हिमालय बचाओ!

हिमालय दिवस पर विशेष लेख

हिमालय बचाओ दिवस पर हमारा कर्तव्य बनता है यह जानना कि वास्तव में हिमालय को किससे ख़तरा है. आज हिमालय बचाओ दिवस परस्वर्गीय डा0 शमशेर सिंह बिष्ट का यह पुराना लेख हमें याद दिलाता है कि वास्तव में हिमालय की असली वेदना क्या है.


आज हिमाल तुमुकै घत्यूछ, जागो-जागो हो मेरा लाल,

वैसे तो यह रचना 28 नवम्बर 77 को नैनीताल में वन आंदोलन के दौरान पहली बार गाई गयी थी, लेकिन ‘वृक्षनाक’ विषय शीर्षक से सन् 1926 में लिखी गई गिर्दा की यह रचना मूलतः वृक्ष का आत्म निवेदन मनुष्य से है। लेकिन वन आंदोलन नशा नहीं रोजगार दो व अन्य वन आंदोलनों में सड़कों में गिर्दा द्वारा संशोधित किए जाने पर यह हिमालय समाज का आत्मनिवेदन बन गया।

सन! 1994 में जब राज्य आंदोलल चरम सीमा में था, तो आंदोलन की वास्तविक जानकारी प्राप्त करने के लिए नैनीताल समाचार के द्वारा संध्याकालीन उत्तराखण्ड बुलेटिन का यह शीर्षकीय गीत बना जिसने पूरे उत्तराखण्ड में महत्वपूर्ण संास्कृतिक अभिव्यक्ति दी। यह याद रहे कि उत्तराखण्ड में चले विभिन्न जनान्दोलनों को सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और आंदोलनात्मक रूप देने वाले गीतों की सशक्त अभिव्यक्ति लोक के गीतों, लोक कथा में हमेशा प्रचलित रहे, सशक्त हिमालय तुमुनैक घत्यूछ, जागो-जागो हो मेरा लाल नी करन दीयो हमरि निलामी नी करन दीयो हमारे हत्यल ये पंििक्तयों हिमालय के संघर्षशील जीवन की पूर्ण अभिव्यक्ति देती है।

अपने बल पर हिमालय को बचाने के लिए यहां के आम को आहवान करते हंै। जिसका हिंदी रूपान्तर इस प्रकार है हिमालय बोल रहा है तुम्हे जागो, जागो हो मेरे लाल। मत करने दो अब नीलाम मुझे।
मत होने दो मेरा हलाल, आज हिमालय जगा रहा है। उत्तराखण्ड के इन प्रमुख आंदोलनों में कहीं भी हिमालय बचाने की अभिव्यक्ति नहीं हुई थी। ऐसा विदित होता है कि हिमालय बचाओ शब्द की अभिव्यक्ति ही जन आंदोलनों को पीछे धकेलने की रणनीति रहीं है।


हिमालय बचाओ, शब्द की उत्पत्ति 9 सितम्बर 2009 को अप्रत्यक्ष रूप में सरकारी घोषणा जैसे लगती है क्योंकि उत्तराखण्ड राज्य का आंदोलन मूलतः उत्तराखण्ड के दस पहाड़ी जनपदों की रही, इसीलिए उत्तराखण्ड राज्य का संघर्षशील आधार क्षेत्र भी पहाड़ी ही रहा है। उत्तराखण्ड राज्य के संघर्ष को अगर हम हिमालय बचाओ शब्द की अभिव्यक्ति करते हैं तो वह अपने आप में गलत नहीं होता।

उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड के अलग होने का कारण भी हिमालय की उपेक्षा ही रही है, तब भी कहा जाता था कि लखनऊ की बनी हुई टोपी जबरदस्ती उत्तराखण्ड पर नहीं पहनाई जाती। उत्तर प्रदेश में राज्य करने वाले प्रमुख राष्ट्रीय दल कांग्रेस व भाजापा ही उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद शासकवर्ग के रूप में स्थापित हो गया पिछले सोलह वर्षों से लखनऊ से संचालितहोने वाली नीतियां दिल्ली से ही संचालित होने लगीं। इसलिए उत्तराखण्ड में चले प्रमुख जन आंदोलनों में जिनकी भूमिका उत्तराखण्ड विरोधी या कहे हिमालय विरोध रही वे ही सत्ता का चलाने वाले बन गए।

आज स्थिति उत्तराखण्ड की ये है कि यह उत्तराखण्ड न रह कर ठेकेदार खण्ड बन गया है। आज अधिकांश जन प्रतिनिधि जो चुने जा रहे हैं, वे धन संचय से अत्यधिक शक्तिशाली बन गए हैं लगभग 90 प्रतिशत जनप्रतिनिधि ठेकेदारी के धंधे में लिप्त हैं, इसलिए हिमालय के प्राकृतिक संपदाओं की जबरदस्त लूट मची हुई है, चाहे वह जंगल, खनिज में हो। इस लूट को करने वाले हमेशा कानून से ऊपर रहते है। राजनीतिक प्रभाव से जन प्रतिनिधि स्वयं अपना, अपने समर्थक ठेकेदारों नौकरशाहों के गिरोह में जबरदस्त ढंग से पकड़ बनाए हुए है।

पुलिस प्रशासन पंगु बना हुआ है, लूट को देखते हुए भी अनदेखा किया जा रहा है। हालात तो इतनी दयनीय है कि अल्मोड़ा शहर के अंदर ही देवदार के पेड़ खुले आम काट दिए जाते हैं लेकिन काटने वाले प्रभावशाली लोगों की पहुंच, प्रशासन, पुलिस व न्यायपालिका तक बनी रहती है, और मामला पूर्णतः दबा दिया जाता है।

इसी तरह से भारत का प्रमुख पर्यावरण संस्थान गोविंद बल्लभ पंत स्थापित है। इसी के ठीक आधा फलांग नीचे से कोसी नदी बहती है। पर्यावरण के नाम पर इस संस्थान पर अरबों रुपया व्यय होता है। देश विदेश के मेहमान यही आते है नामी गिरामी वैज्ञानिक मंचों में यहां भाषण भी देते रहते है। लेकिन इस संस्थान के ठीक नीचे बहने वाली नदी में जब नदी बचाओ आंदोलन आरम्भ किया गया तो इस संस्थान का लेशमात्र योग भी इस आंदोलन को नहीं मिला था।

आश्चर्य की बात तो यह रही कि ठीक इस संस्थान के पास ही 34 करोड़ की एक परियोजना बनाई गई। इस परियोजना के बनते ही बरसात में अल्मोड़ा में पेयजल संकट व्याप्त हो गया। कई-कई दिनों तक शहर मंे पानी नहीं आया, लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हो गए। लेकिन लगता है इस पर्यावरण संस्थान ने अपनी आंख, कान व मुँह गांधी जी के बन्दरों की तरह बन्द रखा। जिससे गांधी जी की यह सीख बुरा न देखो, न सुनो, न बोलो। इस पद चिन्हों पर यह संस्थान चलता रहा, तब फिर हिमालय बचाओ का औचित्य क्या रह जाता है।

मौसम संबंधित सूचना भी सुर्खियों में रही ग्लेशियरों के बारे में भी विरोधाभाषी बना। सन् 1976 में जब इस पर्यावरण संस्थान की स्थापना नहीं हुई थी वाहिनी ने एक सघन वृक्षारोपण किया था, लेकिन जब पर्यावरण संस्थान बना तो झाड़ियों के बजाय सीमेंट की चार करोड़ की घेराबंदी की दीवार बनाई गई थी क्या यही हिमालय बचाओं है?

नौ सितम्बर को उत्तराखण्ड सरकार के द्वारा हिमालय बचाओ का जबरदस्त प्रचार किया गया, स्कूलों में रैलियां निकाली गई। जगह-जगह यह शपथ लिया गया कि हम हिमालय बचाने की शपथ लेते है, लेकिन हिमालय बचाओ क्या है, क्या यह किसी महान व्यक्ति का नाम है या महान मूर्ति है या कोई स्थल है? जिसको बचाने की हम शपथ ले रहे है। याद रहे शपथ लेने वाले है जो इस हिमालय को नष्ट कर रहे है।

अभी हाल में डी0एम0एम0सी ने रिपोर्ट दी कि हाल में डीडीहाट के बस्तड़ी गांव में 23 लोगों की अकाल मृत्यु हुई, उसमें भूमि प्रबन्धन की कमी थी। 30 डिग्री ढाल पर सड़क निर्माण किया जा रहा है। याद रहे एक किलोमीटर सड़क में हजार घन मीटर मिट्टी बहकर चली जाती है और आजकल पूरे उत्तराखण्ड में लगभग यही दशा बनी जे0सी0बी0 पहाड़ों को खोद रहे हैं। कैसे हिमालय बचाओ की बात हो रही है, ये सब विकास के नाम पर हो रहा है उत्तराखण्ड में इस वक्त तीन हजार चार सौ पच्चीस मेगा वाट की विद्युत परियोजना स्थापित है। इसके अलावा 12 हजार दो सौ पैंतीस मेगा वाट के 95 प्रोजेक्ट विभिन्न चरणों में स्थापित होने जा रहे हैं। एन0टी0पी0सी0 और एम0एच0 पी0सी0 वैसी सार्वजनिक उपक्रम सात हजार तीन सौ दो मेघावाट की पच्चीस परियोजनाएं निधि क्षेत्र की कम्पनियां भी दो सौ अठारह मेगावाट की अड़तीस परियोजनाओं पर कामकर रही हैं। उत्तराखण्ड में इन परियोजनाओं के लिए भयानक सुरंग बनाई गई और बनाई जा रही है। इन सब कारणों से उत्तराखण्ड में सन् 1893, 1894, 1977, 2010 और 2013 में भारी तबाही का सामना करना पड़ा।

उत्तराखण्ड के आम जन को ही नहीं, इन विद्युत परियोजनाओं को भी बाढ़ ने तबाह कर दिया। इस आपदा में काली गंगा प्रथम , सोबका, पचैती, अस्सी गंगा प्रथम, गोरी गंगोरी, परियोजनाओं का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। प्रोजेक्ट, जे0सी0बी सब बह गए। पावर हाउस को नुकसान हुआ, इसकी सुरंग में छः किमी0 तक मलबा भर गया। मद्महेश्वर में काली गंगा प्रथम, काली गंगा द्वितीय और मद्महेश्वर परियोजना को काफी हानि हुई। सोन प्रयाग के भी छोटी परियोजनाएं समाप्त हो गई। तपोवन विष्णु गाड़ परियोजना मलबे में धंस गया।

उत्तराखण्ड में पिछले तीस वर्षो से बादल फटने की आम घटना हो गई है, केदारनाथ के नीचे फाटाम्पून और सिंगोली, भटवाड़ी विद्युतपरियोजना में बीस किलोमीटर सुरंग खोदी जा रही थी। सारा मलबा मन्दाकिनी में डाला गया। याद रहे श्रीनगर विद्युत परियोजना की तबाही भी अलखनंदा में विद्युत परियोजना बनाने का मलबा डालने से जबरदस्त तबाही मची थी।

उत्तराखण्ड का एक सुन्दर नगर श्री नगर इसी तरह से टेहरी, पिथौरागढ़ आदि क्षेत्रों का भी हाल यही है और यह सब उस हिमालय में हो रहा है जिसकी उम्र सबसे कम है। हिमालय बचाओ का नारा देने वाले क्या इसको महसूस करेंगे कि क्या सिर्फ शपथ लेने से हिमालय की तबाही रूक जाएगी। हम जब छात्र थे तब यह पोस्टर लगाया करते थे कि हिमालय को मई, जून में ही नहीं जनवरी, फरवरी की कड़ाके की ठंड में भी देख्ंो।

यह भी हम महसूस करते थे कि हिमालय की स्वच्छ, सफेद, श्रृंखलाओं को ही न देखें, उसके नीचे रहने वाले दो लाख अस्सी हजार छः सौ पन्द्रह घरों में ताले लगे है। राज्य बनने के बाद बत्तीस लाख लोगों ने पहाड़ छोड़ दिया है। पलायन की दर सन् दो हजार से बीस सौ दस तक छत्तीस प्रतिशत बढ़ गई है।

हिमालय क्षेत्र में एक दशक पहले पन्द्रह से बीस हजार की आबादी थी, आज घटकर दो सौ पचास रह गई है, मिलम ग्लेशियर के पास भी पांच सौ परिवार रहते थे। आज सिर्फ दो परिवार रह गए है। सन् 2013 की आपदा के बाद पलायन बड़ा है। आपदा के छ सौ पचास गांवों के लिए कोई पहल नहीं हुई।

2040 प्राथमिक विद्यालय इसलिए बन्द होने की स्थिति में है कि वहां दस से कम बच्चे पढ़ते हैं। आज भी उत्तराखण्ड के कुछ स्थानों में ऐसी स्थिति है कि बच्चों को दस किलोमीटर दूर प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने के लिए जाना पड़ता है।

इसी उत्तराखण्ड में आज जी0डी0पी0 27.22 से घटकर 9.39 में आ गई है। यही हाल स्वास्थ्य का भी है। उत्तरकाशी में उन्नीस वर्ष पूर्व से हास्पिटल की बिल्डिंग बनी हुई है। लेकिन आज तक उसमें कोई डाक्टर नहीं आया, पिथौरागढ़ का ही उदाहरण काफी है। जिस जनपद में पचहत्तर डाक्टर होने चाहिए वहा बाइस है। विशेषज्ञ चिकित्सकोें में से सिर्फ अड़चालीस में से आठ ही है। महिला चिकित्सकों में सिर्फ इक्कीस में से नौ पद ही है। यहां की छः लाख की आबादी में सिर्फ बयालीस चिकित्सकों के भरोसे चल रहा है। लगभग यह भी पहाड़ी जनपदों के हाल ऐसे ही है। हिमालय बचाने वाले अधिकांश डाक्टर देहरादून, हरिद्वार व उधमसिंह नगर में ही केन्द्रित हो गए हैं।


हिमालय बचाओ का शाब्दिक अर्थ ऐसा लगता है कि हिमालय बचाओ कह दिया, तो हिमालय बच जाएगा। आश्र्च की बात है कि उत्तराखण्ड में हिमालय बचाओ का नारा देने वाली सरकार ने बच्चों को यह भी बताने का कष्ट नहीं किया कि आप अपने स्कूल, कालेज, शहर, गांव में बने जंगल, जल स्रोत, खनिज सम्पदा तथा प्राकृतिक सम्पदा को बचाने का प्रयास करते है तो वहीं हिमालय बचाओ का संकेत देता है लेकिन वास्तविक रूप में हिमालय बचाओ की चेतना यदि विकसित होती है तो सबसे अधिक कुठाराघात उन नेताओं, अफ़सरों व तक्नीशियनों पर होना है क्योंकि उनका आधार प्राकृतिक सम्पदाओं को लूटना है, अर्थात् हिमालय को ही लूुटना है, इसलिए हमेशा वास्तविक अर्थ में बचते रहते है और हिमालय बचाओ की शपथ लेकर हिमालय के रहनुमा बन जाते है। इसलिए हिमालय बचाओ की विशद् व्याख्या की नितांत आवश्यकता है। तभी हिमालय बचाओ शब्द की सार्थकता हो पाएगी।

shamsher singh bisht

शमशेर दा वाकई में शमशेर थे और चिपको आन्दोलन से लेकर 2018 में 22 सितम्बर को अपने देहावसान तक लगातार जनांदोलनों में सक्रिय रहे।

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One Comment

  1. उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति के लिए केवल सरकार पर ही जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती है। क्या वोटरों को सरकार चुनते समय यह ध्यान में नहीं रखना चाहिए कि हमारा और आने वाली पीढ़ी का खयाल रखने की क्षमता हमारे द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि में है या नहीं ?

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