संयम मूर्ति होता है स्थितप्रज्ञ

गीता प्रवचन दूसरा अध्याय

संत विनोबा कहते हैं कि ‘स्थितप्रज्ञ’ यानी स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य, यह तो उसका नाम ही बता रहा है। परंतु संयम के बिना बुद्धि स्थिर होगी कैसे? अत: स्थितप्रज्ञ को संयम मूर्ति बताया गया है।

बुद्धि हो आत्मनिष्ठ, और अंतर-बाह्य इंद्रियाँ हों बुद्धि के अधीन – यह है संयम का अर्थ।

स्थितप्रज्ञ सारी इंद्रियों को लगाम चढ़ाकर उन्हें कर्मयोग में जोतता है।

इंद्रियरूपी बैलों से वह निष्काम स्वधर्माचरण की खेती भलीभाँति करा लेता है। अपना प्रत्येक श्वासोच्छ् वास वह परमार्थ में खर्च करता है।

यह इंद्रिय-संयम सरल नहीं है। इंद्रियों से बिलकुल काम ही न लेना एक तरह आसान हो सकता है।मौन, निराहार आदि बातें इतनी कठिन नहीं हैं।

इससे उल्टे, इंद्रियों को खुला छोड़ देना तो सबको सधा हुआ है ही।

परंतु जिस प्रकार कछुआ खतरे की जगह अपने सभी अवयवों को भीतर खींच लेता है और बिना खतरेवाली जगह पर उनसे काम लेता है; उसी तरह विषय-भोगों से इंद्रियों को समेट लेना और परमार्थ के काम में उनका उचित उपयोग करना, यह संयम कठिन है।

इसके लिए महान् प्रयत्न की जरुरत है। ज्ञान भी चाहिए। परंतु इतना होनेपर भी ऐसा नहीं है कि वह हमेशा अच्छी तरह सध ही जायेगा।

तब क्या हम निराश हो जायें ? नहीं, साधकको कभी निराश नहीं होना चाहिए। क्रमश:

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