भूजल का संकट: हम भविष्य की पीढ़ियों से ‘जल उधार’ ले रहे हैं

प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक डॉ. वी. एम. तिवारी का चेतावनी भरा साक्षात्कार— प्रतिवर्ष 30 घन किलोमीटर भूजल की हो रही है क्षति

(मीडिया स्वराज डेस्क)

लखनऊ। उत्तर भारत की धरती के नीचे हर वर्ष तीस घन किलोमीटर भूजल समाप्त हो रहा है। यह संख्या केवल एक वैज्ञानिक आँकड़ा नहीं — यह उस संकट की भयावह तस्वीर है जो आने वाली पीढ़ियों की प्यास और खेती दोनों को खतरे में डाल रही है।

यह चेतावनी दी है देश के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक और CSIR-NEIST के निदेशक, तथा राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान (NGRI) के पूर्व निदेशक, डॉ. वी. एम. तिवारी ने।उनसे बात की बीबीसी के पूर्व संवाददाता और मीडिया स्वराज के संपादक राम दत्त त्रिपाठी ने.

प्रयागराज में भूमि के नीचे मिली तीसरी नदी

डॉ. तिवारी के नेतृत्व में NGRI की टीम ने 2018-19 में शुरू हुए शोध में प्रयागराज के संगम — गंगा और यमुना के संगम — के नीचे एक प्राचीन नदी के अस्तित्व की वैज्ञानिक पुष्टि की है। यह पैलियो-चैनल (paleo-channel) प्रयागराज से कानपुर तक, कौशाम्बी और फतेहपुर होते हुए फैली है। भूभौतिकीय सर्वेक्षण — विद्युत और विद्युत-चुम्बकीय संकेतों के माध्यम से — तथा ड्रिलिंग डेटा से पता चला है कि यह चैनल 15 से 30 मीटर की गहराई पर है और इसके आयाम आधुनिक गंगा और यमुना के समतुल्य हैं। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि यह नदी कम से कम दस हजार वर्ष पहले प्रवाहित होती थी।

भूजल और नदियों का सीधा संबंध — प्रदूषण का साझा खतरा

डॉ. तिवारी ने स्पष्ट किया कि यह भूमिगत जलभृत (aquifer) गंगा और यमुना से ‘बेस फ्लो’ प्रक्रिया के माध्यम से जुड़ा हुआ है। मानसून के बाद जब नदियों का जलस्तर भूजल से नीचे चला जाता है, तब भूमि का जल नदी में आ जाता है। इसका सीधा अर्थ है — यदि भूजल प्रदूषित हुआ, तो नदी भी प्रदूषित होगी।

कानपुर और फतेहपुर की औद्योगिक इकाइयाँ कथित रूप से गहरे बोरवेल में कचरा डालती हैं। यह प्रदूषण सीधे उस जलभृत को दूषित करता है जो गंगा को जीवित रखता है। डॉ. तिवारी का स्पष्ट संदेश है: ‘स्वच्छ गंगा के लिए स्वच्छ भूजल अनिवार्य है।’

हम भविष्य की पीढ़ियों से जल का उधार ले रहे हैं।यह उधार चुकाने की क्षमता हमारे पास नहीं है।
— डॉ. वी. एम. तिवारी, निदेशक, CSIR-NEIST

30 घन किलोमीटर प्रतिवर्ष की क्षति — संकट का पैमाना

उत्तर भारत में प्रतिवर्ष लगभग 30 घन किलोमीटर भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। भूतल पर बड़े जलाशय बनाना सीमांत किसानों की ज़मीन छीनने जैसा होगा, इसलिए भूमिगत जल प्रबंधन ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। इसके लिए डॉ. तिवारी ने भूजल मानचित्रण (aquifer mapping) पर ज़ोर दिया — जैसे पक्की सतह पानी नहीं सोखती और रेत सोखती है, वैसे ही भूमिगत जलभृतों की संरचना समझकर ही प्रभावी रीचार्ज रणनीति बनाई जा सकती है। इस शोध का उपयोग जल शक्ति मंत्रालय जल प्रबंधन के लिए कर रहा है।

धान छोड़ो, मोटा अनाज अपनाओ — फसल बदलाव की अपील

भारत की 70 प्रतिशत सिंचित भूमि भूजल पर निर्भर है। धान (चावल) जैसी पानी-गहन फसलों की जगह ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाजों को अपनाना दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है। डॉ. तिवारी ने जन-भागीदारी की माँग करते हुए कहा कि वैज्ञानिक मॉडल अब इतने सक्षम हैं कि जलवायु परिवर्तन के आधार पर किसी गाँव को यह बताया जा सकता है कि अगले वर्ष उन्हें कितने लीटर पानी उपलब्ध होगा — ताकि वे अपनी आवश्यकता और फसल दोनों की योजना बना सकें।

ऋग्वेद की साक्ष्य और आधुनिक विज्ञान का मेल

डॉ. तिवारी ने यह भी कहा कि प्राचीन ग्रंथों — जैसे ऋग्वेद — में संरक्षित पारंपरिक ज्ञान की वैज्ञानिक पुष्टि समाज के लिए लाभदायक है। जैसे आधुनिक धातुकर्म प्राचीन ग्रंथों में धातु-प्रक्रियाओं के विवरण से जुड़ता है, उसी प्रकार भूगर्भीय शोध ऐतिहासिक स्मृतियों को प्रमाणित करता है। यह सांस्कृतिक विरासत और वैज्ञानिक चेतना का संगम है।

निष्कर्ष: डॉ. तिवारी का यह साक्षात्कार केवल एक वैज्ञानिक खोज की कहानी नहीं है। यह उस संकट का दस्तावेज़ है जो आँखों से दिखता नहीं — क्योंकि वह धरती के नीचे है। जब तक कुआँ सूख नहीं जाता, तब तक समाज को यह एहसास नहीं होता। लेकिन विज्ञान कह रहा है — अब सोचने का समय नहीं, अब कदम उठाने का समय है।

पूरी बातचीत नीचे के लिंक में

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