यूपी में आखिर कब निकलेगी ‘हाथी’ की सवारी?

यूपी की सत्ता हासिल करने के लिये एक ओर सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार विजय रथ यात्रा निकाल रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी एक के बाद एक रैलियां किये जा रही हैं. ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ आगामी विधासभा चुनावों के लिये वो महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट देने और इंटर पास होने वाली लड़कियों को स्मार्टफ़ोन और स्कूटी देने का ऐलान भी कर चुकी हैं। यानि युवाओं और महिलाओं को साधने में उनका विशेष ज़ोर नजर आ रहा है।

उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव की हलचल के बीच सबसे चर्चित सवाल यह हो गया है कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती मैदान में क्यों नहीं दिख रही हैं। संभवतः इसी निराशा में बसपा के कई बड़े नेता चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। फिर भी मायावती भरोसा जता रही हैं कि उनका मतदाता उनका साथ नहीं छोड़ेगा।

मीडिया स्वराज डेस्क

उत्तर प्रदेश चुनाव से मायावती गायब क्यों?

उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव कुछ ही महीने में होने वाले हैं। चुनाव में जीत हासिल करने के उद्देश्य से सभी पार्टियां अपना पूरा दम खम लगा रही हैं। इस रेस में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी सबसे आगे हैं। हालांकि, कांग्रेस की ओर से पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी भी खूब जोर आजमाइश कर रही हैं। हां, इस रेस में अगर कोई नजर नहीं आ रहा तो वह है, हाथी की सवारी करने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी और उनकी मुखिया मायावती

कांग्रेस की ओर से पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी भी खूब जोर आजमाइश कर रही हैं। हां, इस रेस में अगर कोई नजर नहीं आ रहा तो वह है, हाथी की सवारी करने वाली बहुजन समाजवादी पार्टी और उनकी मुखिया मायावती

यूपी की सत्ता हासिल करने के लिये एक ओर सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार विजय रथ यात्रा निकाल रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी एक के बाद एक रैलियां किये जा रही हैं. ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ आगामी विधासभा चुनावों के लिये वो महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट देने और इंटर पास होने वाली लड़कियों को स्मार्टफ़ोन और स्कूटी देने का ऐलान भी कर चुकी हैं। यानि युवाओं और महिलाओं को साधने में उनका विशेष ज़ोर नजर आ रहा है।

वहीं, सत्ता हाथ से चली न जाय, इसलिये जीत के लिये सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी भी कम मेहनत नहीं कर रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दो महीनों में छह बार पूर्वांचल का दौरा कर चुके हैं। गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर कई बड़े नेता और मंत्री लगातार इसके लिये जनता से सीधे मिल रहे हैं और बड़ी बड़ी रैलियां, लोकार्पण और शिलान्यास कार्यक्रमों में हिस्सा भी ले रहे हैं।

यूपी चुनाव में नजर नहीं आ रहीं मायावती
इन सबके बीच एक सवाल सबके मन में उठ रहा है कि आखिर यूपी की सत्ता पर चार बार काबिज हो चुकीं मायावती इस बार चुनावी रेस में नजर क्यों नहीं आ रहीं? उनका चेहरा यूपी के चुनावी मैदान से नदारद क्यों है? आखिर कहां हैं मायावती?

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल सबके मन में उठ रहा है कि आखिर यूपी की सत्ता पर चार बार काबिज हो चुकीं मायावती इस बार चुनावी रेस में नजर क्यों नहीं आ रहीं? उनका चेहरा यूपी के चुनावी मैदान से नदारद क्यों है? आखिर कहां हैं मायावती?

कहां हैं मायावती?

उत्तरप्रदेश की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले जानकार मायावती की अगामी चुनाव में राजनीतिक निष्क्रियता को उन पर चल रहे आय से अधिक संपत्ति मामले से जोड़कर देखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी मानते हैं कि ये हैरान करने वाली बात है कि मायावती कहीं दिख क्यों नहीं रही हैं। उनके अनुसार, “संभवत: ये कहा जा रहा है कि उनपर और उनके परिवार के सदस्यों पर आय से अधिक संपत्ति के मामलों के कारण वे दबाव में हैं। नतीजन, उन्होंने बयान दिया था कि विधानसभा या राज्यसभा के चुनाव में मुझे अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं बीजेपी की मदद कर दूंगी।”

बता दें कि साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में मायावती ने 19 सीटें जीतकर तीसरा स्थान हासिल किया था। ऐसे में उनके चुनावी मैदान से ग़ायब होने को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं और राजनीतिक विश्लेषक भी हैरानी जता रहे हैं कि चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रहीं मायावती आख़िर इस बार चुनाव में सक्रिय क्यों नहीं दिख रही हैं? वो भी ऐसे समय में, जब उनके कई विधायक छिटक चुके हैं और उनके पास इक्के-दुक्के विधायक ही रह गए हैं।

राम मंदिर आंदोलन से ही बीजेपी और संघ की ये रणनीति रही है कि वो दलित वोटरों को अपने खेमे में लाए और ऐसा हुआ भी है। ऐसे में अगर मायावती इस दबाव से निष्क्रिय होती हैं तो इससे उन्हें मदद ही मिलेगी। उन पर सीबीआई और ईडी की जो तलवार लटकी है उसी के डर से उन्होंने चुनाव से दूरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है।

जातिगत वोटबैंक

पूर्व बीबीसी संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन से ही बीजेपी और संघ की ये रणनीति रही है कि वो दलित वोटरों को अपने खेमे में लाए और ऐसा हुआ भी है। ऐसे में अगर मायावती इस दबाव से निष्क्रिय होती हैं तो इससे उन्हें मदद ही मिलेगी। उन पर सीबीआई और ईडी की जो तलवार लटकी है उसी के डर से उन्होंने चुनाव से दूरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है।

मायावती का जातिगत आधार वाला निश्चित वोटबैंक है, जो उन्हें मिलता ही है, लेकिन वे इस लड़ाई में अब कहीं दिखाई नहीं देतीं और शायद यही वजह है कि उनकी पार्टी से ज्यादातर नेता आज दूसरी पार्टियों की ओर भाग रहे हैं।

नेताओं ने छोड़ा मायावती का साथ

माना जाता है कि इंद्रजीत सरोज, लालजी वर्मा और सुखदेव राजभर के बहुजन समाज पार्टी छोड़ने की मुख्य वजह मायावती की राजनीतिक निष्क्रियता ही रही।

सुखदेव राजभर बसपा के विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके थे। उनका हाल ही में निधन हुआ है। सुखदेव भी अपने बेटे को अखिलेश यादव की पार्टी से जोड़ गए थे, वहीं हाल ही में हरिशंकर तिवारी भी अपने बेटों और भांजे को सपा की साइकिल पर सवार कर चुके हैं। ऐसे में पूर्वांचल की राजनीति में ओबीसी और ब्राह्मण इन दो बड़े चेहरों का निकलना भी मायावती के लिए एक बड़े झटके के तौर पर ही माना जा रहा है।

माना जाता है कि इंद्रजीत सरोज, लालजी वर्मा और सुखदेव राजभर के बहुजन समाज पार्टी छोड़ने की मुख्य वजह मायावती की राजनीतिक निष्क्रियता ही रही।

वहीं, ब्राह्मणों से जोड़ने के लिए मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र को ज़िम्मेदारी दी हुई है। इस बीच उनकी पत्नी कल्पना मिश्र का भी ब्राह्मण समाज की महिलाओं को संबोधित करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर डाला गया था।

पार्टी में यंग ब्रिगेड माने जाने वाले आकाश आनंद और कपिल मिश्र पार्टी को युवाओं से जोड़ने का काम कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर रणनीति बना रहे हैं। हालांकि, राजनीति विश्लेषक मानते हैं कि हर पार्टी के पास आईटी सेल और सोशल मीडिया है और अगर तुलना की जाए तो बीजेपी और सपा की टीम इस मामले में बसपा से बेहतर और आगे हैं।

पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं पर मायावती ने क्या कहा

हालांकि, बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंगलवार को लखनऊ में जारी बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश में जिन लोगों को बसपा बाहर का रास्ता दिखा रही है, उन्हें दूसरे दल शामिल कर रहे हैं।

वे यह नहीं जानते कि ऐसे लोगों की छवि आयाराम और गयाराम की होती है। इससे उस पार्टी का कोई भला होने वाला नहीं है। हां, इतना अवश्य है कि उनकी ज्वाइनिंग को इस तरह परोसा जाता है, जैसे कितना बड़ा काम हो गया हो। मायावती ने कहा कि जनता सब देख रही है।

मायावती ने कहा कि वे यह नहीं जानते कि ऐसे लोगों की छवि आयाराम और गयाराम की होती है। इससे उस पार्टी का कोई भला होने वाला नहीं है। हां, इतना अवश्य है कि उनकी ज्वाइनिंग को इस तरह परोसा जाता है, जैसे कितना बड़ा काम हो गया हो। मायावती ने कहा कि जनता सब देख रही है।

बसपा द्वारा निष्कासित किए गए कुछ नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने से उन पार्टियों का भला होने वाला नहीं है। साथ ही राज्य और केंद्र सरकार अब चुनाव से ऐन पहले ताबड़तोड़ ढंग से योजनाओं का शिलान्यास और अधकच्चे कामों का उद्घाटन कर जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ बसपा का गठबंधन बहुत बेहतर साबित होगा और वहां इस गठबंधन की सरकार बनेगी। उन्होंने शिरोमणि अकाली दल के स्थापना दिवस पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि पंजाब से मेरा गहरा नाता है। कांशीराम की जन्म स्थली पंजाब होने के नाते वहां की जनता हमेशा बसपा के साथ जुड़ी रही।

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यूपी को करीब से जानने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि मायावती की कार्यशैली देखें तो वे हमेशा से चुनाव से ठीक पहले ही रैलियां करना शुरू करती हैं। हालांकि, पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो वो इस बार थोड़ी सुस्त जरूर नज़र आ रही हैं।

वैसे भी, मायावती हमेशा से ही अपने अलग स्टाइल के लिये जानी जाती रही हैं। वे काडर को लामबंद करती हैं। बूथ लेवल पर तैयारी करवाती हैं और ये देखती हैं कि वो किन विधानसभा सीटों पर फोकस कर रहे हैं।

जहां तक भ्रष्टाचार के मुद्दे को इस विधानसभा चुनाव में मायावती के धीमे पड़ने का कारण बताया जा रहा है, तो बता दें कि मायावती के लिये भले ही ये बड़ा मुद्दा हो सकता है, लेकिन यह जनता का मुद्दा नहीं है। यूपी के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा चल रही है कि बीजेपी एक हैंडल की तरह भ्रष्टाचार के मुद्दे को मायावती के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रही है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नेताओं के ख़िलाफ़ तो ऐसी चर्चाएं चलती ही रहती हैं, लेकिन चुनाव के समय नेता फिर भी मैदान में आते ही हैं।

मायावती का गिरा है ग्राफ़

मायावती मुख्य लड़ाई में कहीं दिखाई नहीं देतीं। वे केवल अपने कुछ लोगों को भेजकर ब्राह्मण सम्मेलन करा देती हैं, प्रेस नोट जारी करवाती हैं या ट्वीट कर देती हैं, ऐसे में उनका जो वोटर उनके साथ जुड़ता था, वो इस सीमित कोशिश से कैसे जुड़ेगा?

मायावती साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रही थीं। वो जब सत्ता में आती हैं तो उनका ग्राफ बढ़ता है और हटती हैं तो गिर जाता है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2007 के बाद से साल 2012 और 2017 में उनका जनाधार गिरा है।

हालांकि साल 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए उन्होंने ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश की और दलित-ब्राह्मण एकता के नाम पर सम्मेलन भी करवाए। इसका असर दिखाई दिया लेकिन विश्लेषक ये भी मानते हैं कि उस दौरान मुलायम सिंह यादव के विरोध में भी बयार बह रही थी। उस दौरान क़ानून-व्यवस्था की स्थिति भी ठीक नहीं थी, जिसका फायदा मायावती को मिला था।

आरक्षित सीटों पर दलित वोट बंट जाते हैं क्योंकि हर पार्टी का उम्मीवार ही दलित या पिछड़ी जाति से होता है। ऐसी सीटें वही पार्टी जीतती हैं, जिसके साथ बाकी समुदाय भी जुड़े हुए हों और फिलहाल इस कोशिश में मायावती सफल होती नहीं दिख रही हैं।

बता दें कि यूपी में तकरीबन 22 फ़ीसदी दलित आबादी है और मायावती इस बार आरक्षित सीटों पर अपनी रणनीति केंद्रित करती दिख रही हैं। हालांकि, इस पर रामदत्त त्रिपाठी तर्क देते हुए आरक्षित सीटों का गणित समझाते हैं।

वो कहते हैं, “आरक्षित सीटों पर दलित वोट बंट जाते हैं क्योंकि हर पार्टी का उम्मीवार ही दलित या पिछड़ी जाति से होता है। ऐसी सीटें वही पार्टी जीतती हैं, जिसके साथ बाकी समुदाय भी जुड़े हुए हों और फिलहाल इस कोशिश में मायावती सफल होती नहीं दिख रही हैं।”

बीजेपी मजबूत स्थिति में दिख रही है

बेशक बीजेपी के सामने इस बार एंटी-इनकमबेंसी और अन्य मुद्दे, जैसे- मुख्यमंत्री से नाराज़गी, कृषि क़ानूनों या गन्ना किसानों को उचित दाम न मिलना आदि उनके विरोध में काम कर सकते हैं, लेकिन वो बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्रों में काम कर रही हैं। उनका संगठनात्मक ढ़ांचा बड़ा है।

जो मज़बूत है, वो इतनी मेहनत कर रहा है तो जिनकी कम सीटें हैं, उन्हें और ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है। वहीं, अखिलेश ने भी देर से शुरुआत की है लेकिन उनकी रैली में भीड़ और उत्साह दिखता है। प्रियंका गांधी भी मैदान में मायावती से ज़्यादा ही दिख रही हैं।

ऐसे में ये चुनाव सभी पार्टियों के लिए काफ़ी मुश्किल है। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि मायावती जल्दी अपनी मुहिम शुरू करेंगी लेकिन इसके विपरित ये देखा जा रहा है कि वे पंजाब की राजनीति पर फोकस कर रही हैं। विश्लेषक ये भी मानते हैं कि मायावती कहीं न कहीं AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की तरह भूमिका निभा कर बीजेपी को फायदा और सपा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, उनकी आगे की रणनीति चुनाव के नतीजों के बाद ही पता चल पाएगी।

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