचूगा तब आपको याद करूंगा । दरअसल रघुवीर जी के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंची थी।

मेरी जानकारी के अनुसार कुछ उद्योगपतियों ने भी उनसे सम्पर्क साध कर एक साप्ताहिक निकालने की पेशकश की थी लेकिन अब वे कोई नयी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार और उत्साहित नहीं थे । वे आज़ाद रह कर स्वतंत्र लेखन में अपने आप को खपाना चाहते थे ।

30 दिसंबर,1990 को मात्र 61 साल की उम्र में रघुवीर सहाय हम से सदा के लिए  विदा हो गये । उनकी मधुर और यादों को सादर नमन ।

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