मुलेठी मेँ छिपा है सेहत का खजाना

यष्टी हिमा गुरु: स्वाद्वी चक्षुष्या बलवर्ण कृत।

सुस्निग्ध शुक्रला केशया स्वर्या पित्तानिलास्रजित॥

व्रणशोथविषच्छर्दितृष्णाग्लानिक्षयपहा॥ 

अर्थात, मुलेठी शीतवीर्य, गुरु, मधुर रस युक्त, नेत्रों के लिए हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुंदर करने वाली, स्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिए हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात, तथा रक्त के प्रकोप का शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वामन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है।  

(भाव प्रकाश हरीतिक्यादि वर्ग 146)

मुलेठी एक सर्वसुलभ एवं सुपरिचित वनस्पति है जिसे संस्कृत भाषा में यष्टिमधु के नाम से जाना जाता है। जिसकी जड़ सभी जगह बाज़ारों में पंसारियों के यहाँ मिल जाती है। सामान्यतः लोग इसे खांसी आने पर या गला साफ करने ले लिए प्रयोग करते हैं। लेकिन यह इतनी गुणवान वनस्पति है कि इसे सेहत का खजाना भी कहा जाता है। चरक संहिता में इसे कंठ्य, जीवनीय, संधानीय, वर्ण्य, कण्डूघ्न, मूत्रविसर्जनीय, शोणित स्थापन, छर्दिनिग्रहण, स्नेहोपग, वमनोपग, आस्थापनोपग कहा गया है। सुश्रुत संहिता में काकोल्यादि, सारिवादि, अंजनादि, गणों में मुलेठी का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में मुलेठी का प्रयोग दुर्भाग्यनाशन एवं गर्भबृंहण के लिए करने का उल्लेख मिलता है। जांगमविष के निवारण में भी इसके प्रयोग का उल्लेख मिलता है। चरक संहिता में इसका प्रयोग रसायनार्थ और सुश्रुत संहिता में इसका प्रयोग विरेचनार्थ करने का उल्लेख है।

यह एक वात-पित्त शामक औषधि है। इसका वाह्य लेप के रूप में रंग को निखारने, खुजली, चर्मरोग, बालों की वृद्धि तथा सूजन कम करने के लिए किया जाता है। इसका आंतरिक प्रयोग मृदु रेचन, शोणित स्थापन, मूत्रल, मूत्र विसर्जनीय, कफ निस्सारक, कंठ्य, चक्षुष्य, शुक्रवर्धक, जीवनीय, रसायन, बलकारक तथा ज्वर दूर करने के लिए किया जाता है।

मुलेठी की जड़ मधुर, शीतल, पित्तर्रोधी, रक्तशोधक, स्तंभक, बलकारक, मूत्रल, प्रशामक, पल्प विरेचक, बाजीकर, कफनिस्सारक, आरतावजनन, विष्घ्न। परिवर्तक तथा मेधावर्धक होती है। 

मुलेठी के चिकित्सीय उपयोग पर चर्चा करने के लिए श्री रामदत्त त्रिपाठी के साथ आयुषग्राम चित्रकूट के संस्थापक, भारतीय चिकित्सा परिषद, उ.प्र. शासन में उपाध्यक्ष तथा कई पुस्तकों के लेखक, आयुर्वेद फार्मेसी एवं नर्सिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य एवं प्रख्यात  आयुर्वेदचार्य आचार्य वैद्य मदन गोपाल वाजपेयी, छिंदवाड़ा म.प्र. के आयुर्वेद प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रजनीश ओलोनकर एवं बनारस विश्वविद्यालय के दृव्य गुण विभाग के प्रो. (डॉ) जसमीत सिंह उपस्थित हैं। प्रस्तुत हैं चर्चा के कुछ प्रमुख अंश: 

श्री रामदत्त त्रिपाठी: डॉ. वाजपेयी जी! मुलेठी को सेहत का खज़ाना क्यों कहा जाता है?

डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी: आयुर्वेद में मुलेठी को जीवनीय दृव्य कहा गया है। यह औषधि शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले दृव्यों में भी शामिल है। संधानीय गुण होने से यह टूटी हुई हड्डी को जोड़ती है, उल्टी को रोकती है, बहते हुये रक्त का स्तंभन भी करती है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे मुलेठी तथा संस्कृत के आयुर्वेदीय ग्रन्थों में इसे न मधुयष्टि, अर्थात, ऐसी छड़ी जो मीठी हो, कहा गया है। चक्षुष्या होने से यह नेत्रों के लिए भी बहुत लाभकर होती है। 1-1 ग्राम घृत, मधु या मिश्री या इलायची और मुलेठी चूर्ण का सेवन नियमित रूप से करने और मुलेठी के स्वरस को आँखों में डालने से नेत्रों की ज्योति में निश्चित रूप से वृद्धि होती है। इसे केवल घृत के साथ भी सेवन किया जा सकता है। यह पित्तशामक होने से पित्त संबंधी रोगों में भी लाभकारी है। या शुक्र धातु में भी वृद्धि करती है। यह बालों की वृद्धि के लिए भी बहुत लाभकारी है। 

श्री रामदत्त त्रिपाठी: डॉ. रजनीश जी! मुलेठी का किन किन दृव्यों के साथ मिला कर इसका प्रयोग किया जाता है?

डॉ. रजनीश ओलोनकर: इसमें विटामिन बी, जिंक, विटामिन सी, मैग्निशियम, फास्फोरस, पोटाशियम जैसे सूक्ष्म पोशाक दृव्य पाये जाते हैं जिससे यह हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाने में बहुत लाभकर है। चीनी की तुलना में अधिक मीठी होने के कारण बहुत से पेय पदार्थों का स्वाद बढ़ाने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। बच्चों का तोतलापन दूर करने के लिए वचा, मुलेठी और सोंठ के मिश्रण का प्रयोग बहुत लाभकारी होता है। बच्चों की स्मृति शक्ति को बढ़ाने के लिए ब्राह्मी, सौंफ, मुलेठी और मिश्री का मिश्रण बहुत लाभकारी है। आजकल दंतमंजन में भी मुलेठी का बहुत प्रयोग किया जाता है। 

श्री रामदत्त त्रिपाठी: प्रो. जसमीत सिंह! मुलेठी में कौन कौन से रसायन पाये जाते हैं? 

प्रो. जसमीत सिंह: मुलेठी में फ्लेवोनोन, रेहेमनोग्लुकोसाइड, लियोरिक, लिक्यूरिटिक एसिड, ग्लिसराइजिक एसिड, स्टार्च, ग्लिसराइजिन, साइपोनिन, यूजीनोल, इनडोल, एस्पेराजीन आदि बहुत से रसायन पाये जाते हैं।   

पूरा सुनने के लिए कृपया क्लिक करें

 

आचार्य डॉ0 मदन गोपाल वाजपेयी, बी0ए0 एम0 एस0, पी0 जीo इन पंचकर्माविद्यावारिधि (आयुर्वेद), एन0डी0, साहित्यायुर्वेदरत्न, एम0ए0(संस्कृत) एम0ए0(दर्शन), एल-एल0बी0।

 संपादक- चिकित्सा पल्लव

पूर्व उपाध्यक्ष भारतीय चिकित्सा परिषद् उ0 प्र0

संस्थापक आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम।

support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

19 + 19 =

Related Articles

Back to top button