दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारियों के हर संकट में सार्थक किया अपना नाम

डॉ. अरविंद कुमार शुक्ल

आज महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी का पुण्य दिवस है।

वाराणसी के एक चर्चित कवि स्वर्गीय चकाचक बनारसी भाभी पर एक कविता लिखते हुए लिखते हैं कि देवर ने पाती भिजवाई, प्यारी प्यारी भाभी जी और अंत में कविता समाप्त करते हुए लिखते हैं -बहन महतारी भाभी जी!

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का जो क्रांतिकारी दल था, उसके पास भी एक भाभी थी जो बहन भी थी, और महतारी भी।

और यह बहन-महतारी एकबार सरदार भगत सिंह की प्राण रक्षा के लिए मेम साहब का रूप धारण कर लेती है।

सांडर्स हत्याकांड के बाद सबको यह चिंता सता रही थी भगत सिंह को लाहौर से कैसे निकाला जाए।

लाहौर के चप्पे-चप्पे और कोने  कोने में पुलिस और सीआईडी तैनात थी।

एक हैटधारी साहब अपनी आधुनिका मेम के साथ रेलवे स्टेशन पर आते हैं और कई एक पुलिस कांस्टेबल शक करने की बजाय उच्चाधिकारी समझ सैल्यूट कर देते हैं।

इस युगल के साथ एक सेवक भी चलता है। ये सब कलकत्ता जाने वाले ट्रेन में सवार हो जाते। इसी ट्रेन में एक पुजारी भी दूसरे डिब्बे में बैठे हुए हैं।

इस तरह से भगत सिंह, सुखदेव और आजाद लाला लाजपत राय का बदला लेने के बाद लाहौर से बाहर निकल लेते हैं और यह सब सम्भव होता है दुर्गा भाभी के क्रान्तिकारी सहयोग से।

कोलकाता पहुंच कर यह सब लोग कांग्रेस के सम्मेलन स्थल पर पहुंचते हैं जिसमें भगत सिंह हैट की जगह शाल ओढ़कर  चलते हैं।

इस सम्मेलन में दुर्गा भाभी के पति भगवती चरण वोहरा दुर्गा भाभी को देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं लेकिन भगत सिंह सुखदेव और आजाद को देखते ही उनके मुंह से निकल पड़ता है कि, “दुर्गा के पूर्ण दुर्गा स्वरूप से मैं आज परिचित हो गया।”

प्रयागराज की रहने वाली दुर्गा देवी के पिताजी का नाम बांके बिहारी नागर था और वह एक गुजराती ब्राह्मण थे।

दुर्गा देवी की शादी भगवती चरण वोहरा से होती है। यह वही भगवती चरण वोहरा हैं जिनके बारे में माना जाता है कि वे गांधी जी के लेख कल्ट आफ बम का जवाब फिलासफी आफ द बम से लिखकर देते हैं।

‍क्रांतिकारी दल में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था। आजाद स्त्रियों के दल में प्रवेश के सबसे बड़े विरोधी थे, किंतु सुशीला दीदी और दुर्गा भाभी की हिम्मत और निष्ठा के कारण यह प्रतिबंध शिथिल हो जाता है।

क्रांतिकारी आंदोलन की शक्ति से ब्रिटिश साम्राज्यशाही को दहलाने के लिए क्रांतिकारियों का दल विभिन्न प्रांतों में जाता है।

दुर्गा भाभी, विश्वनाथ वैशंपायन और सुखदेव राज को मुंबई भेजा गया। यह तिकड़ी लार्ड हेली को गोली मारने का निश्चय करती है और इस निश्चय से चंद्रशेखर आजाद को अवगत कराने के लिए वैशम्पायनजी कानपुर जाते हैं।

किंतु उनके आने में विलंब होता है। दुर्गा भाभी और सुखदेव राज की टीम एक पुलिस अधिकारी को अपने गोली का शिकार बना देती है।

कराची में कांग्रेस के अधिवेशन की तैयारी चल रही है। गांधी-इरविन वार्ता होने वाली है, यह चर्चा बड़ी तेज थी।

इसी बीच एक महिला डॉक्टर अंसारी की कोठी पर गांधी जी से मिलती है और भगत सिंह की फांसी को रोके जाने के लिए गांधी जी से अपना मत व्यक्त करती है। यह कोई और न था, यह दुर्गा भाभी ही थीं।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को छुड़ाने के लिए क्रांतिकारी दल कई योजनाएं बनाता है।

इन्हीं योजनाओं को अंजाम देने की दृष्टि से रावी के तट पर 28 मई 1930 को एक बम का परीक्षण करते हुए दुर्गा भाभी के पति भगवती चरण वोहरा एक जबरदस्त धमाके में शहीद हो जाते हैं।

भगवती चरण वोहरा के देहांत के बाद अपने अल्पायु पुत्र शचीन्द्र की देखभाल की चिंता के बीच भी दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारी दल के लिए हर संकट में दुर्गा नाम को सार्थक किया।

क्रांतिकारी दल के पास जब एक फूटी कौड़ी भी न थी तो यह निश्चय किया जाता है कि पंडित मोतीलाल नेहरू से सहायता ली जाए।

चंद्रशेखर आजाद और मोतीलाल नेहरू की इस मुलाकात का आयोजन दुर्गा भाभी के माध्यम से ही होता है।

दुर्गा भाभी के पिता, जो एक सन्यासी हो चुके थे, के संबंध राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन से अत्यंत घनिष्ठ थे। मोतीलाल नेहरू और आजाद के इस मुलाकात के माध्यम बनते हैं राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।

मोतीलाल नेहरू आर्थिक सहायता देने का वचन देते हैं और आजाद इसके बदले सत्याग्रह कार्यकर्ताओं पर अत्याचार करने वालों को सबक सिखाने का निश्चय करते हैं।

कानपुर में शराब ठेके पर धरना देने वाले सत्याग्रहियों पर जब दमन होता है तो दमन के जिम्मेदार अधिकारियों को चंद्रशेखर आजाद और क्रांतिकारियों द्वारा जूतों से पीटा जाता है और उनका मुंह नालियों में घुसेड़ दिया जाता है।

दुर्गा भाभी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की हमारी योद्धा हैं। जब भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु, भगवती चरण वोहरा जैसे महान क्रांतिकारियों की चर्चा होगी तो दुर्गा भाभी का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया जाएगा।

चंद्रशेखर आजाद की स्मृति के अपने वक्तव्य में दुर्गा भाभी कहती हैं कि क्रांतियाँ सामाजिक हों अथवा राजनीतिक, यह सुख और सौंदर्य को जन्म देती है।

क्रांतिकारी सुख और सौंदर्य की प्रसव वेदना सहता है और जो दूसरों की पीड़ा से पीड़ित है और जिस की अनुभूति जितनी ही तीव्र और गहरी है, वह उतना ही बड़ा क्रांतिकारी कहा जा सकता है।

आज दुर्गा भाभी जैसी महान क्रांतिकारी का पुण्य स्मरण करते हुए मन के अंदर श्रद्धा के बादल का उमड़ना स्वाभाविक है।

हे माँ तुझे प्रणाम!

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