विज्ञापनों पर हमारे ही टैक्स के पैसे बर्बाद क्यों कर रही सरकार?

क्यों कर रही सरकार?

-चंद्रकांत झटाले, अकोला

हमारे पैसे हम पर खर्च करने का विज्ञापन क्यों कर रही सरकार: किसी भी देश के लोगों की जिम्मेदारी उस देश की सरकार की होती है। यही वे लोग हैं, जो सरकार का चुनाव करते हैं और यही वे लोग हैं, जो सरकार को विभिन्न करों के रूप में भुगतान करते हैं। जनता के पैसे से ही सरकार जनता का काम करती है।गत 73 सालों से यही चल रहा है।

सरकार का यह कर्तव्य है कि वह लोगों द्वारा टैक्स के रूप में भुगतान किए गए पैसे से लोगों की बुनियादी जरूरतों एवं सुविधाओं को पूरा करे। लेकिन पिछले 7 वर्षों में, इस कर्तव्य को एक एहसान के रूप में विज्ञापित किया जा रहा है। हमारे टैक्स के पैसे विज्ञापनों पर क्यों खर्च कर रही सरकार?

गत 7 वर्षों से इस देश की केंद्र सरकार जो भी योजनायें लोगों के लिए ला रही है, वह ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे खुद की या पार्टी की जेब से वह खर्च हो रहा हो। जनता पर जैसे हम उपकार कर रहे हों, इसी तरह का प्रचार प्रसार सरकार की तरफ से किया जा रहा है। हमारे पैसे हम पर खर्च करने का विज्ञापन क्यों कर रही सरकार?

आजादी के बाद से इस देश में कई अधिक महत्वपूर्ण और महंगी योजनाएं लागू की जाती रही हैं, लेकिन इन योजनाओं की विज्ञापनबाजी नहीं की गयी थी। पिछली सभी सरकारें लोगों को इन योजनाओं और सुविधाओं को प्रदान करने के लिए अपना कर्तव्य निभा रही थीं लेकिन वर्तमान में उन्हें ऐसे लागू किया जा रहा है जैसे वे उपकार कर रहे हों।

कोरोना को आए दो साल हो चुके हैं। सिर्फ दो साल में सरकार ने कोरोना वैक्सीन के लिए अरबों रुपये का विज्ञापन दिया है। कोरोना वैक्सीन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर छपी है। माननीय प्रधानमंत्री को धन्यवाद देने के लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं। सिर्फ इन दो सालों में टीकाकरण के लिए इतने विज्ञापन दिए गए हैं।

1947 के बाद यानी आजादी से लेकर 2014 तक सभी सरकारों ने पिछले 65 सालों से देश के हर नागरिक को पोलियो का टीका मुफ्त में दिया, घर घर जा कर टीका दिया। चेचक की वैक्सीन-खसरा-बीसीजी का टीका मुफ्त दिया गया, लेकिन उन सरकारों ने कभी यह कहकर कृतज्ञ होने का नाटक नहीं किया कि हम आपको मुफ्त टीका दे रहे हैं। यह सब करते हुए आपने तत्कालीन प्रधानमंत्री या तत्कालीन सत्ताधारी दल का नाम अब तक नहीं देखा होगा और आज?

यह तो भारतीयों के द्वारा चुनी गयी सरकार है। आजादी के पहले ब्रिटिशों ने, हम उनके गुलाम होते हुये भी, प्लेग की बीमारी फैलने के बाद सरकारी तंत्र ने घरों में जाकर महिलाओं और पुरुषों की जांच की और उनका मुफ्त इलाज किया ताकि लोगों की जान न जाए।

वास्तव में, अंग्रेजों को कोई यह कहनेवाला नहीं था कि आपने भारतीयों के साथ सही व्यवहार क्यों नहीं किया। हालांकि, उन्होंने भारतीयों को प्लेग से बाहर निकालने के लिए काफी मेहनत की लेकिन इसका विज्ञापन नहीं किया।

वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने लड़कियों के लिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना चालू की। इस योजना के लिए प्रदान की गई धनराशि का 79% विज्ञापनों पर खर्च किया गया था। ये आंकड़े 9 दिसंबर, 2021 को संसद में पेश की गई रिपोर्ट में दिए गए हैं।

इन आंकड़ों के मुताबिक 2016 से 2019 तक बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना के लिए 446.72 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें से 78.91 प्रतिशत लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय विज्ञापनों पर खर्च किया गया। यह शोहरत का प्रचार नहीं तो और क्या? आप अपने प्रचार के लिए जनता का पैसा खर्च करते हैं और ऊपर से एक परोपकारी सा बर्ताव दिखाते हैं।

उज्ज्वला गैस योजना का भी जमकर बवाल हुआ लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा 2016 में शुरू की गई इस ‘उज्ज्वला योजना’ की पोल न्यूज चैनल ‘एनडीटीवी’ ने बेनकाब कर दी है। सच यह सामने आया है कि उज्ज्वला योजना का प्रचार कर रही गुड्डी देवी को चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है, जहां उज्ज्वला ने योजना के जरिए गैस सिलेंडर मुहैया कराने का वादा किया था। आज ज्यादातर घरों में महिलाओं और लड़कियों को चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। रोजगार नहीं है फिर गैस के लिए पैसे कहां लायें? गैस सिलेंडर अब 900 रुपये में मिल रहा है, नाराज महिलाओं ने कहा।

सीएजी (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर 2014 तक 3. 18 करोड़ उज्ज्वला उपभोक्ताओं ने साल में सिर्फ तीन बार सिलेंडर भरा है। मतलब हुआ कि इस योजना के तहत लोगों को कनेक्शन तो दिए जाते हैं लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उनके पास उन सिलेंडरों को भरने के लिए पैसे नहीं होते हैं। गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए सरकार ने विज्ञापन पर 500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए और कुछ ही दिनों में सभी सब्सिडी समाप्त की गयीं। ऐसे में जनता के टैक्स के 500 करोड़ व्यर्थ गए, इसका सवाल कौन पूछेगा? इसी तरह जन-धन योजना के अंतर्गत खाता खोलाने वालों को भी कुछ बैंकों ने जुर्माना लगाया।

पिछली यूपीए सरकार पिछड़े वर्ग के मेडिकल छात्रों को 70,000 रुपये प्रति वर्ष फ्रीशिप दे रही थी। इसमें ट्यूशन फीस, भोजनालय, हॉस्टल और किताबों का खर्चा शामिल था। आज की सत्ताधिष्ठित सरकार ने 2014 से ये स्कॉलरशिप देना बंद कर दिया है।

प्रधानमंत्री ने इतने सालों तक लाखों छात्रों को प्रति छात्र 70,000 रुपये की सब्सिडी देने के बारे में कभी कोई शोहरत भरा हंगामा नहीं मचाया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख द्वारा ओबीसी छात्रों के लिए शुरू की गई छात्रवृत्ति को फडणवीस सरकार ने रोक दिया था।

कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता अभी भी लोगों को यह समझाने में असमर्थ हैं कि कांग्रेस सरकार ने लोगों के लिए कौन सी जनकल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं और भाजपा सरकार ने उन्हें कैसे रोका है। इसका मतलब यह है कि कांग्रेस के लोग भी जनता को यह नहीं बता पा रहे हैं कि कांग्रेस ने पहले कौन से लोकोपयोगी काम किये।

गत 7 साल की सरकार ने ओलंपिक में वास्तव में क्या किया है। भले ही देश के एथलीट स्वेच्छा से पदक लाते हों, थैंक्यू के लिये प्रधानमंत्री के बैनर का इस्तेमाल किया जाता है। इसे क्या कहें? इसके लिए कांग्रेस और सभी विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता समान रूप से जिम्मेदार हैं।

केरल के पीटर म्यालीपरम्पिर ने केंद्र से प्रधानमंत्री की तस्वीर के बिना वैक्सीन सर्टिफिकेट जारी करने को कहा था, लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया। पीटर की दलील थी कि मैंने टीके की दोनों खुराकों के लिए पैसे दिए हैं इसलिए वैक्सीन सर्टिफिकेट व्यक्ति का निजी मामला है। इसमें आदमी की व्यक्तिगत जानकारी होती है। अत: निजी मामले पर अतिक्रमण करना उचित नहीं है। इस बात पर पीटर ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

केरल के पीटर म्यालीपरम्पिर ने केंद्र से प्रधानमंत्री की तस्वीर के बिना वैक्सीन सर्टिफिकेट जारी करने को कहा था, लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया। पीटर की दलील थी कि मैंने टीके की दोनों खुराकों के लिए पैसे दिए हैं इसलिए वैक्सीन सर्टिफिकेट व्यक्ति का निजी मामला है।

अदालत ने याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये का जुर्माना इस तथ्य का हवाला देते हुए लगाया है कि ऐसी याचिकाएं राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं और इससे न्यायालय का समय व्यर्थ गया इसलिए यह जुर्माना है।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता ने प्रदत्त समय के भीतर जुर्माने का भुगतान नहीं किया तो उसकी संपत्ति को जब्त कर जुर्माना वसूल किया जाय। तो इसके खिलाफ किसे बोलना चाहिए? विपक्ष बोलता नहीं है। अगर कोई आम आदमी आवाज उठाता है तो उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। तो देश में जो हो रहा है, उसका खामियाजा भुगतने के सिवाय नागरिकों के पास क्या विकल्प है?

पूरे भारत में 69,924 पेट्रोल पंप हैं। इनमें से हर पेट्रोल पंप पर प्रधानमंत्री की तस्वीर के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं। हर एक के कोविड टीका प्रमाण पत्र पर प्रधानमंत्री की फोटो है। ये तो हुआ केंद्र सरकार का, अब प्रदेश सरकारों का भी देख लीजिये। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में कैसे विकास हो रहा है, इसके दो दो पन्नों के इश्तिहार मराठी अखबारों तक में छपकर आते हैं मतलब वे देश भर के प्रादेशिक अखबारों में जाते होंगे।

अगर इन सरकारों द्वारा अपने विज्ञापनों पर खर्च की गई आधी ऊर्जा का इस्तेमाल भी महंगाई, बेरोजगारी एवं स्थिर अर्थव्यवस्था के लिए किया जाता तो आज देश की स्थिति में निश्चित रूप से सुधार हुआ होता। कोरोना काल में सरकार ने लोगों के मदद अभियान के विज्ञापन में जितना खर्च किया होगा, उससे तो आम जनता को कोरोना से राहत पर खर्च किया होता तो कुछ बात बनती।

एक तरफ देश चलाने के लिए पैसा नहीं इसलिए सरकारी उद्यम, बैंक, रेल आदि निजी हाथों को सौंपे जा रहे हैं। कोरोना से लड़ने के लिए पैसा नहीं इसलिए पीएम केअर्स निधि जमा किया जा रहा है। देश की हालत ऐसी है कि सरकार चलाने के लिए सरकार रिजर्व बैंक से देश का लाखों करोड़ का इमरजेंसी रिजर्व फंड निकालती है। और दूसरी ओर शोहरत दिखावे के लिए विज्ञापनों पर लाखों करोड़ खर्च कर रही है।

आजादी के बाद कई पार्टियों की सरकारें आयीं पर इतना शोहरतभरा दिखावा पहली बार दिख रहा है और विज्ञापन के जरिये शोहरत का दिखावा करने वाले नेता भी जनता पहली बार देख रही है। बीते कुछ दिनों में प्रधानमंत्री द्वारा किये गये कुछ खर्चों पर गौर करें तो पायेंगे कि 8400 करोड़ का हवाई जहाज, मध्य प्रदेश के बिरसा मुंडा जयंति पर खर्च 150 करोड़, काशी गंगा पूजन एवं गंगा स्नान का खर्च 800 करोड़ किया गया।

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वहीं, प्रदेश परिवहन मंडल की बस फोड़ दी तो गुनाह बताकर बेड़ियाँ लगानेवाले को लोग सरकारी सम्पत्ति का नुकसान बताते हैं, पर वे करोड़ों रुपये के इश्तिहारों पर चुप्पी साधे हैं।

इस देश का नागरिक 5 रुपये का बिस्कुट पैकेट भी खरीदता है तो टैक्स देता है, देश में कोई ऐसा नहीं जो टैक्स न देता हो लेकिन हमारे टैक्स के पैसे पर ये मंत्रिगण ऐसे मजा मार रहे हैं, जैसे वो किसी दूसरे देश से आया हो। ऐसे में जब नागरिकों का पैसा नागरिकों पर ही खर्च करते हैं तो उपकार की भावना क्यों दिखाते हैं? जनता पर यह उनका उपकार कैसे हो जाता है भला! यह तो आपका कर्त्तव्य है। कर्तव्यों को दिखाया, जाहिर किया या कहें कि उसकी शोहरत नहीं की जाती।

  • आपको बता दें कि मोदी सरकार ने अखबार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, होर्डिंग इत्यादि के माध्यम से खुद के प्रचार के लिए पिछले वर्ष में 713.20 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
  • कार्यकर्ता जतिन देसाई द्वारा दायर एक सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विभाग ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा 2019-20 के दौरान विज्ञापनों पर औसतन प्रति दिन 1.95 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.
  • ब्यूरो ने बताया कि इसमें से 295.05 करोड़ रुपये प्रिंट, 317.05 करोड़ रुपये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और 101.10 करोड़ रुपये आउटडोर विज्ञापन में खर्च किए गए हैं.
  • हालांकि विभाग ये बताने में असमर्थ रहा कि सरकार ने विदेशी मीडिया में विज्ञापन देने में कितने रुपये खर्च किए हैं.
  • जून, 2019 में मंबई स्थित आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली द्वारा दायर आवेदन के जवाब में मंत्रालय ने बताया था कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, आउटडोर मीडिया में विज्ञापन देने में 3,767.26 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.
  • इससे एक साल पहले गलगली के एक अन्य आरटीआई आवेदन पर मंत्रालय ने मई, 2018 में बताया था कि मोदी सरकार ने जून 2014 से लेकर सरकारी विज्ञापनों पर 4,343.26 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
  • द वायर ने दिसंबर 2018 में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह यूपीए के मुकाबले मोदी सरकार में विज्ञापन पर दोगुनी राशि खर्च की गई है.
  • लोकसभा में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने बताया था कि केंद्र सरकार ने साल 2014 से लेकर सात दिसंबर 2018 तक सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में कुल 5245.73 करोड़ रुपये की राशि खर्च की है.
  • यह यूपीए सरकार के दस साल में खर्च हुए कुल 5,040 करोड़ रुपये की राशि से भी ज्यादा थी.

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