वीरांगना जोन ऑफ़ आर्क

स्मृति-दिवस:

मोती लाल गुप्त 

रोमन कैथोलिक चर्च में संत की उपाधि धारण करने वाली जोन ऑफ़ आर्क का जन्म सन् १४१२ में पूर्वी फ्रांस  के एक किसान परिवार में हुआ था। १२ वर्ष की आयु से इन्हें ईश्वरीय संदेश मिलने शुरु हुए कि किस तरह फ्रांस से अंग्रेजों को निकाल बाहर किया जाए। इन्हीं दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए उन्होंने फ्रांस की सेना का नेतृत्व किया और कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीतीं, जिनके चलते चार्ल्स सप्तम फ्रांस की राजगद्दी पर बैठ पाए।  जोन का कहना था कि इन्हें ईश्वर से आदेश मिले कि वे अपनी जन्मभूमि को अंग्रेजों से मुक्त कराएँ। इंग्लैंड और फ्रांस के बीच  सन् १३३७ से लेकर १४५३ तक सौ वर्षों से अधिक युद्ध चला था। इसे सौ वर्षों का युद्ध कहा जाता है।  युद्ध के  अंतिम वर्षों में इंग्लैण्ड ने फ्रांस के काफी भूभाग पर कब्जा कर लिया था। फ्रांस के  राजा चार्ल्स सप्तम का राज्याभिषेक भी अंग्रेज नहीं करने दे रहे थे। जोन ने जब चार्ल्स को बताया कि ईश्वरीय संदेश के अनुसार ऑर्लियन्स में फ्रांस की जीत निश्चित है, तो चार्ल्स ने जोन को ऑर्लियन्स की घेराबंदी तोड़ने के लिए भेज दिया। ऑर्लियन्स पहुँच कर जोन ने हतोत्साहित सेनापतियों को उत्साह दिलाया और नौ दिन के अंदर-अंदर घेराबंदी को तोड़ डाला। अपने स्फूर्त नेतृत्व से उन्होंने कई और लड़ाइयाँ जीतीं। अंततः इनके कहे अनुसार रैम में चार्ल्स सप्तम का राज्याभिषेक हुआ।
दुर्भाग्य से कॉम्पियैन में इन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया और चुड़ैल करार देते हुए ३० मई १४३१ को जिंदा जला दिया। उस समय ये केवल १९ साल की थीं। २४ साल बाद चार्ल्स सप्तम के अनुरोध पर पोप कॅलिक्स्टस१४३१ तृतीय ने इन्हें निर्दोष ठहराया और शहीद की उपाधि से सम्मानित किया।१९२० में इन्हें संत की उपाधि प्रदान की गई। पाश्चात्य संस्कृति में जोन ऑफ़ आर्क की बहुत महत्ता है। नेपोलियन से लेकर आधुनिक नेताओं तक, सब फ्रांसीसी राजनेता जोन का अति श्रद्धा से स्मरण करते आए हैं। बहुत से लेखकों ने इनके जीवन से प्रेरित हो साहित्य रचा है, जिनमें शामिल हैं- विलियम शेक्सपियर, वोल्टेयर, फ्रेडरिक शिलर, जिसेप वर्दी, प्योत्र ईलिच चाइकौव्स्की, मार्क ट्वेन, बर्तोल्त ब्रैच्त और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ। इसके अलावा इनपर बहुत सी फिल्में, वृत्तचित्र, वीडियो गेम और नृत्य भी बने हैं।
नवयुवतियों की आदर्श ऐसी राष्ट्रप्रेमी वीरांगना को हार्दिक श्रद्धांजलि।

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