कांशीराम के नाम पर सपा-बसपा आमने-सामने, 2027 विधान सभा चुनाव से पहले क्यों बढ़ी सियासी तल्खी?

( राम दत्त त्रिपाठी) 

रामदत्त त्रिपाठी,पूर्व संवाददाता बीबीसी
राम दत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सपा बसपा के बीच कड़वाहट और टकराव की स्थिति बन रही है। इस टकराव का  केंद्र बिंदु बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम का नाम  है। आगामी 15 मार्च को कांशीराम जयंती इस बार श्रद्धांजलि से ज्यादा सियासी संदेश का मंच बनती दिख रही है।

बहुजन आंदोलन के संस्थापक Kanshi Ram की विरासत को लेकर Akhilesh Yadav और Mayawati के बीच खुली राजनीतिक  टकराहट सामने आ गई है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जयंती कैसे मनाई जाए—सवाल यह है कि बहुजन राजनीति की असली दिशा कौन तय करेगा?

PDA बनाम बहुजन अस्मिता

समाजवादी पार्टी ने कांशीराम जयंती को “PDA दिवस” के रूप में मनाने का फैसला किया है। PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ का फ्रेम।

सपा का तर्क है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को नई ऊर्जा और नया विस्तार चाहिए। 1993 में Mulayam Singh Yadav और कांशीराम के नेतृत्व में बना गठबंधन इसी दिशा का ऐतिहासिक प्रयोग था। उस दौर की याद दिलाकर सपा यह संदेश दे रही है कि बहुजन आंदोलन का लक्ष्य सत्ता में भागीदारी बढ़ाना था—और PDA उसी विचार का आधुनिक विस्तार है।

याद दिला दें कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के हाथ मिलाने के बाद भाजपा विधान सभा चुनाव हार गई थी। उस समय नारा लगा था “मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ा गए जय श्रीराम”

लेकिन BSP इसे अलग नजरिए से देखती है। मायावती का कहना है कि बहुजन आंदोलन कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि लंबा सामाजिक संघर्ष है। पार्टी यह संकेत देती है कि प्रतीकात्मक आयोजनों से विरासत नहीं मिलती—उसके लिए वैचारिक निरंतरता और संगठनात्मक प्रतिबद्धता जरूरी है।

1993 से 2027 तक: इतिहास की परछाईं

Mayawati Kanshiram and Mulayam Singh Yadav historic alliance in 1993

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1993 का सपा-बसपा गठबंधन एक बड़ा सामाजिक प्रयोग था। लेकिन 1995 की घटनाओं ने दोनों दलों के रिश्तों में स्थायी दरार डाल दी। तब कांशीराम ने गठबंधन तोड़कर भाजपा और कांग्रेस की मदद से मायावती को मुख्यमंत्री बनवाया था। 

2019 लोक सभा चुनाव में सपा – बसपा फिर साथ आए। बसपा को इसका फायदा भी मिला पर , मगर वह प्रयोग भी टिक नहीं सका।मायावती ने चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन तोड़ दिया। 

2022 विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ 1 सीट मिली और उसका वोट प्रतिशत लगभग 12.9% रहा। यह उसके इतिहास का सबसे कमजोर प्रदर्शन था।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कॉंग्रेस गठबंधन को अप्रत्याशित सफलता मिली . तब समाजवादी पार्टी को 37 और कांग्रेस पार्टी को 6 सीटें मिलीं , जबकि बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी . 

इसके बाद से बसपा बहुत कमजोर मानी जाती है और उस पर भाजपा की बी टीम होने के आरोप भी लगते हैं . हाल ही में मोदी सरकार ने मायावती को दिल्ली में टाइप आठ का बड़ा बंगला एलाट किया जिस पर मायावती को सफाई भी देनी पड़ी. मायावती ने यह भी साफ़ कर दिया है कि बसपा गठबंधन नहीं करेगी। 

अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांशीराम की विरासत को लेकर नई बहस सपा – बसपा के इस पुराने इतिहास को फिर जीवित कर रही है।

बदलते वोट समीकरण

दलित राजनीति अब पहले जैसी बसपा के पक्ष में एकध्रुवीय नहीं मानी जाती। गैर-जाटव दलितों में अलग – अलग इलाक़ों में नए रुझान दिखे हैं। इनमें भाजपा और सपा दोनों ने अपनी पैठ बनाई है. 

ग्रामीण जाटव मतदाता अब भी BSP का मजबूत आधार हैं।यद्यपि पढ़ा लिखा दलित समुदाय अब मायावती से मोहभंग की स्थिति में है। 

सपा PDA के जरिए OBC, दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एक साझा मंच पर लाना चाहती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो चुनावी मुकाबला ज्यादा सीधा हो सकता है। लेकिन अगर BSP अपना कोर आधार फिर से मजबूत कर पाती है, तो सपा की कोशिश सीमित रह सकती है।

क्या 2027 में और बिखरेगा विपक्ष?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

कांशीराम की विरासत को लेकर बढ़ती यह रस्साकशी संकेत देती है कि विपक्षी दलों के बीच भरोसे की दूरी अभी कम नहीं हुई है। यदि सपा और बसपा के बीच टकराव तेज होता है, तो भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकजुटता की संभावना समाप्त हो सकती है।

बहुकोणीय मुकाबला अंततः किसे फायदा देगा—यह राजनीतिक गणित का विषय है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बहुजन राजनीति की दिशा अब फिर बहस के केंद्र में है।

निष्कर्ष

कांशीराम केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति की जीवंत धुरी  रहे हैं।

एक पक्ष उन्हें व्यापक सामाजिक गठबंधन की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। दूसरा पक्ष उनकी विरासत को विशिष्ट बहुजन अस्मिता से जोड़कर संरक्षित रखना चाहता है।

ऐसे में सपा – बसपा टकराव से भाजपा को लाभ मिल सकता है। 2027 की राजनीति का रास्ता इसी बहस से होकर गुजरेगा। 

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