
राम दत्त त्रिपाठी
क्या पौराणिक सरस्वती नदी का प्रयागराज त्रिवेणी में अस्तित्व वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो गया है? गंगा यमुना और सरवसती के त्रिवेणी संगम के लिए प्रसिद्ध Prayagraj में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है, जिसने भू-विज्ञान, जल प्रबंधन और भारतीय सभ्यता के इतिहास—तीनों क्षेत्रों में नई बहस छेड़ दी है। वैज्ञानिकों का दावा है कि गंगा और यमुना के बीच धरती के नीचे एक विशाल प्राचीन नदी का मार्ग मिला है, जो प्रयागराज से फतेहपुर होते हुए Kanpur तक फैला हुआ है।
इस खोज का नेतृत्व कर रहे भू-वैज्ञानिक Dr. Subhash Chandra के अनुसार यह कोई सामान्य भूजल धारा नहीं, बल्कि लगभग 10 से 12 हजार वर्ष पुराना एक विशाल “पैलियो चैनल” है—अर्थात ऐसी नदी जो कभी धरातल पर बहती थी लेकिन समय के साथ भूगर्भ में समा गई।
4 से 5 किलोमीटर चौड़ी प्राचीन नदी
वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार इस प्राचीन नदी की चौड़ाई लगभग 4 से 5 किलोमीटर है, जो वर्तमान गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों के बराबर मानी जा रही है। यह चैनल जमीन के नीचे लगभग 10 से 25 मीटर की गहराई पर स्थित है।
ड्रिलिंग और भूगर्भीय परीक्षणों में यहाँ बड़ी मात्रा में बलुई मिट्टी (सैंड डिपॉजिट्स) मिली है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी रेत सामान्य मिट्टी नहीं होती, बल्कि यह “रिवर चैनल डिपॉजिट” यानी नदी के बहाव की पहचान मानी जाती है।
विशेष बात यह भी है कि इस रेत में गंगा जैसी “मीयांडरिंग पैटर्न” यानी सांप जैसी घुमावदार संरचना दिखाई देती है, जिसे वैज्ञानिक “रिवर सिग्नेचर” कहते हैं।
कैसे हुई खोज? जमीन का “एक्स-रे” करने वाली तकनीक
इस पूरे शोध में अत्याधुनिक Heli-borne Electromagnetic Technology का उपयोग किया गया। इस तकनीक में हेलीकॉप्टर के नीचे लगभग 30 मीटर लंबा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सेंसर लटकाया जाता है, जो जमीन से करीब 30 मीटर ऊपर उड़ते हुए डेटा इकट्ठा करता है।
डॉ. सुभाष चंद्रा के अनुसार यह तकनीक “जमीन के एक्स-रे” की तरह काम करती है। इससे वैज्ञानिकों को जमीन के भीतर पानी, चट्टानों, मिट्टी और रेत की परतों का त्रि-आयामी (3D) मॉडल मिलता है।
जहाँ हेलीकॉप्टर सर्वे संभव नहीं था, वहाँ ERT (Electrical Resistivity Tomography) और Ground TEM जैसी तकनीकों का उपयोग किया गया।
ड्रिलिंग से मिला वैज्ञानिक प्रमाण
सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक संकेतों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिकों ने कई स्थानों पर फिजिकल ड्रिलिंग भी की। जिन क्षेत्रों में सेंसर ने नदी जैसे संकेत दिए थे, वहाँ खुदाई में बलुई मिट्टी मिली। इससे यह पुष्टि हुई कि कभी वहाँ बड़ी नदी बहती थी।
शोध से जुड़े प्रमुख क्षेत्रों में सरायअकिल, सिराथू, मंझनपुर, फतेहपुर और बलवंत टोला जैसे इलाके शामिल हैं।

क्या यही ऋग्वैदिक सरस्वती है?
इस खोज के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह वही विलुप्त सरस्वती नदी है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है?
डॉ. सुभाष चंद्रा इस पर सावधानी से जवाब देते हैं। उनका कहना है कि अभी इसे सीधे “सरस्वती” घोषित करना वैज्ञानिक दृष्टि से जल्दबाजी होगी। पहले इस पूरे चैनल की मैपिंग हिमालय तक करनी होगी, ताकि यह समझा जा सके कि इसका मूल स्रोत क्या था और क्या इसका संबंध हरियाणा-राजस्थान क्षेत्र में मिले प्राचीन चैनलों से था।
हालाँकि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से लोग इसे सरस्वती से जोड़कर देख रहे हैं। संगम क्षेत्र में “तीसरी नदी” की परंपरागत मान्यता भी इस बहस को और गहरा करती है।
आखिर यह नदी जमीन के नीचे कैसे चली गई?
शोधकर्ताओं के अनुसार हजारों साल पहले हुए बड़े भूगर्भीय और टेक्टोनिक परिवर्तनों ने इस नदी की दिशा बदल दी।
डॉ. चंद्रा के अनुसार गंगा, यमुना और यह तीसरी नदी तीनों में समान “मीयांडरिंग पैटर्न” दिखाई देता है, जिससे संकेत मिलता है कि ये नदियाँ कभी एक ही भूगर्भीय प्रणाली का हिस्सा रही होंगी।
संभवतः किसी बड़े टेक्टोनिक बदलाव या असाधारण भौगोलिक घटना ने इस नदी को सतह से नीचे धकेल दिया, जबकि गंगा और यमुना सतह पर बहती रहीं।
जल संकट का समाधान बन सकता है यह पैलियो चैनल
यह खोज केवल ऐतिहासिक या धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक इसे उत्तर भारत के भविष्य के जल संकट के समाधान के रूप में भी देख रहे हैं।
भूजल रिचार्ज की विशाल संभावना
यह पैलियो चैनल एक विशाल भूमिगत जलाशय की तरह काम कर सकता है। यदि वर्षा जल को वैज्ञानिक तरीके से इन चैनलों में पहुँचाया जाए तो भूजल स्तर तेजी से सुधर सकता है।
‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत छह डेमोंस्ट्रेशन साइट्स पर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाने की योजना स्वीकृत हो चुकी है। इन संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल को सीधे 10-25 मीटर नीचे स्थित रेतीले एक्विफर तक पहुँचाया जाएगा।
आर्सेनिक और फ्लोराइड संकट से राहत
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसी गंभीर समस्याओं से भी राहत मिल सकती है।
जब भूजल स्तर गिरता है, तब जमीन में मौजूद आर्सेनोपाइराइट जैसे खनिज सक्रिय होकर पानी में आर्सेनिक छोड़ते हैं। लेकिन यदि भूजल स्तर स्थिर रखा जाए और लगातार रिचार्ज होता रहे, तो यह प्रक्रिया धीमी हो सकती है।
इसके अलावा ताजा वर्षा जल पुराने दूषित पानी को “डायल्यूट” करेगा और स्वच्छ जल का दबाव प्रदूषित पानी को पीछे धकेलेगा। वैज्ञानिक इसे “Push Back Effect” कहते हैं।
क्या फिर सतह पर बहने लगेगी यह नदी?
डॉ. सुभाष चंद्रा के अनुसार फिलहाल यह संभावना कम है कि यह नदी दोबारा सतह पर बहने लगे। क्योंकि इसका मूल हिमालयी स्रोत अब सक्रिय रूप से जुड़ा नहीं है।
हालाँकि यदि भविष्य में इसके उद्गम और हिमालयी संबंधों की पूरी मैपिंग हो जाती है, तो उत्तर भारतीय नदी तंत्र और भूजल प्रणाली को समझने में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
सभ्यता, विज्ञान और भविष्य—तीनों के लिए महत्वपूर्ण खोज
प्रयागराज से कानपुर तक खोजा गया यह पैलियो चैनल केवल एक भूगर्भीय संरचना नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के जल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय हो सकता है।
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यदि यह शोध आगे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित होता है, तो यह न केवल प्राचीन नदी सभ्यताओं की समझ को नया आयाम देगा, बल्कि गंगा के मैदानों में बढ़ते जल संकट, प्रदूषण और भूजल गिरावट से निपटने के लिए एक स्थायी मॉडल भी प्रदान कर सकता है।

राम दत्त त्रिपाठी वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं जिन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में 21 वर्षों तक कार्य किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के वे प्रत्यक्षदर्शी संवाददाता रहे और 24 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अयोध्या फ़ैसले की सटीक खबर उन्होंने सबसे पहले दी। गंगा प्रदूषण पर उनकी पत्रकारिता 1989 से जारी है। अब वे ramdutttripathi.in और mediaswaraj.com पर स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं।



