आचार्य नरेन्द्रदेव : भारतीय समाजवाद के प्रणेता

आचार्य नरेंद्रदेव
डॉ. चंद्रविजय चतुर्वेदी

तिलक महाराज और महर्षि अरविंद के विचारों से प्रभावित छब्बीस वर्षीय नौजवान आजादी के संघर्ष में कूद पड़ता है। 31 अक्टूबर 1889 को सीतापुर में जन्मे आचार्य नरेन्द्रदेव की कर्मभूमि फैजाबाद रही।

पिता बलदेवप्रसाद खत्री प्रसिद्द वकील थे, अतः नरेन्द्रदेव भी वकालत करने लगे। इनका बचपन का नाम अविनाशीलाल था। नरेन्द्रदेव नामकरण संस्कृत के विद्वान् माधव मिश्र जी ने किया।

मार्क्स और बुद्ध से प्रभावित नरेन्द्रदेव भारतीय संस्कृति के उदभट विद्वान थे। 1920 के असहयोग आंदोलन में वकालत छोड़ने के बाद काशी विद्यापीठ के साथ जुड़ गए।

हिंदी संस्कृति फ्रेंच जर्मन प्राकृत पाली के साथ साथ धर्म दर्शन इतिहास के प्रकांड विद्वान् नरेन्द्रदेव काशी विद्यापीठ से आचार्य कहे जाने लगे।

महामना मालवीय जी आपकी प्रतिभा से प्रभावित रहते थे कालांतर में आचार्य जी बीएचयू के और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति बने।

कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी की स्थापना जयप्रकाश, लोहिया, पटवर्द्धन आदि समाजवादियों के साथ जब 1934 में की गई तो उसका प्रथम अध्यक्ष आचार्य जी को ही बनाया गया।

मार्क्स और बुद्ध से प्रभावित आचार्य नरेंद्रदेव भारतीय परिप्रेक्ष्य में समाजवाद को परिभाषित करते थे।

उनका स्पष्ट मत था की गरीबी का उन्मूलन द्वंदात्मक भौतिकवाद के बजाय नैतिकतावादी मानववाद से ही संभव है।

वे किसी भी प्रकार के डिक्टेटरशिप के विरोधी थे चाहे वह मजदूरों का ही डिक्टेटरशिप क्यों न हो।

आचार्य जी का कहना था की बिना सामाजिक लोकतंत्र के राजनैतिक लोकतंत्र नहीं प्राप्त किया जा सकता।

अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में किसानों के बीच कार्य करते हुए मजदूर और किसान की समस्यायों के निदानस्वरूप वे राष्ट्रीय समाजवाद की अवधारणा प्रस्तुत करते थे ,जिसे उन्होंने गया थीसिस में प्रस्तुत किया, जो समाजवादी आंदोलन का मार्गदर्शक है।

दमा के मरीज होने के बावजूद भी आचार्य जी आंदोलनों में सक्रियता से भाग लेते रहे और जेल जाते रहे।

42 के आंदोलन में वे तीन वर्ष तक नेहरू जी के साथ अहमदनगर किले में बंद रहे जहाँ नेहरूजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक -डिस्कवरी आफ इण्डिया लिखी।

इसकी पांडुलिपि में आवश्यक संशोधन आचार्य जी ने किया, पुस्तक की भूमिका में नेहरूजी ने इसका उल्लेख किया है।

नेहरू जी आचार्य का बहुत सम्मान करते थे। इंदिरा जी के दोनों पुत्रो का नामकरण राजीव और संजय आचार्य नरेन्द्रदेव जी का ही किया हुआ है।

नेहरू जी की बड़ी इच्छा थी की आचार्य जी कोस्वतन्त्र  भारत का शिक्षामंत्री बनाया जाए पर 1948 में कांग्रेस छोड़ देने के बाद वे कांग्रेस में सम्मिलित नहीं हुए।

आचार्य जी गाँधीवादी कहे जाने के बजाय मार्क्सवादी कहा जाना पसंद करते थे पर गाँधी के वे विशेष स्नेहपात्र थे, जेल में बीमार पड़ने पर उन्होंने अपना मौनव्रत भंग कर दिया था और स्वास्थ लाभ के लिए अपने आश्रम में रखा। आचार्य जी के सम्यक ज्ञान से वे बहुत अभिभूत रहते थे।

आचार्य नरेन्द्रदेव जी का मत था –हमारा कार्य साम्राज्यवाद के शोषण का अंत करना ही नहीं है वरन साथ साथ देश के उन सभी वर्गों के शोषण का भी अंत करना है जो आज जनता का शोषण कर रहे हैं।

हम एक नई सभ्यता का निर्माण करना चाहते हैं जिसका मूल प्राचीन सभ्यता में होगा जिसका रूपरंग देशी होगा ,जिसमे पुरातन सभ्यता के उत्कृष्ट अंश सुरक्षित रहेंगे जिनमे ऐसे नवीन अंशों का भी समावेश होगा जो आज जगत में प्रगतिशील हैं और संसार के सामने एक नया आदर्श स्थापित करना चाहते हैं।

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