सोमा चटर्जी की मंडल आर्ट पेंटिंग

सोमा चटर्जी
चित्रकार सोमा चटर्जी

पटना की चित्रकार सोमा चटर्जी पेंटिंग कला की विभिन्न विधाओं में हाथ आजमाती रहती हैं।

पेशे से शिक्षिका पटना के एक नामचीन पब्लिक स्कूल में प्रधानाचार्य हैं।

उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया है।

हैरत की बात है कि चित्रकार सोमा चटर्जी ने पेंटिंग की विधिवत कोई शिक्षा नहीं ली है।

सोमा बताती हैं कि बचपन से ही उनकी दिलचस्पी पेंटिंग विधा की ओर थी।

12वीं कक्षा पास करने के बाद वह बीएचयू से बीएफए करना चाहती थीं।

लेकिन उस वक्त उनके घरवाले इसके लिए राजी नहीं हुए।

घरवालों के लिए पेंटिंग समय गँवाने का जरिया था।

आखिरकार अखिल भारतीय परीक्षा में चयनित होकर सोमा ने बीएचयू में अर्थशास्त्र में दाखिला लिया।

सोमा चटर्जी ने इतने से हार नहीं मानी।

वे स्वत: पेंटिंग विधा की बारीकियों को देखकर, सुनकर और पूछकर सीखती रहीं।

कर्मक्षेत्र में आने के बाद घर-परिवार और स्कूल की व्यस्तताओं में पेंटिंग के लिए उन्हें वक्त नहीं मिलता था।

लेकिन कोरोना काल में आये तनाव को दूर करने के लिए एक बार फिर उन्होंने पेंटिंग का सहारा लिया।

इसके परिणामस्वरूप दर्शकों के सामने सोमा चटर्जी के बनाये एक से एक चित्र सामने आ रहे हैं।

प्रस्तुत पेंटिंग सोमा ने मंडल आर्ट विधा के तहत बनायी है।

मंडल आर्ट फॉर्म

मंडल आर्ट फॉर्म प्रकृति के रहस्यों से जोड़ने वाली और तनाव दूर करने वाली विधा है।

यह मानव सभ्यता के सबसे पुराने आर्ट फॉर्म में शुमार है।

मंडल शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ गोल घेरा (सर्किल) है।

इस आर्ट फॉर्म में सर्किल का इस्तेमाल होता है।

मंडल मानव जाति को ज्ञात प्रकति का सबसे सरल स्वरूप है।

यद्यपि मंडल आर्ट का मूल पृथ्वी का पूर्वी हिस्सा माना जाता है लेकिन कोई भी सभ्यता गोल चिन्ह से अपरिचित नहीं रही।

विभिन्न धर्मों में भी साधना के लिए चक्रों की अवधारणा है जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी ऊर्जा को जाग्रत करता है।

पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, बारिश की बूंदें, सभी गोलाकार ही देखी जाती हैं।

मनुष्य ने इन्हीं से प्रेरणा लेकर गोलाकार आकृति से प्रकृति के विभिन्न रहस्यों को अभिव्यक्त करना शुरू किया।

इसे ही आज मंडल आर्ट फॉर्म कहा जाता है।

प्रस्तुति : संदीप त्रिपाठी

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