बाल कहानी : कैसे हमारा प्यारा कल्लू माता जी का दुलारा बन गया था

ज़या मोहन

ज़या मोहन 

जाड़े की कड़कड़ाती ठंडी रात  में एक पिल्ले की रोने की कू कू की आवाज बार बार नींद तोड़ रही थी।रात में रजाई से निकलना कठिन था।कब नींद आ गयी पता ही नही चला।सुबह घर के काम निपटा कर मैं ऑफिस चली गयी।रात की बात भी दिमाग से उतर गई।

लौटी तो देखा एक कुतिया व उसके दो बच्चे को किसी वाहन ने दबा दिया था।वे मर चुके थे।एक पिल्ला माँ से चिपका था जो रह रह कर रो रहा था।मेरा मन भर आया।अंदर आने पर भतीजे ने कहा बुआ पिल्ले की माँ मर गयी है।ये जो बच्चा बचा है उसे भी किसी जानवर ने गर्दन में काट लिया है।घाव में कीड़े भी पड़ गए है।बुआ अब ये कैसे रहेगा।हम इसे घर ले आते है। तुम ठीक कह रहे हो पर दादी इसे नही रहने देगी।बुआ हम इसे लॉन में टीन शेड के नीचे रखेगे।ठीक है।

 भतीजा उसे ले आया। लॉन में टीन शेड के नीचे बोरी बिछा कर उसे लेटाया व दूध दिया। भूखा पिल्ला दूध पीकर व बोरी की गर्माहट पा कर सो गया। हमने उसे फ़टे कम्बल का टुकड़ा ओढा दिया।शाम को पति के आने पर सारी बात बताई बोले अच्छा किया।मैं अपने परिचित पशुओं के डॉक्टर मौर्या से बात करता हूँ।डॉक्टर साहब की दवा भतीजा ले आया। पति व भतीजे ने मिल कर घाव साफ कर दवा लगाई। बराबर दवा लगाने के कारण कुछ ही दिनों में उसका घाव भर गया।

अब वह खूब खेलने लगा।हमने उसका नाम कल्लू रखा। वह अपना नाम खूब पहचानने लगा। जब कोई नाम पुकारता वह दौड़ कर आता।वह सबका प्यारा हो गया।मोहल्ले के बच्चे भी उसके पास खेलने आते।वह फेंकी हुई गेंद को दौड़ कर मुँह में दबा कर लाता और जोर जोर से पटकता।भूख लगने पर वह अपना कटोरा मुँह में दबा कर ले आता।मेरे परिवार में सभी उसे खूब प्यार करते।

मेरी माता जी को वह पसंद नही था।कहती क्या कुत्ता पाल लिया है ।घर से बाहर ही रखो।अगर कभी वह भूले से भी घर के अंदर आ गया तो माता जी उसे भगा कर ही दम लेती। मैं कहती माता जी ये बेजुबान बड़े वफादार होते है।ये अपने मालिक की दी हुई रोटी के कर्ज चुका देते है।पर उन्हें अच्छा न लगना था सो नही लगा।

एक दिन माता जी सुबह टहलने निकली आहट पा कर कल्लू आगे पीछे चलने लगा। माता जी बोली चल हट मुझे जाने दे।कल्लू कू कू की आवाज निकालने लगा शायद आने वाले खतरे को उसने भाँप लिया था। माता जी ने छड़ी से मारा  पर कल्लू दूर दूर चलने लगा।अचानक कुछ दूर जाने पर माता जी की गले की चैन को किसी ने खींचना चाहा।कल्लू ने दौड़ कर उसका हाथ मुँह में दबा लिया। वह व्यक्ति चाकू निकाल कर कल्लू को मारने लगा। कल्लू दौड़ दौड़ कर बार बार भूकने लगा। माता जी भी हिम्मत कर बचाओ बचाओ चिल्लाने लगी।राहगीरों ने आवाज सुनी वे दौड़ पड़े।चोर माता जी की अंगूठी चैन ले कर भागने लगे कल्लू ने उनका पैंट पकड़ लिया ।चोर कल्लू की पकड़ से छूट नही पा रहे थे। लोगो ने चोरों को पकड़ लिया किसी ने पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस उन्हें ले गयी।

तभी माता जी की नज़र कल्लू पर गयी घायल होने के कारण वह बेहोश हो कर गिर पड़ा था।माता जी सबसे रो रो कर कहने लगी मेरे कल्लू को बचाओ। मेरी मदद करो।इसे जल्दी अस्पताल  ले चलो। पहचान के लोगो ने हमे खबर दी। हम कार से वहाँ पहुँचे।देखा माता जी कल्लू को सहला रही है।उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।हम तुरन्त उसे डॉक्टर के पास ले गए।माता जी कह रही थी डॉक्टर साहब हमारे कल्लू को बचा लीजिये। आप घबराये नही हम अच्छे से अच्छा इलाज करेंगे। है भगवान इसकी रक्षा करो मैने इसे कभी प्यार नही किया पर इसने जान पर खेल कर मुझे बचा लिया। 

कुछ दिनों बाद कल्लू एकदम ठीक हो गया।अब वह हम सबसे ज्यादा माता जी का दुलारा हो गया। कल्लू माता जी के साथ मंदिर जाता प्रसाद मिलने में देरी होती तो कूदने लगता।माता जी प्यार से झिड़कते हुए कहती ठहरो दे रही हूँ। कल्लू माता जी के पैरों के पास बैठ कर पूछ हिलाने लगता। माता जी प्रसाद देते हुए कहती तू बहुत अच्छा है।मैंने तुझे देर से पहचाना।कल्लू अब अंदर आने लगा। हम लोग हँस कर कहते कल्लू बाहर चलो तो माता जी कहती ख़बरदार किसी ने उसे बाहर किया तो। कल्लू अब हमारे परिवार का सदस्य है। हम सभी खुश थे कि हमारा प्यारा कल्लू  माता जी का दुलारा बन गया था।

जयश्री श्रीवास्तव , जया मोहन

पूर्व सहायक सचिव , माध्यमिक शिक्षा परिषद , क्षेत्रीय कार्यालय , प्रयागराज

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