जलवायु परिवर्तन और कोरोना महामारी के वायरस का संबन्ध हमारे खान-पान के साथ

शिवकांत
शिवकांत लंदन से

आपने पढ़ा होगा पिछले महीने के अंत में कैनडा के पश्चिमी और अमरीका के पश्चिमोत्तरी प्रशान्त सागर के तटवर्ती इलाकों इतिहास की सबसे भयंकर गर्मी पड़ी थी। वैनकूवर के पास कुछ इलाक़ों में तापमान 50 डिग्री के पास पहुँच गया था। गर्मी के मारे कैनडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के कई गाँवों में आग लग गई और गर्मी के कारण पाँच सौ से ज़्यादा लोग मारे गए।

गर्मी की लहर के बारे में न भी पढ़ा हो पर कोरोना की लहर से तो ज़रूर गुज़रे होंगे। वूहान की जंगली जानवरों की मंडी से या वायरस शोध प्रयोगशाला से फैली इस महामारी से अब तक चालीस लाख लोग मारे जा चुके हैं। अकेले अमरीका में छह लाख से अधिक, ब्रज़ील में पाँच लाख से अधिक और भारत में लगभग पाँच लाख लोगों की जान जा चुकी है।

इन दोनों घटनाओं का हमारे खान-पान से सीधा संबन्ध है। आप पूछेंगे कैसे? हम ज्यों-ज्यों ख़ुशहाल होते जा रहे हैं त्यों-त्यों हमारी मांस की भूख बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार मांस का उत्पादन पिछले 50 वर्षों में बढ़कर तीन गुना हो चुका है। दुनिया में गाय-भैंसों की संख्या एक अरब पार कर चुकी है। इनके अलावा हम एक अरब भेड़-बकरियाँ, 75 करोड़ सूअर और 25 अरब मुर्गियाँ पालते हैं।

हम अपनी 83% खेती योग्य ज़मीन अपने पालतू जानवरों को पालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। खेती से पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गैसों का 60% पालतू जानवरों से आता है। हमारे भोजन की 18% कैलरी और 37% प्रोटीन ही पालतू जानवरों से मिलता है। पर्यावरण और भोजन विज्ञान पर हुए ताज़ा शोधों से पता चलता है कि मांसाहारी भोजन पैदा करने में शाकाहारी भोजन से लगभग ढाई गुना ग्रीनहाउस गैसें पैदा होती हैं।

ग्रीनहाउस गैसों से हमारे वायुमंडल में गर्मी बढ़ रही है और वायुमंडल में गर्मी बढ़ने से मौसम बदल रहे हैं। यदि हमने इस चक्र पर रोक नहीं लगाई तो अगले पचास से लेकर सौ वर्षों के भीतर मौसम में बहुत ही ख़तरनाक बदलाव आ जाएँगे। नवंबर में ब्रिटन के उत्तरी शहर ग्लासगो में होने जा रहे विश्व मौसम परिवर्तन संमेलन में मौसम परिवर्तन की रोकथाम की योजना पर ही विचार होगा।

कोरोना महामारी के वायरस का संबन्ध भी हमारे खान-पान के साथ ही है। मांस और दवाओं के लिए हमने जंगली जानवरों का व्यापार करना और पालतू जानवरों को औद्योगिक स्तर पर पालना शुरू किया। जानवरों के निकट संपर्क में आने से जानवरों के वायरस इंसानों को लगने लगे। 1918 के स्पेनी फ़्लू से लेकर आज के कोरोना वायरस तक महामारी फैलाने वाले लगभग सभी वायरस जंगली या पालतू जानवरों से फैले हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जंगली जानवरों को व्यापार के लिए पिंजरों के भीतर निर्मम हालात में रखा जाता है। यातना से सताए और कमज़ोर पड़े इन जानवरों के शरीरों में वायरसों को तेज़ी से पनपने और आस-पास के इंसानों को लग जाने का ख़तरा बना रहता है।

इसी तरह जानवरों के कारख़ानों की शक्ल लेते जा रहे फॉर्मों में बत्तख़-बटेर और मुर्गे जैसे पक्षियों को कुछ ही इंच के तंग पिंजरों में पाला और मोटा किया जाता है। इसी तरह सूअरों, गायों और भैंसों को तंग खाँचों में रखकर पाला और उनका दोहन किया जाता है। आज के बेहद चर्चित विचारक प्रो युवाल नोहा हरारी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सेपियन्स में हमारी इस निर्ममता का ‘क्रांति के शिकार’ अध्याय में मार्मिक चित्रण किया है।

हज़ारों-लाखों की संख्या में जगह के लिए छटपटाते और अपने मल-मूत्र में पलते इन जानवरों के शरीरों में घातक हारमोन बनते हैं जो इनके दूध और मांस को खाने वालों के शरीरों में भी जाते हैं। लेकिन उससे भी ख़तरनाक बात यह है कि यातना की वजह से इन जानवरों के शरीर वायरसों के अखाड़े बन जाते हैं जहाँ से वायरस आसानी से इनके आस-पास काम करने वाले इंसानों को लग जाते हैं।

जानवरों से इंसानों को लगने वाले घातक वायरसों का यह चक्र तभी से चला आ रहा है जबसे हमने जानवरों को प्रोटीन के कारख़ाने की तरह पालना और दोहना शुरू किया है। वायरसों से बचाव के लिए टीके ज़रूर बन गए हैं लेकिन हमारी मुनाफ़े और प्रोटीन की बढ़ती भूख की वजह से वायरसों की रफ़्तार टीकों से तेज़ होती जा रही है। इसका इलाज इस चक्र को तोड़े बिना संभव नहीं है।

इस चक्र को तोड़ने का रास्ता सीधा सा है। हमें मांसाहार छोड़ कर शाकाहारी बनना होगा। भारत की गिनती अभी तक कम मांस खाने वाले देशों में होती है। लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरने के साथ-साथ तेज़ी से बदलाव आ रहा है और लोग मांसाहारी बनने लगे हैं। जबकि पश्चिम के अमीर देशों में स्थिति इससे उलट है। मांस खाने से फैलती जा रही केंसर, हृदयरोग, मधुमेह और मोटापे की बीमारियों की वजह से शाकाहार से पर्याप्त पोषण न मिल पाने की भ्रान्तियाँ दूर हो जाने की वजह से लोग तेज़ी से शाकाहारी बन रहे हैं।

खिलाड़ियों, मुक्केबाज़ों और शरीर बनाने वालों के बड़े-बड़े नाम शाकाहारी हो गए हैं। हॉलीवुड की फ़िल्मों के भीमकाय सितारे और कैलीफ़ोर्निया के पूर्व गवर्नर एर्नोल्ड श्वात्सनेगर, पूर्व हैवीवेट मुक्केबाज़ माइक टाइसन, टैनिस सुपरस्टार नोवाक ज़ोकोविच, वीनस और सिरीना विलियम्स, F1 कार रेस चैम्पियन लुईस हैमिल्टन और अमरीका के बास्केटबॉल स्टार डेएन्ड्रे जॉर्डन जैसी हस्तियाँ शाकाहारी बन चुकी हैं। भारत के क्रिकेट कप्तान विराट कोहली भी इनमें शामिल हो गए हैं और बताते हैं कि शाकाहार से उनकी चुस्ती और बढ़ी है।

इसके बावजूद जो लोग प्रोटीन की कमी के डर से शाकाहारी बनने से घबराते हैं उनके लिए अच्छी ख़बर यह है कि कृत्रिम बुद्धि से ऐसी मशीनें बना ली गई हैं जो वनस्पति को ही सीधे दूध, अंडे और मांस में बदल सकती हैं। गूगल की फ़िल्म शृंखला The Age of AI (कृत्रिम बुद्धि का युग) में चिली की एक कंपनी Notco की विस्तार से चर्चा है। यह कंपनी वनस्पति से बना दूध, अंडे और मांस बेचती है जो स्वाद, गंध और बनावट में एकदम असली दूध, अंडे और मांस जैसा होता है।

मांस छोड़ कर शाकाहार या वनस्पति से बनने वाले मांस और डेयरी का आहार अपनाने से हम मौसम परिवर्तन की रोकथाम में तो मदद करेंगे ही, जानवरों के संपर्क में आने से फैल रही बीमारियों की रोकथाम में और अपने आप को मांस खाने से फैल रही केंसर, दिल और मोटापे की बीमारियों से बचाने में भी कामयाब होंगे। विज्ञान और मशीनों ने जीवन को इतना आसान बना दिया है कि अब हमें स्वस्थ रहने के लिए हल्के शाकाहारी आहार की ज़रूरत है न कि मांसाहार की जो जानवरों को सता कर, बीमारियों का ख़तरा फैला कर और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा कर पैदा किया जा रहा है।

शिवकॉंत, बीबीसी हिन्दी रेडियो के पूर्व संपादक हैं

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