नहीं रहे बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार कैलाश बुधवार!

(मीडिया स्वराज़ डेस्क )

11 जुलाई. बीबीसी हिंदी रेडियो  के पूर्व सम्पादक कैलाश बुधवार का शनिवार की सुबह लंदन में निधन हो गया. वह ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता और साहित्य जगत के सबसे प्रभावशाली लोगों में थे. अब तक के पहले भारतीय हैं जो बी.बी.सी. रेडियों में हिन्दी एवं तमिल विभागों के अध्यक्ष बनाए गए थे.  एक लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो में काम करने के पश्र्चात लंदन में रह रहे थे. लंदन का शायद ही कोई ऐसा महत्वपूर्ण कार्यक्रम होगा जिसमें शिरकत या अध्यक्षता कैलाशजी न कर चुके हों। वह कविता भी लिखते थे और मंच पर कवि सम्मेलनों का संचालन भी. मंच से उनका रिश्ता पृथ्वी थियेटर के दिनों से है। पृथ्वीराज कपूर का असर उनके रेडियो प्रसारण एवं नाटक दोनों ही क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता है।

बीबीसी हिंदी के पूर्व सहयोगी विजय राणा ने उनके निधन की सूचना अपने फ़ेस बुक पेज पर इस तरह  दी 

एक दुखद समाचार: हिन्दी रेडियो प्रसारण का आज एक युग समाप्त हो गया। बीबीसी हिन्दी के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दी रेडियो प्रसारण के भीष्म पितामह आज सुबह इस नश्वर संसार को छोड़ कर चले गए। हमेशा विनम्र, सकारात्मक, संयत, और उत्साह की प्रतिमूर्ति कैलाश बुधवार का सानिध्य ही शिक्षा थी।

 

हिंदी पत्रकारिता का जीवंत तीर्थ

अजित राय

मित्रों, लंदन से तेजेंद्र शर्मा जी ने खबर दी है कि हम सबके प्रिय कैलाश बुधवार अब नहीं रहे। उन्हें समर्पित मेरी एक पुरानी टिप्पणी ।London Dreams (2019)-2.
Kailash Budhwar BBC & Hindi Journalism.
लंदन में बी बी सी हिंदी और तमिल सर्विस के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार का घर हिंदी पत्रकारिता का जीवंत तीर्थ है। पिछले दस सालों से मैं बिना उनसे मिले भारत कभी नहीं लौटा। दूरदर्शन की पत्रिका दृश्यांतर (अगस्त 2014) में हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना एक दिलचस्प संस्मरण भी लिखा था। 87 साल की उम्र में भी वे पूरी तरह सचेत और सक्रिय है। मैंने और तेजेंद्र शर्मा ने उनसे आग्रह किया कि वे आकाशवाणी(भारत) और बी बी सी , लंदन पर धारावाहिक संस्मरण लिखे, जिसे उन्होंने मान लिया।
4-5 सितंबर 1987 को देवराला में रूपकुंवर सती कांड पर प्रसारित कैलाश बुधवार का डिस्पैच मैं आज तक नहीं भूला हूं। इसी तरह राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने की सबसे पहले भविष्यवाणी और खबर कैलाश बुधवार ने प्रसारित की थी। तब बी बी सी का इतना रूतबा था कि इंदिरा गांधी की हत्या की खबर पर राजीव गांधी ने तब विश्वास किया जब उन्होंने यह खबर बी बी सी पर सुनी। उन्हें भारत सरकार के रेडियो आकाशवाणी पर भरोसा नहीं था। भारत की राजनीति और इतिहास को बदल देने वाली घटनाओं पर संतुलित और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए कैलाश बुधवार हमेशा याद किए जाएंगे। बी बी सी की विश्वसनीयता के बारे में पटना के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर( Surendra Kishore ) अक्सर एक प्रसंग सुनाते हैं कि बी बी सी के रिपोर्टर का कहना है कि- ” यदि किसी देश में कम्यूनिज्म आ रहा है तो हम उसे रोकने की कोशिश नहीं करते और यदि किसी देश से कम्यूनिज्म जा रहा है तो हम उन्हें बचाने की भी कोशिश नहीं करते। ”
बी बी सी प्रबंधन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए विरोध में मार्क टुली के इस्तीफा देने के विषय में कैलाश बुधवार का इतना कहना है कि ” किसी भी संस्थान में अधिकारियों द्वारा निर्धारित सीमा रेखा के बाहर जाने पर ऐसा होता है। समय होता तो मैं इस बारे में विस्तार से चर्चा करना चाहता था।
बुंदेलखंड के उरई में पढ़ाई के दौरान उन्होंने दस साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया, मथुरा से बी ए और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए (1954) करने के बाद कई सालों तक पृथ्वी थियेटर मुंबई में काम किया। आकाशवाणी की चयन परीक्षा में टॉप करने पर भी जब नौकरी का बुलावा नहीं आया तो सैनिक स्कूल करनाल में हिंदी के अध्यापक हों गए। इसी दौरान बी बी सी लंदन के लिए चयन हो गया। 11 नवंबर 1970 से 11अप्रैल 1992 तक बी बी सी में रहे। 1979 में जब उन्हें बी बी सी की हिंदी और तमिल सर्विस का प्रमुख बनाया गया तो वे पहले भारतीय थे जिन्हें किसी अंग्रेज को रिपोर्ट नहीं करना पड़ता था और उन्हें हिंदी समाचारों के चयन एवं प्रसारण में पूरी आजादी थी। यह वह दौर था जब सारी दुनिया में बी बी सी की तूती बोलती थी।
उन्होंने भारत और विश्व की राजनीति के बड़े उतार चढ़ाव को नजदीक से देखा है। बांग्लादेश का उदय, आपातकाल, जनता पार्टी की सरकार, भोपाल गैस काण्ड,दिवराला सती कांड , आपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या, सिख विरोधी दंगे, राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, सोवियत संघ का विघटन, आडवाणी की रथयात्रा, राजीव गांधी की हत्या और नरसिम्हा राव का प्रधानमंत्री बनना ,बाबरी मस्जिद विध्वंस की पूर्व बेला की घटनाओं के वे गवाह रहे हैं। हिंदी पत्रकारिता का इतिहास कैलाश बुधवार के बिना पूरा नहीं हो सकता। उनकी आलमारी में 1970 से 1992 तक की उनकी प्रमुख रेडियो रिपोर्टिंग के टेप सुरक्षित है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में जिस तरह दिनमान, धर्मयुग, रविवार और जनसत्ता के दौर को याद किया जाएगा, उसी तरह बी बी सी के हिंदी सर्विस प्रमुख कैलाश बुधवार के दौर को भी याद किया जाएगा। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
(लेखक एक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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