चीन पर भरोसा मुश्किल है

भारत और चीन की सेनाएं पीछे हटने को राजी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज राज्य सभा में बताया कि  कई दौर की बातचीत के बाद अब पूर्वी लदाख के पेंगोंग त्से झील के दोनों किनारों से भारत और चीन की सेनाएं पीछे हटने को राजी हो गयी हैं। 

अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि भारत ने सदैव LAC का सम्मान किया है, किंतु चीन ने जब पिछले साल यथास्थिति को प्रभावित करने की कोशिश की तो हमारी सेनाएं भी मुहतोड़ जवाब देने में पीछे नही हटीं। क्योंकि हमारे पास ऐसी क्षमता भी है कि चीन का सामना किया जा सके।

साथ ही रक्षा मंत्री ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि चीन ने हमारी एक भी इंच भूमि पर कब्जा नही किया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गत महीनों में पूर्वी लदाख में कई जगह चीन की ओर से अतिक्रमण का प्रयास हुआ किंतु हमारी सेना ने कठोर जवाबी तैनाती कर के उन्हें सबक सिखा दिया।

चीन ने भी कहा, हट रही हैं सेनाएं

रक्षा मंत्री की ओर से इस स्पष्टीकरण की आशा कल से ही थी जब चीन की ओर से एक आधिकारिक बयान आया था कि पेंगोंग त्से इलाके से सेनाएं पीछे हटने लगी हैं। चीन के रक्षा मंत्रालय के हवाले से कहा गया था कि दोनों सेनाओं के बीच 9वें दौर की बातचीत में सहमति बन गयी थी जिसके तहत पेंगोंग झील के इलाके से डिसेंगजमेंट की प्रक्रिया 10 फरवरी से चालू भी हो गयी है।

आसान नही है सैनिकों का पीछे हटना

किंतु डिसेंगजमेंट की प्रक्रिया बहुत जटिल है। यह कागजों पर दिखने जैसा आसान नही है। सीमा पर तैनात सैनिकों के अलावा भारी मात्रा में जुटाए गए संसाधन और आयुध भंडार वापस सुरक्षित जगहों पर ले जाना बड़ी चुनौती होती है। जब सामने दुश्मन चीन जैसा हो जिस पर भरोसा न किया जा सके, तब हालात और कठिन हो जाते हैं।

सबसे पहले इन भारी भरकम उपकरणों, तोपों और आयुध भंडारों को सुरक्षित एक स्थान पर इकट्ठा किया जाता है। इसके लिए एक अस्थायी स्टेशन बनाना होता है जो सीमा से कुछ अंदर किसी सुरक्षित स्थान पर हो। यह सुनिश्चित किया जाता है कि वापस हटने की प्रक्रिया में यदि दुश्मन ने कुछ चालबाजी दिखाई तो समय रहते हम जवाब दे सकें। 

आर्टिलरी यानी तोपखाने इत्यादि के पीछे हटने में कम से कम 3 दिन का समय लगेगा, और उसके बाद ही सैनिक सीमा से हटाये जा सकेंगे। यानी डिसेंगजमेंट कि प्रक्रिया में अभी एक लंबा समय लगने वाला है। किसी भी अनहोनी का जवाब देने के लिए महत्वपूर्ण ठिकानों से वायु सेना की वापसी का फैसला भी स्थिति को देखते हुए ही किया जाएगा।

चीन की हर हिमाकत को भारत का जवाब

पेंगोंग त्सो और फिंगर एरिया में चीन ने LAC की स्थिति बदलने की कोशिश की थी जिसके बदले में भारत ने कई सामरिक चोटियों पर सैन्य पोजीशन स्थापित कर के चीन को आश्चर्यचकित कर दिया था। मोलडो समेत चीन के कई महत्वपूर्ण ठिकाने भारत की सेना के ठीक निशाने पर आ गए थे।

इसके अलावा बढ़ते गतिरोध को देखते हुए दोनों ओर से टैंक, आर्टिलरी और एयर डिफेंस जैसे हथियारों का एक बड़ा जखीरा सीमा पर तैनात कर दिया गया था। इन सब के साथ साथ दोनों ओर के करीब 50 हज़ार जवान एक दूसरे के सामने लदाख की भयानक सर्दियों में पिछले कई महीनों से डटे हुए हैं।

चीन पर भरोसा मुश्किल है

इस पर दोनों पक्षों की तरफ से इस जमावड़े को हटाने का काम शुरू हो जाना स्वागत योग्य कदम है. बस आशा है कि इस बार चीन की तरफ से कुछ ऐसे कदम न उठाएं जाएं जिसे भारत पीठ पर छुरा भौंकने जैसा समझे। क्योंकि अतीत में चीन ने कई बार भरोसा तोड़ा है।

अनुपम तिवारी, लखनऊ 

(लेखक वायुसेना से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)

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