नवरात्रि में करें मां वैष्णो देवी के दर्शन, होगी हर मुराद पूरी

माता वैष्णो देवी के दरबार में होती है हर मुराद पूरी

वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाड़ियों पर स्थित है. इन पहाड़ियों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं. यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर. तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद यह भारत में दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है.

अक्टूबर का महीना माता के भक्तों के लिए बेहद खास रहता है क्योंकि इसी महीने में नवरात्रि मनाई जाती है. नवरात्रि के वक्त देश भर के कई सारे तीर्थ स्थानों और माता के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. पर वैष्णो देवी तीर्थ स्थान माता के भक्तों के लिए सबसे पसंदीदा जगहों में से एक माना जाता है.

अगर आप नवरात्रि के वक्त वैष्णो देवी दर्शन का मन बना रहे हैं तो, IRCTC आपके लिए बेहद ही शानदार टूर पैकेज लेकर आया है. IRCTC ने अपने इस पैकेज को वैष्णो देवी दर्शन नाम दिया है.

कहां से शुरू होगी यात्रा

वैष्णो देवी के इस टूर की शुरुआत नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात आठ बजकर पचास मिनट पर होगी. रात भर की यात्रा के बाद, अगली सुबह यात्री 8 बजकर 40 मिनट पर श्री माता वैष्णो देवी कटरा रेलवे स्टेशन पर उतरेंगे. इसके बाद यात्रियों को IRCTC के गेस्ट हाउस में ले जाया जाएगा, जहां उन्हें यात्रा स्लिप उपलब्ध कराया जाएगा. इसके बाद यात्रियों को बाणगंगा तक ले जाया जाएगा, जहां से यात्री माता के दर्शन के लिए मंदिर तक चढ़ाई करेंगे.

दर्शन से वापस लौटकर यात्री होटल में रात्रि विश्राम करेंगे. फिर अगले दिन शाम 6 बजकर 50 मिनट पर वापस दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे.

कौन कौन सी सुविधाएं मिलेंगी

इस टूर में यात्रियों को स्लीपर क्लास कोच में आने और जाने की यात्रा कराई जाएगी. यात्रियों के आराम के लिए कटरा में एसी गेस्ट हाउस की सुविधा उलब्ध होगी. इस टूर में यात्रियों को नाश्ता भी दिया जाएगा. इसके अलावा होटल से बाणगंगा तक लाने और ले जाने की व्यवस्था भी की जाएगी.

कितने का है यह टूर पैकेज

IRCTC के इस 3 रात और 4 दिन वाले टूर पैकेज के लिए आपको 2845 रुपये खर्च करने होंगे. अधिक जानकारी के लिए आप माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की वेबसाइट https://www.maavaishnodevi.org/ पर जाकर सारी जानकारी ले सकते हैं.

वैष्णो देवी गुफा मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा

वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाड़ियों पर स्थित है. इन पहाड़ियों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं. यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर. तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद यह भारत में दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है.

मंदिर परिचय : त्रिकुटा की पहाड़ियों पर स्थित एक गुफा में माता वैष्णो देवी की स्वयंभू तीन मूर्तियां हैं. देवी काली (दाएं), सरस्वती (बाएं) और लक्ष्मी (मध्य), पिण्डी के रूप में गुफा में विराजित हैं. इन तीनों पिण्डियों के सम्मि‍लित रूप को वैष्णो देवी माता कहा जाता है. इस स्थान को माता का भवन कहा जाता है. पवित्र गुफा की लंबाई 98 फीट है. इस गुफा में एक बड़ा चबूतरा बना हुआ है. इस चबूतरे पर माता का आसन है, जहां देवी त्रिकुटा अपनी माताओं के साथ विराजमान हैं.

जम्मू से 46 किलोमीटर दूर स्थित कटरा से ही माता वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है] जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है.

भवन वह स्थान है, जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था. प्राचीन गुफा के समक्ष भैरों का शरीर मौजूद है. उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया जबकि शरीर यहीं रह गया. जिस स्थान पर उसका सिर गिरा, आज उस स्थान को ‘भैरोनाथ के मंदिर’ के नाम से जाना जाता है.

जम्मू से 46 किलोमीटर दूर स्थित कटरा से ही माता वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है] जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है.

मंदिर की पौराणिक कथा: मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं. एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उसे पकड़ने के लिए दौड़े. तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं. भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे. माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए. हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए. फिर वहीं एक गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की और हनुमानजी ने पहरा दिया.

नौ महीने बाद भैरव नाथ वहां आ धमके. उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे. भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है. अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है. यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था.

माता वैष्णो देवी दरबार में प्रवेश के लिए मंदिर की पुरानी गुफा अगर आपको खुली हुई मिल जाए, तो खुद को आप खुशकिस्मत मानेंगे.

अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ को वापस जाने का कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा. यह देखकर माता की गुफा पर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकारा. इसके बाद दोनों का युद्ध हुआ. युद्ध का कोई अंत न देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया.

कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी. माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी. तब उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा.

मंदिर की कथा : उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है. 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे. वे नि:संतान और गरीब थे लेकिन सोचते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे.

एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सकें. जितने लोगों ने उनकी मदद की, वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे.

माता वैष्णो देवी दरबार में मां वैष्णो अपनी माताएं काली, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ विद्यमान हैं.

वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा. भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे, यह सोचकर कि वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे. वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और अब उन्हें बस देवी मां से ही आस थी. वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए. सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए.

श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा कि इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उन्होंने एक छोटी लड़की को झोपड़ी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था. वह भगवान की कृपा से आई थी और सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी. भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था. भंडारे के बाद श्रीधर उस छोटी लड़की वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी.

बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया, जिसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी. माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया. श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े. कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई. तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे.

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