बेतरतीब विकास और जलवायु परिवर्तन से संकट में हिमालय

हिमालय एक भूकंप-प्रवण क्षेत्र है, यहां तक कि कम क्रम वाला भूकंप भी इस क्षेत्र के कई हिस्सों में भीषण आपदा को जन्म दे सकता है। भारत, नेपाल और भूटान में हिमालय की 273 जलविद्युत परियोजनाओं में से लगभग एक चौथाई में भूकंप और भूस्खलन से गंभीर क्षति होने की आशंका है। सड़क चौड़ीकरण और जल विद्युत परियोजनाओं के बेलगाम विकास से हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना होगा। पर्यावरणीय नियमों का पालन न करने से बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है, जिससे लाखों लोगों की जिंदगी पलक झपकते ही ख़तम हो सकती है।पढ़िए  प्रोफ़ेसर वेंकटेश दत्ता का लेख ।

                                                                                                                                                                                                   

ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर, हिमालयी ग्लेशियर ताजे पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। हिमालयी क्षेत्र में हिमपात और हिमनद पूरे उपमहाद्वीप में विभिन्न नदियों के लिए पानी के मुख्य स्रोत हैं। ये स्रोत ब्रह्मपुत्र, सिंधु और गंगा जैसी नदी प्रणालियों में पानी के सतत प्रवाह को बनाए रखने में मदद करते हैं। एक अरब से अधिक लोगों का जीवन इन नदियों पर निर्भर है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ, हिमालय के ग्लेशियर द्रव्यमान और सतह क्षेत्र दोनों में उत्तरोत्तर कम हो रहे हैं। ग्लेशियरों के सिकुड़ने का पता उस छोटे हिमयुग के समय से भी लगाया जा सकता है, जो लगभग 700 साल पहले 14 वीं शताब्दी से शुरू हुआ था। तब से दुनिया ने वैश्विक तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि देखी। ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते स्तर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे 20 वीं शताब्दी में वृद्धि और अधिक तेज़ी से हुई। 1980 के दशक के बाद से ग्राफ हॉकी के डंडे की तरह तेजी से बढ़ा। 

1850 से 2070 तक वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्शियस की वृद्धि के परिणामस्वरूप बड़े और मध्यम हिमनदों का कुल 45 प्रतिशत गायब हो जाएगा। यह भी अनुमान है कि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्शियस की वृद्धि के साथ लगभग 70 प्रतिशत छोटे ग्लेशियर पिघल जाएंगे। घटते हिमनदों के परिणामस्वरूप, हिमालय के माध्यम से कई हिमनद झीलों का निर्माण हो रहा है। ये ऊंचाई वाली हिमनद झीलें हर वक़्त एक संभावित जोखिम बनाये रखती हैं, क्योंकि झील के फटने की स्थिति में अचानक बाढ़ आने की आशंका बहुत ही तेज होती है। जलवायु परिवर्तन आकलन रिपोर्ट के अनुसार, तापमान वृद्धि से 21 वीं सदी के अंत तक 2071 से 2100 के बीच भारत में बाढ़ की घटनाओं की आवृत्ति में तेजी से वृद्धि होगी। हिमालयी बेल्ट में 2.6 डिग्री सेल्शियस तक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान है और 2030 तक गर्मी की तीव्रता में 2 से 12 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। इसके परिणामस्वरूप अचानक बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होगी, जिससे व्यापक भूस्खलन होगा। इससे कृषि क्षेत्र को अत्यधिक नुकसान होगा और देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।

हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसकी गति 1990 के दशक के बाद से सर्वाधिक है। जनवरी 2020 में, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने अनुमान लगाया कि हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र में 3,000 से अधिक ग्लेशियल झीलों का निर्माण हुआ है, जिसमें 33 के साथ एक आसन्न खतरा बना हुआ है, जो सत्तर लाख लोगों को प्रभावित कर सकता है। उत्तराखंड में 10 वर्ग किलोमीटर से अधिक के 1,474 ग्लेशियर हैं, जो 2,148 वर्ग किलोमीटर के हिमाच्छादित क्षेत्र को कवर करते हैं।

इन ग्लेशियरों का द्रव्यमान तेजी से घट रहा है। उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि ऊपरी ऋषि गंगा जलग्रहण के आठ ग्लेशियर- उत्तरी नंदादेवी, चांगबंग, रमनी बैंक, बेथरटोली, त्रिशूल, दक्षिणी नंदा देवी, दक्षिणी ऋषि बैंक और रौंथी बैंक – बड़े पैमाने पर पिघल रहे हैं और पिछले तीन दशकों से भी कम समय में ही करीब 15 प्रतिशत कम हो गए हैं। पिछले चार दशकों में उत्तराखंड के तापमान में लगातार वृद्धि हुई है। फ्लैश फ्लड की तीव्रता भी बढ़ी है। ग्लोबल वार्मिंग से छोटे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे कई स्थानों पर हैंगिंग ग्लेशियर बन रहे हैं। बढ़ते तापमान से इन सभी में दरारें विकसित हुई हैं। यह बताया गया है कि भूस्खलन के महीनों पहले, रोंटी चोटी के नीचे एक बड़ी दरार विकसित हो गई थी। पिछले साल फरवरी महीने में उत्तराखंड के चमोली जिले की पहाड़ियों में तापमान शून्य से नीचे जाने के बावजूद भी ग्लेशियर क्यों टूट गए? यह एक विसंगति है।

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सर्दियों में, ग्लेशियर मजबूती से जमे रहते हैं। यहां तक कि ग्लेशियर झीलों की दीवारें भी कसकर बंधी हुई रहती हैं। इस मौसम में इस तरह की बाढ़ आमतौर पर हिमस्खलन या भूस्खलन के कारण होती है। भविष्य में इसी तरह की आपदाएँ अधिक बार आ सकती हैं। पूरे हिमालय के लगभग 1500 ग्लेशियरों में से केवल 35 की ही ठीक से निगरानी की जा रही है। पिछले कुछ दशकों में हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हजारों ग्लेशियर झीलें बनी हैं, जो अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ने में सक्षम हैं। ये फटने पर गंभीर नुकसान पहुंचाएंगी। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (IPCC) ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण वर्षा और बर्फबारी अधिक असमान हो गयी है- ख़ासकर दक्षिण एशियाई देशों के लिए, जो अब लगातार अधिक और घातक गर्मी की लहरों का सामना कर रहे हैं।

2020 में उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमनदों का फटना पारिस्थितिक प्रक्रियाओं में असंतुलन का एक बड़ा उदाहरण है। वे ज्यादातर मानवीय गतिविधियों के कारण होते हैं। हिमालय पर्वत श्रृंखला एक युवा और अस्थिर श्रृंखला है। चट्टानों के समायोजन में थोड़ा सा भी परिवर्तन विनाशकारी भूस्खलन को गति प्रदान कर सकता है। इन कारकों के बावजूद, संवेदनशील हिमालयी बेल्ट में बार-बार विस्फोट, पत्थर उत्खनन, होटलों और सड़कों का निर्माण, सुरंगों की खुदाई और बांधों का निर्माण जारी है।

पिछले साल उत्तराखंड के जोशीमठ के पास भारत-चीन सीमा से सटे नीती घाटी के सुमना में एक ग्लेशियर के फटने से भारत-तिब्बत सीमा पुलिस अलर्ट पर आ गई थी। हिमस्खलन की चपेट में आकर ग्लेशियर टूटने के बाद सेना ने उत्तराखंड में बचाव अभियान का दृश्य जारी किया था। विजुअल्स में, एक आर्मी हेलीकॉप्टर बर्फीले पहाड़ों से घिरे एक हेलीपैड पर उतरता हुआ दिखाई देता है। सैनिकों के एक समूह द्वारा एक आदमी को बर्फ के नीचे से बाहर निकाला जाता है, जिसके बाद वे उसे सुरक्षा के लिए ले जाते हैं। कुल मिलाकर, आठ शव बरामद किए गए और कुल 384 लोगों को सेना ने बचाया। बचाए गए लोगों में से छह की हालत गंभीर हो गई थी।

हिमालय क्षेत्र में विनाशकारी परियोजनाएँ

इससे पहले, पिछले साल सात फरवरी की सुबह उसी क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर के फटने से जनहानि और तबाही हुई थी, जिससे चमोली में भयंकर बाढ़ आई और भारी तबाही हुई। इस आपदा में कम से कम 71 लोगों की मौत हो गई और 130 या उससे अधिक लोगों का आज तक पता नहीं चल पाया है। नदी के पास के ग्रामीण भी बह गये थे और आपदा-स्थल पर जल-विद्युत परियोजनाओं में कई श्रमिक सुरंगों में फंस गए थे। इस भीषण आपदा ने 2013 में केदारनाथ त्रासदी की याद दिला दी। नंदादेवी कैचमेंट में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा उत्तराखंड के चमोली जिले में रेनी गांव के पास, गंगा नदी की सहायक नदियों में से एक, धौलीगंगा नदी में गिर गया। धौलीगंगा नदी विष्णुप्रयाग तक बहती है, जहाँ धौलीगंगा और अलकनंदा नदियाँ मिलती हैं। सहायक नदियों में जल स्तर भी काफी बढ़ गया था। नदी का प्रवाह इतना अधिक था कि उसने जोशीमठ के पास 13.2 मेगा वाट की ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना को बहा दिया और 520 मेगा वाट की तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना को भी काफी नुकसान पहुँचा। उपग्रहों द्वारा प्राप्त हालिया, उच्च रिज़ॉल्यूशन की तस्वीरों से संकेत मिलते हैं कि इस  क्षेत्र में चट्टान और बर्फ की आवाजाही तथा हिमस्खलन की अनुवर्ती गतिविधियां जारी हैं।

इस तरह की आपदाएं ग्लेशियर झील के फटने के कारण होती हैं । इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड या ग्लोफ कहा जाता है। सामान्य झीलों के विपरीत, ग्लेशियर झीलें ढीली चट्टानों और मलबे से बनी होती हैं। वे अत्यधिक अस्थिर होती हैं क्योंकि वे अक्सर बर्फ या हिमनदों से घिरी होती हैं। विशाल हिमनद झीलों में पानी का जमाव होता रहता है और बड़े पैमाने पर पिघलता हुआ पानी आकस्मिक सीमाओं के माध्यम से निचले हिस्सों में भयावह बाढ़ ला सकता है। ऐसी बाढ़ पिछली शताब्दी में हजारों मौतों के साथ-साथ गाँवों, बुनियादी ढांचों और पशुधन के विनाश के लिए भी जिम्मेदार रही है।

चमोली आपदा स्पष्ट रूप से हिमालय पर जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास के प्रतिकूल प्रभाव का संकेत है। दो बातें स्पष्ट हैं: जलवायु परिवर्तन ने विनाशकारी भूमिका निभाई है और अब हमें हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पनबिजली परियोजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। दो जलविद्युत परियोजनाओं के नुकसान को देखते हुए, हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी में पनबिजली परियोजनाओं को सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन और जल प्रवाह परिवर्तनशीलता के जोखिम को कम करना भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसके लिए भविष्य के जलवायु अनुमानों की बेहतर समझ जरूरी है। इस समझ के सापेक्ष हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र में भविष्य की जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और स्थान पर विचार करना अत्यंत ही आवश्यक  है।

ग्रामीणों ने ऋषिगंगा बिजली परियोजना को एक आसन्न आपदा के रूप में चिह्नित किया था और उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कई निजी फर्में पर्यावरणीय मानदंडों का उल्लंघन कर विस्फोटकों का उपयोग कर रही हैं और खनन के लिए पहाड़ों को नष्ट कर रही हैं। अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी नदी पर कोई बड़े बांध नहीं बनाये जाने चाहिए थे, क्योंकि इस क्षेत्र में बहुत खड़ी ढलानें हैं और यह एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र है। हालांकि अभी भी बड़े पैमाने पर निर्माण जारी है, जिसके कारण भविष्य में बड़ी आपदाएं आ सकती हैं। यह एक मानव निर्मित आपदा थी। विडंबना यह है कि रैनी गांव, जहां आपदा आयी, चिपको आंदोलन का उद्गम स्थल है, जिसे 1970 के दशक में उत्तराखंड में ग्रामीणों ने पेड़ों को बचाने के लिए शुरू किया था।

जोशीमठ और आसपास के अन्य शहर हजारों होटलों और विंटर रिज़ॉर्ट्स के साथ लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गए हैं। क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को दरकिनार करते हुए लगातार ब्लास्टिंग द्वारा कंक्रीट हाइड्रोपावर, बांध, सुरंगें और राजमार्ग बनाए जा रहे  हैं। उत्तराखंड में 80 से अधिक छोटे और बड़े जलविद्युत संयंत्र हैं। उत्तराखंड ने पिछले 20 वर्षों में 50,000 हेक्टेयर से अधिक जंगल खो दिया है। चमोली सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है, जहां खनन, सड़क निर्माण और बिजली-वितरण की लाइनों से लगभग 4000 हेक्टेयर जंगल नष्ट हो गए हैं। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और भूस्खलन के कारण भूमि का उपयोग बदल गया है।

पिछले कुछ दशकों में हिमनदों के तेजी से पिघलने के कारण हिमनदों की झीलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2005 में अकेले उत्तराखंड में लगभग 127 ऐसी हिमनद झीलों को सूचीबद्ध किया गया था। हाल ही में, इनकी संख्या में वृद्धि हुई है और राज्य में अब लगभग 400 हिमनद झीलें हैं। हिमनदों की झीलों की बढ़ती संख्या काफी खतरनाक है और एक गंभीर चुनौती पेश करती है।

इन झीलों से उत्पन्न संभावित जोखिमों के समुचित प्रबंधन के लिए, सबसे पहले हिमनद झीलों के निर्माण का नियमित और सक्रिय रूप से अध्ययन किया जाना चाहिए। लोगों और मापने वाले उपकरणों द्वारा ऑन-फील्ड निगरानी की भी महती आवश्यकता है। किसी भी प्रकार के निर्णय लेने के लिए, एक मजबूत डेटासेट जो निरंतर परिवर्तनों की निगरानी करता है, महत्वपूर्ण है। कुछ ग्लेशियर्स की ट्रैकिंग और छानबीन पहले से ही हो रही है लेकिन अभी के प्रयास बिखरे हुए हैं। जरूरत इस बात की है कि भारत में हिमनदों का एक समेकित मूल्यांकन किया जाए, जिसमें उन्हें ज़ूम-इन करने और हर साल होने वाले रूपांतरणों की निगरानी करने की प्रवृत्ति हो।  संबंधित राज्य सरकारों को ट्रैकिंग या डेटा के लिए बाहरी एजेंसियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और इस कार्य में स्वयं हिमालयी राज्यों को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। हो सकता है कि निर्माण संबंधी गतिविधियों का अचानक आने वाली बाढ़ की वृद्धि से सीधा संबंध न भी हो, लेकिन इन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

यदि ग्लेशियरों को नियमित जांच के दायरे में रखा जाता है, तो इससे उन झीलों को पहचानने की संभावना बढ़ जाएगी, जिन्हें तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है। कई भू-तकनीकी और संरचनात्मक उपायों को लागू किया जा सकता है. ऐसे  कई उदाहरण हैं, जहां हिमनद झीलों का संभावित जोखिम कम हो गया है। ऐसी झीलों से पानी के धीरे-धीरे निर्वहन के लिए चैनलों का निर्माण किया जाता है, जो उन पर तनाव को कम करते हैं और टूटने की संभावना को सीमित करते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि यह प्रक्रिया अचानक बाढ़ में बहने वाले पानी की मात्रा को भी कम कर देती है। अलार्म सिस्टम सेट करना भी मददगार साबित हो सकता है। हिमनद झीलों पर अलार्म सिस्टम स्थापित किए जा सकते हैं, जो अतिप्रवाह होते ही मानव बस्तियों को तुरंत नीचे की ओर सचेत कर देंगे। सूनामी और चक्रवातों के लिए किए गए अभ्यासों के समान, एक प्रारंभिक प्रतिशोध ड्रिल पर भी काम करने की आवश्यकता है।

किसी भी महत्वपूर्ण परियोजना को शुरू करने से पहले हर पर्यावरणीय आकलन में ग्लेशियरों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, बांध के निर्माण से पहले, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट में उस क्षेत्र के ग्लेशियरों के लिए बांध के अनुमानित खतरे को शामिल करना चाहिए। आकलन रिपोर्ट में पूरे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए। आम जन और परियोजना धारकों को इस तरह के आकलन में निवेश करना चाहिए, क्योंकि यह उनका अपना पैसा है, जो जोखिम में है। यदि एहतियाती उपायों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है और बेतरतीब विकास के मॉडल को चुनौती नहीं दी जाती हैं, तो वह समय दूर नहीं है, जब हमारा जीवन उन हॉलीवुड फिल्मों के दृश्यों को प्रतिबिंबित करेगा, जो पृथ्वी के अंत को दर्शाती हैं।

हमारी प्रयोगशालाओं में अध्ययन किए जाते हैं, कई रिपोर्टस तैयार की जाती हैं, लेकिन जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। उत्तराखंड ने अभी हाल ही में एक बाढ़ ज़ोनिंग मैप तैयार किया है, बाढ़ के मैदानों को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाया है, ‘आपदा जोखिम मूल्यांकन’ और ‘राज्य आपदा प्रबंधन योजना’ का मसौदा तैयार है; जोशीमठ और बद्रीनाथ के लिए ‘डिस्ट्रिक्ट डिजास्टर मैनेजमेंट एक्शन प्लान’ बनाया गया है, चमोली के लिए ‘रिस्क रिडक्शन स्ट्रेटेजिक प्लान’ और राज्य में रिस्क-रिडक्शन गतिविधियों तथा योजनाओं के लिए नक्शों और दस्तावेजों का एक ‘उत्तराखंड रिस्क डेटाबेस’ तैयार किया गया है। अब जरूरत है इन सभी योजनाओं को जमीन पर उतारने की।

हमें विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा, विशेष रूप से भौगोलिक रूप से नाजुक और संवेदनशील हिमालय की जलविद्युत क्षमता के दोहन के संबंध में। हिमालय एक भूकंप-प्रवण क्षेत्र है। यहां तक कि कम क्रम वाला भूकंप भी इस क्षेत्र के कई हिस्सों में भीषण आपदा को जन्म दे सकता है। भारत, नेपाल और भूटान में हिमालय की 273 जलविद्युत परियोजनाओं में से लगभग एक चौथाई में भूकंप और भूस्खलन से गंभीर क्षति होने की आशंका है। सड़क चौड़ीकरण और जल विद्युत परियोजनाओं के बेलगाम विकास से हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना होगा। पर्यावरणीय नियमों का पालन न करने से बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है, जिससे लाखों लोगों की जिंदगी पलक झपकते ही ख़तम हो सकती है।

प्रोफ़ेसर वेंकटेश दत्त

लेखक प्रोफ़ेसर वेंकटेश दत्त डा अम्बेडकर विश्व विद्यालय लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर हैं।

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