नवरात्रि में शक्ति उपासना और श्रीचक्र

श्री विद्या और श्री चक्र

जीवन पर जब-जब संकट आता है और मनुष्य गहरी पीड़ा से गुजरता है तो आर्त स्वर में माँ का स्वर ही प्रस्फुटित होता है. पीड़ा या प्रसन्नता का प्रथम स्वर दुनिया के किसी भी क्षेत्र या भाषा में माँ ही निकलता है. यही वह बिन्दु है, जहाँ से शक्ति उपासना का आरम्भ होता है. आज भी दुनिया के बहुसंख्य लोग वेद-शास्त्र जानें न जानें, पर परम सत्ता को मातृशक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं.

– डा.आर.अचल

दुनिया की प्रत्येक संस्कृति में विविध रूपों दैव उपासना करने की परम्परायें हैं. सभी सभ्यताओं में अपने-अपने आस्था के प्रतिमान हैं, जिसके लिए तमाम शास्त्र हैं. शास्त्रीय विधि-विधान है, परन्तु यहाँ एक अहम सवाल है कि पहले शास्त्र बने या मनुष्य? इसका सहज स्वभाविक उत्तर मनुष्य होगा, जिसने अपने जीने के लिए प्रकृति के साथ संघर्ष किया होगा, कभी विजयी होकर गर्वित हुआ होगा, तो कभी पराजित होकर नतमस्तक हुआ होगा. इन्हीं प्रक्रियाओं से अदृश्य सत्ता के प्रति आस्था का जन्म हुआ होगा.

तात्पर्य यह कि जीवन का स्रोत ग्रंथ नहीं, ग्रंथ का स्रोत जीवन है इसलिए शक्ति के प्रति आस्था शास्त्रों के पूर्व से ही होना चाहिए, क्योंकि जन्म का स्रोत माँ ही है. जन्म, पोषण, स्नेहदण्ड दायित्व माँ पर ही होता है इसलिए जीवन क्रम को आगे बढाने और जीवन जीने के लिए आवश्यक कारक नदी, पृथ्वी, अग्नि, हवा आदि सभी को आदि मनुष्य ने माँ के रूप में ही देखा है. जो शास्त्र में हो या न हो पर लोक में आज भी है.

जीवन पर जब-जब संकट आता है और मनुष्य गहरी पीड़ा से गुजरता है तो आर्त स्वर में माँ का स्वर ही प्रस्फुटित होता है. पीड़ा या प्रसन्नता का प्रथम स्वर दुनिया के किसी भी क्षेत्र या भाषा में माँ ही निकलता है. यही वह बिन्दु है, जहाँ से शक्ति उपासना का आरम्भ होता है, जो जीवन के विकास क्रम में “अथातो शक्ति जिज्ञासा” का सूत्र बन गया. इसलिए शक्ति उपासना का बीज निश्चित ही वेद पूर्व है. आज भी दुनिया के बहुसंख्य लोग वेद-शास्त्र जानें न जानें, पर परम सत्ता को मातृशक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं.

श्रीविद्या और श्री चक्र

भारत के ग्राम्य जीवन में प्राचीनतम् आस्था का केन्द्र काली स्थान ही है, जहां शक्ति रूप में मिट्टी की स्तनाकृति पिण्डियाँ स्थापित होती हैं. प्राचीनतम् शक्ति पीठों में भी पिण्डियाँ ही मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में स्थापित मिलती हैं, जिसका कोई इतिहास नहीं मिलता है, वेद, पुराण कहीं भी नहीं है पर मानव मन में अनंतकाल से बसा हुआ है.

सैंधव सभ्यता वेद से प्राचीन मानी गयी हैं. यहाँ भी शक्ति उपासना के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं. मिश्र, यूनान, माया सभ्यता में भी शक्ति उपासना के तत्व प्राप्त होते हैं. मातृदेवी सैन्धव सभ्यता में प्रमुख रूप से उपास्य रही हैं. बलूचिस्तान, ईरान में मातृ देवी की मूर्तियों का प्राप्त होना शक्ति उपासना की व्यापकता, प्राचीनता सिद्ध करती है.

इस प्रकार शक्ति उपासना आदिम काल से ही इतना अधिक लोकप्रिय रहा है कि अनेकानेक धार्मिक परम्पराओं, विचारों, वेद, योग, सांख्य, वैष्णव, शैव, गाणपत्य, सौर्य, बौद्ध, जैन आदि सभी सम्प्रदायों का अभिन्न अंग बन चुका है. शक्ति उपासना के प्रति यही आस्था मानव मन के विकासक्रम में विभिन्न रूपो में शास्त्रों, ग्रंथों, मंत्रों, यंत्रों, संहिताओं, यामलो, तंत्रादि के रूप में विकसित होती चली गयी.

आज भी विभिन्न धार्मिक आन्दोलनों के बावजूद शक्ति उपासना के प्रति आकर्षण बना हुआ है. मातृदेवी की प्राचीनता माँ काली के रूप में सर्वाधिक प्रचलित है. दश महाविद्याओं का मूल काली ही है.

दश महाविद्याओं का क्रम काली, तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुरभैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला के रूप में है, जिन्हें सिद्ध साधकों ने काली कुल और श्रीकुल में विभाजित किया है. कालीकुल की अधिष्ठात्री काली तथा श्रीकुल ही अधिष्ठात्री त्रिपुरसुन्दरी हैं.

त्रिदेव की संकल्पना में ब्रह्मा, विष्णु, शिव की सृजन, पालन और संहार, तीनों गुण शक्ति में सन्निहित है. दूसरे शब्दों में शक्ति के कारण ही ये शक्तिवान हैं. इस तरह शाक्त दर्शन में शक्ति ही परम् आदिसत्ता है, जो नाना रूपों में जीव-अजीव जगत का कारण है. सैधव काल में मातृदेवी के बाद पितृपुरुष का स्थान है, जो शाक्त परम्परा के विकास क्रम में शिव रूप में शक्ति से अभिन्न रूप में स्थापित हो गये.

कालीदास ने इनकी अभिन्नता को दर्शाते हुए (वागर्थाविव संपृक्तौ–) शब्द और अर्थ कहा है. काली कुल में, शिव, महाकाल तथा श्रीकुल में सदाशिव कहलाते हैं. शाक्त दर्शन में शिवशक्ति ही आद्य तत्व है, ये देश-काल और तर्क से परे है. सापेक्ष भी है, निर्पेक्ष भी है. मूलतः दोनों एक ही तत्व के दो पक्ष हैं. शक्ति ही अन्तर्मुखी होकर शिव तथा बहिर्मुखी होकर शक्ति है. दोनों के सामरस्य की स्थिति ही सर्जनशक्ति है.

श्रीयंत्र वर्ण

आलोक और स्फूर्ति के रूप में जो शिव है, वही शक्ति में समाविष्ट होकर बिन्दु रूप हो जाते हैं. यहाँ सृष्टि का संलयन (एकाकार) हो जाता है. सारे रंग एक दूसरे में विलीन हो कर कृष्ण हो जाते हैं. यही श्रीविद्या शिखर कृष्ण बिन्दु है, जो गतिशील होने पर प्रकाशमय श्वेत बिन्दु में परिवर्तित हो जाता है. यही श्रीयंत्र का श्वेतबिन्दु है. दोनों के सम्मिलन से नाद तत्व (ध्वनि) का उदय होता है.

नाद ही जगत के सृजन का कारण बनता है. यहाँ बिन्दु पुरुष तत्व है, नाद आभास्यअमूर्त ऊर्जा है, जो सघन होकर नीलाभ वर्ण काली है. विस्तारित होकर रक्ताभ वर्ण सुन्दरी है. नाद  के अभाव में स्पन्दन संभव नहीं है. इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि शक्ति के अभाव में शिव ही शव बन जाता है. श्वेत बिन्दु और रक्त बिन्दु का सामरसिक विस्तार ही ब्रह्माण्ड है, सृजन है, संसार है, जगत है.

इस रहस्य को जानने और जुड़ने की विधा तंत्र कहलाती है. सिद्धों ने तंत्र की अनेक विधियों का सूत्र दिया है, जिसमें भैरवीचक्र और श्रीचक्र अतिगुह्य व प्रभावशाली है. दोनों गुह्य विद्याओं की साधना प्रक्रिया कठिन और सावधानी पूर्ण है पर शिघ्र सिद्धिप्रद है. इस साधना विधा को ही श्री चक्रार्चन कहा गया है.

श्रीविद्या और श्री चक्र

जैसा कि उपरोक्त आलेख में कहा गया है कि श्वेत बिन्दु और रक्त बिन्दु का सामरस्य ही जगत का कारण है. इस रहस्य को जानने और जुड़ने के लिए सिद्ध साधकों ने रेखात्मक रचना के माध्यम से इस विधा को व्यक्त किया है. ये रेखात्मक रचनायें मंत्र ध्वनि के साथ जुड़ कर साधक को सृजन, पालन, संहार के रहस्यमय शक्ति से सम्बद्ध कर देती है.

इस रेखात्मक संरचना को श्रीयंत्र तथा मंत्र को श्रीविद्या कहा गया है. यहाँ मूल बिन्दु समस्त जगत का उपादान है. नाद (मंत्र) से रक्तबिन्दु का आभिर्भाव होता है. यहीं से सृजन आरम्भ होता है. यहाँ श्वेत बिन्दु पुरुष तत्व है और रक्तबिन्दु स्त्री तत्व है. सामरस्य से श्वेताभ रक्त बिन्दु कामकला कहलाती है. यही सृष्टि का आधारपीठ है. महाकामेश्वर-महाकामेश्वरी का स्वरूप है.

सहज शब्दों में इस तरह कह सकते हैं कि यंत्र तब तक केवल रेखाकृति मात्र है जबतक (मंत्र) ध्वनि के संपर्क में नहीं आता है, अर्थात श्रीचक्र ही श्री विद्या का आधार पीठ है. दोनों के आपसी संस्पर्श से बिन्दु का विस्तार त्रिकोण के रूप में होता जाता है, जिसका तात्पर्य त्रिगुणात्मक होना है. यह पूरी सृष्टि त्रिगुणात्मक ही तो है. सत-रज-तम कहे या वात-पित्त-कफ या इच्छा-क्रिया-ज्ञान या कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिनी या सरस्वती-लक्ष्मी-काली.

श्रीयंत्र

त्रिकोण का विस्तार अष्टकोण में होता है, जो अग्निकलायुक्त  वशिन्यादि अष्टशक्तियों का स्वरूप है. ये जगत के अष्टभाव हैं. इस क्रम का विकास क्रमशः अन्तर्दशार, बहिर्दशार, चतुर्दशार कोणों के रूप में होता है. यहाँ अधोमुखी कोण शिवात्म तथा उर्ध्वमुखी कोण शक्त्यातमक होते हैं. दोनों के सामरस्य से अष्टदल, षोडसदल, सृष्टि विकसित होती है. अंततः पुनः विराट त्रिगुणात्मक त्रिवृत्त और महाविराट ब्रह्माण्ड स्वरूप भूपूर में विकसित हो जाता है. इस प्रकार श्रीयंत्र प्रतीक है ब्रह्माण्ड के संरचना प्रक्रिया का. इस यंत्र में समस्त ब्रह्माण्ड, देव, दानव, यक्ष, मानव, जैविक-अजैविक जगत, भाव, दृश्य-अदृश्य सभी कुछ समाहित है.

श्री विद्या की उपासना के लिए भोजपत्र, ताम्रपत्र, रजत पत्र, स्वर्णपत्र, स्वर्ण-रजत-ताम्र मिश्रित त्रिधातु, स्फटिक, प्रवाल, पुखराज, पन्ना, हीरा, इन्द्रनीलमणि पर रेखायें खींच कर या काटकर बनायी जाती है, जो समतल या उर्ध्वाकार होती है. वर्तमान में त्रिधातु, स्फटिक व ताम्रपत्र पर बने हुए श्रीयंत्र सर्वसुलभ हैं. इसे लक्ष्मी यंत्र को रूप में भी बाजार में मिलता है. सामान्यतः सहज सुलभ स्फटिक या त्रिधातु के श्रीयंत्र का प्रयोग प्राणप्रतिष्ठा करके करना चाहिए. नवरात्रि में श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करके एक लघु पुरश्चरण (एक लाख जप व दशांश हवन) कर स्थापित कर दैनिक सामान्य पूजन करने से घर-परिवार के अनेक दोष समाप्त हो जाते हैं. सुख, समृद्धि, विद्या की वृद्धि होती है.

श्रीविद्या चक्रार्चन महायाग-वैज्ञानिक विमर्श एवं विधि-अचल पुलस्तेय की पुस्तक का अंश

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