गृहयुद्ध की ओर बढ़ता म्यांमार

विश्व में एक नये शीतयुद्ध के आमद का संकेत

शिवेंद्र प्रताप सिंह
शिवेंद्र प्रताप सिंह

वैश्विक राजनीति अभी इजराइल -हमास के संघर्षो से उभरी नहीं थी कि अब सैन्य सत्ता के दमन से बंधा म्यांमार गृहयुद्ध की दिशा में आगे बढ़ रहा है.संयुक्त राष्ट्र ऐसी आशंका जता रहा है. वर्ष 2011 में पांच दशकों से चले आ रहे सैन्य शासन का अंत हुआ और लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना हुईं.लेकिन सेना ने वहाँ पुनः शासन अपने हाथ में लेते हुए आपातकाल लगा दिया है . सू ची समेत कई नेता गिरफ्तार कर लिए गये हैं.

म्यांमार में लोकतान्त्रिक सरकार के कार्यकाल में भी सेना सत्ता पऱ हावी थी. वर्ष 2015 में जब सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर्म डेमोक्रेसी सत्ता में आयी, तब भी सू ची ने सेना के विरुद्ध कोई कड़ा रुख नहीं दिखाया. कहीं ना कहीं परदे के पीछे एक प्रकार के सहअस्तित्व की भावना दोनों पक्ष स्वीकार कर चुके थे. कट्टरपंथी रोहिंग्या के विरुद्ध कार्यवाही के दौरान सेना पऱ जब मानवाधिकार हनन के आरोप लगे तब भी सू ची का रुख सैन्य बलों के समर्थन में ही रहा.

2011 के बाद म्यांमार पऱ प्रतिबन्ध भी ढीले होने लगे थे, विदेशी निवेश प्रारम्भ हो चुका था. म्यांमार के संविधान में वर्ष 2008 के संशोधन द्वारा संसद की एक चौथाई सीट सेना के लिए आरक्षित कर दी गई हैं. इसके अतिरिक्त सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालयों यथा, गृह, रक्षा आदि पऱ नियंत्रण का अधिकार भी सेना के पास है. इसके बावजूद सेना को आपातकाल लगा कर तख्ता पलट करने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

तख्ता पलट करने की आवश्यकता क्यों पड़ी


इसकी पहली वजह तो नई सरकार द्वारा संविधान संशोधन किये जाने की संभावना को बताया गया है.

दूसरी वजह नवंबर के चुनाव में सेना द्वारा समर्थित दल यूएसपीडी की करारी पराजय से सेना बौखला गई. सेना ने इसे देश पऱ अपने सिकुड़ते प्रभाव के तौर पऱ देखा. भले ही अंतर्राष्ट्रीय जगत में सू ची म्यांमार की पहचान मानी जाती हो, पऱ सेना देश को अपनी जागीर समझती है और बात जहाँ सत्ता की हो, सेना वहाँ किसी निर्वाचित सरकार की अधीनता स्वीकार करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है.

तीसरी वजह थी अंतराष्ट्रीय निवेश की आवक. हाल के वर्षों में म्यांमार की अर्थव्यवस्था ग्लोबल होती जा रही थी. सेना हर बाहरी को चाहे वो व्यक्ति हो, निवेश या की व्यापारिक संस्थान, अपने लिए एक खतरे के तौर पऱ देखती है. करोना से होने वाली मौतें और रोहिंग्याओं के मानवाधिकार हनन तथा उन्हें मताधिकार से वंचित किये जाने के मुद्दे पऱ अंतराष्ट्रीय बिरादरी के आलोचनाओं को भी सेना सहन नहीं कर पा रही थी.

इन सबका परिणाम यें हुआ की एनएलडी के दूसरे कार्यकाल के लिए संसद के प्रथम सत्र के कुछ घंटे पूर्व सेना ने सू ची समेत सभी कई सारे नेताओं को हिरासत में ले लिया और सरकार का तख्ता पलटते हुए आपातकाल घोषित कर दिया. आपातकाल और तख्ता पलट की वैधता को साबित करने के लिए सेना समर्थित मुख्य विपक्षी दल यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी(यू एस डी पी) द्वारा निर्वाचित सरकार पऱ चुनावों में धांधली के आरोपों को आधार बनाया गया है.

सू ची पऱ आयात -निर्यात नियमों के उल्लंघन और गैरकानूनी ढंग से दूरसंचार यंत्र रखने का आरोप लगाया गया है. जबकि अपदस्त राष्ट्रपति विन मिन पऱ कोरोना महामारी के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है.

 प्रथम दृष्टया इससे सेना को कोई तत्कालिक लाभ मिलता नहीं दिखता. इसके विपरीत पश्चिमी देशों का कोप और यू. एन. के प्रतिबधों का दबाव बढ़ने की संभावना है. लेकिन इसके पीछे सेना कुछ अन्य लक्ष्य सिद्ध करना चाहती है, जैसे की वणिज़्यीक और राजनीतिक हितों का पूर्ति और स्वयं द्वारा समर्थित यूएसडीपी को चुनावों के लिए एक बेहतर स्थिति में लाना. 

म्यांमार में सड़कों पर प्रदर्शन

म्यांमार के सैन्य प्रमुख मिंग आंग लाइंग ने नेशनल चैनल पऱ जनता को संबोधित करते हुए लोकतंत्र की रक्षा करने और नये चुनाव कराने जा वादा किया. हालांकि 10 सालों से लोकतंत्र की खुली हवा में सांस ले चुकी जनता इस आपातकाल को आसानी से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. युवाओं समेत बड़ी संख्या में लोग सड़को पऱ उतर आये हैं और सेना के विरुद्ध प्रदर्शन में जुट गये है. सेना भी इस विरोध के क्रूर दमन पऱ उतारू है. अब तक लगभग 800 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 50 से अधिक पुलिसऔर सेना के लोग है, तथा 6000 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है जिनमें कई लापता बताये जा रहें हैं. सेना प्रमुख ने प्रदर्शनकारियों की तरफ से ही सुरक्षा बलों पऱ गोलीयां चलाने का आरोप लगाया है.

मिस ग्रैंड म्यांमार हैन ले सैन्य विरोध का नया चेहरा बनकर उभरी हैं

इस दौरान 1,75,000 लोग भारत, चीन और थाईलैंड में विस्थापित हुए हैं.अरस्तु का कहना था की प्रकृति को खाली जगह पसंद नहीं होती. आंग सांग सू की जब पीछे छूटी, तब उनकी जगह मिस ग्रैंड म्यांमार हैन ले सैन्य विरोध का नया चेहरा बनकर उभरी. हैन ले ने यंगून में एक जनसभा में सैन्य तख्ता पलट का विरोध किया था. साथ ही सौंदर्य प्रतियोगिता के मंच से उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की. हालांकि इस वजह से वे सेना के निशाने पर आ गयी हैं, संभावित खतरे को देखकर उन्होंने अभी थाईलैंड में निर्वासन में जीवन बिताने का निर्णय किया है.

इस दौरान हैन ले की थ्री फिंगर सैल्यूट बनाती हुईं तस्वीर सोशल मिडिया पऱ खूब प्रचारित हुईं. थ्री फिंगर सैल्यूट एशिया में सैन्य सत्ता के विरुद्ध विरोध का प्रतीक बन चुका है.

भारत इस मुद्दे पऱ बहुत सावधानी से प्रतिक्रिया दे रहा है. म्यांमार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाये गये प्रतिबन्ध प्रस्तावों पऱ मतदान में भारत, चीन थाईलैंड, बांग्लादेश, नेपाल, लाओस भूटान आदि 36 अनुपस्थित रहे. इसके द्वारा भारत ने अपनी विदेश नीति का मंतव्य स्पष्ट कर दिया है. वर्ष 2014 में भाज़पा सरकार के सत्ता में आने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि वर्तमान सरकार विदेश नीति में नेहरूवादी आदर्श को भुला चुकी है और अपने राष्ट्रीय हितों को वैश्विक शांति के लिए तिलांजलि देने को तैयार नहीं है. 

म्यांमार में गृहयुद्ध का गहराता संकट दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया के लिए नई चुनौती बन सकता है. म्यांमार में शननी नेशनलटीज आर्मी, कचिन स्वतंत्रता संगठन, अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी उर्फ़ हराकाह अल-हकीम, जैसे कई विद्रोही संगठन अस्तित्व में हैं, जिनका देश में अपना प्रभाव क्षेत्र है.

लोकतंत्र की रक्षा के नाम पऱ अगर नाटो देश म्यांमार के विद्रोही गुटों के समर्थन में उतरते हैं तो यह देश नया सीरिया या लीबिया बन सकता है. सीमावर्ती पड़ोसी होने के नाते भारत समेत अन्य पड़ोसियों को भी इस गृहयुद्ध के दुस्परिणाम भुगतने होंगे. बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.

यह दौर विश्व में एक नये शीतयुद्ध के आमद का संकेत दे रहा है. इस बार पश्चिम देशों का सामना ussr से अलग कहीं शातिर चीन से है. चीन अमेरिकी सर्वाधिकारवाद को बिल्कुल सहन करने के लिए तैयार नहीं है. कुछ दिनों पूर्व ताईवान में लड़ाकू विमानों की पूरी स्कवार्डन भेज कर अपनी मंशा जता दी. अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों को धता बता उसने ईरान से नई सन्धि कर ली.अनकहे ही सही लेकिन रूस विश्व राजनीति के इस द्वंद में चीन का नेतृत्व स्वीकार कर चुका है. हालांकि ट्रम्प के उलट बाइडन का रुख चीन के प्रति नरम है, परन्तु अमेरिकी जनमानस का रुझान चीन विरोधी है. कोरोना वायरस को लेकर पहले ही पश्चिमी देशों और चीन के सम्बन्ध कड़वे हैं. अगर दोनों पक्ष शक्ति परीक्षण के लिए म्यांमार में उतर आये तो परिस्थितियां विकट हो सकती हैं.   

 शिवेन्द्र प्रताप सिंह   

 शोधार्थी- सामाजिक विज्ञान संकाय   

 वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार     

 E-mail – Shivendrasinghrana@gmail.

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