नारेबाज़ी से कुछ नहीं होने वाला, कुछ करें तो!

अमेरिका - चीन शीत युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं या सिर्फ़ चुनावी पैंतरा

शिव कांत

शिव कांत , बीबीसी हिंदी रेडियो के पूर्व सम्पादक लंदन से  

अमरीका में कोविड-19 महामारी से मरने वाले जितने लोग जानकारी में हैं उनकी संख्या एक लाख पार कर गई है और रिकॉर्ड के अनुसार जिन लोगों को कोरोना वायरस लग चुका है उनकी संख्या 17 लाख पार करने वाली है। अमरीका के इतिहास में युद्ध, महामारी और आपदाओं से होने वाली यह चौथी सबसे बड़ी जन हानि है। केवल अमरीकी गृहयुद्ध, स्पेनी फ़्लू और दूसरे विश्वयुद्ध में इससे ज़्यादा अमरीकी मारे गए थे। पर आँकड़े लोगों की व्यथा को बयान नहीं कर सकते। हर इंसान की मौत उसके परिवार और परिचितों के लिए एक बड़ा हादसा होती है। उसकी गंभीरता को किसी और भयावह आँकड़े की संभावना को खड़ा करके या फिर उसके लिए किसी दूसरे संस्थान या देश को गरिया कर कम नहीं किया जा सकता। बल्कि ऐसा करने से दूसरी ऐसी समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं जिनके सामने एक लाख लोगों की मौत मामूली लगने लगे।

पिछले हफ़्ते की घटनाओं पर नज़र डालें तो दुनिया में कुछ-कुछ वैसा ही होता नज़र आ रहा है। अमरीका की ट्रंप सरकार ने ऐसी हवा बाँधने की कोशिशें शुरू कर दी हैं कि जैसे कोविड-19 के वायरस को चीन ने अपनी किसी प्रयोगशाला में एक हथियार की तरह तैयार करके दुनिया पर छोड़ दिया हो। अमरीकी राज्य मिज़ूरी ने चीन पर हरजाना देने का दावा कर दिया है और राष्ट्रपति ट्रंप खुले मंचों से यह माँग करने लगे हैं कि चीन को इस महामारी के लिए हरजाना भरना चाहिए। कोविड-19 महामारी के फैलने की तटस्थ जाँच कराने की माँग पर चीन के विरोध और गोल बंदी के प्रयासों के बावजूद विश्व स्वास्थ्य संगठन के तत्वावधान में जाँच बैठा दी गई है। फिर भी ट्रंप साहब ने धमकी दी है कि यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक महीने के भीतर अपनी काम की शैली नहीं बदली और काम में पारदर्शिता लाने के लिए उचित बदलाव नहीं किए तो वे अमरीका से मिलने वाले अनुदान को स्थाई रूप से बंद कर देंगे और संगठन की सदस्यता छोड़ने पर भी विचार करेंगे।

( सुनने के लिए वीडियो लेख के नीचे) https://www.youtube.com/watch?v=3bIlXxP3B1g

पिछले सप्ताह ही ट्रंप ने 33 देशों के बीच चली आ रही खुले आसमान की संधि से भी हाथ खींचने का ऐलान किया। यह संधि सदस्य देशों को एक-दूसरे के इलाके पर टोही उड़ान भरने का अधिकार देती है ताकि सेना की हलचल पर नज़र रखी जा सके। इस संधि का लाभ उठा कर अमरीका के पश्चिमी गठबंधन के देश रूस की सैनिक गतिविधियों पर नज़र रखकर शीतयुद्ध के दौरान विश्वयुद्ध के ख़तरे को टालने में सफल रहे हैं। लेकिन ट्रंप सरकार का कहना है कि रूस इस संधि का पालन नहीं कर रहा है इसलिए इसमें बने रहने का कोई फ़ायदा नहीं है। पर लगता यह है कि यह चीन के ख़िलाफ़ एक और मोर्चा खोलने का प्रयास है। चीन को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि अमरीका अपनी सैन्य गतिविधियों पर दूसरे देशों को नज़र नहीं रखने देगा ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह अचानक वार कर सके। इससे पहले ट्रंप सरकार ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते और मध्यम दूरी के परमाणु अस्त्रों की संधि से हाथ खींच चुकी है। सामरिक परमाणु अस्त्रों का परिसीमन करने वाली न्यू स्टार्ट संधि से भी अमरीका के हाथ खींच लेने की आशंका की जाने लगी है।

ट्रम्प का तमाशा अमेरिकी चुनाव के  लिए  

 

चीन और रूस को पता है कि यह सारा तमाशा नवंबर के चुनावों के लिए हो रहा है। क्योंकि कोविड-19 को काबू में रखने में बुरी तरह नाकाम हो जाने के बाद ट्रंप सरकार को चुनावी प्रहारों के लिए एक नए दुश्मन की, राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों का ख़ून उबालने और वोट बटोरने के लिए युद्ध के ख़तरे का ढोल पीटने की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में मैक्सिको को निशाना बना कर उसकी सीमा पर दीवार खड़ी करने और दीवार की एक-एक पाई मैक्सिको से वसूल करने के नाम पर वोट बटोरे गए थे। अब यह दीगर बात है कि न दीवार ही बनी और मैक्सिको ने एक फूटी कौड़ी दी। पर काठ की हाँडी एक बार तो चढ़ ही गई। इस बार निशाने पर चीन है क्योंकि कोविड-19 ने बरबाद कर दिया है। ज़रूरत पड़ी तो रूस और ईरान को भी लपेटा जा सकता है। पर चीन और उसके औपनिवेशिक इरादों वाले राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी कोई हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के संपादक ने ट्रंप पर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया है कि “चीन को बिन बात कोसने की बजाए ट्रंप सरकार को अपना ध्यान कोविड-19 से लड़ने में लगाना चाहिए। यदि चीन में इस तरह एक लाख लोग मर गए होते तो ग़ुस्से में लोग वाइट हाऊस को आग लगा देते।”

लेकिन ग्लोबल टाइम्स के संपादक ट्वीट करते वक़्त शायद हांग-कांग को भूल गए थे। ग़ुस्से से भरे चीन के लोग चीन के वाइट हाऊस जोंगनानहाई तक तो शायद ही कभी पहुँच पाएँ लेकिन हांग-कांग सरकार के भवन तक तो पहुँच ही सकते हैं। शी जिनपिंग की चीनी सरकार ने कोविड-19 की महामारी से उबरते ही, दुनिया को महामारी से जूझने में उलझा देखकर हांक-कांग पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। अप्रेल से ही हांग-कांग में विरोध प्रदर्शन कराने वाले सक्रियतावादियों की धरपकड़ और चीन की कड़ी बयानबाज़ी चल रही थी। 

चीन का हांगकांग दांव 

पिछले सप्ताह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की संसद ने चीन के सुरक्षा कानून को हांग-कांग में भी लागू कर देने का प्रस्ताव पारित कर दिया जिसके लागू हो जाने पर धरने-प्रदर्शन करने वालों को अलगाववादी और षडयंत्रकारी बता कर हांक-कांग के भीतर ही बंद किया जा सकेगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध को विदेशी और बाहरी हस्तक्षेप बता कर उस पर पाबंदी लगाई जा सकेगी। ख़बर सुनते ही विरोध प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। विरोधियों और प्रदर्शनकारियों की बात सुनने की बजाए प्रशासन ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस का प्रयोग किया। पश्चिमी मीडिया और सरकारों ने चीन की इस चेष्टा की कड़ी आलोचना की और इसे हांग-कांग के लिए चीन द्वारा दिए गए एक देश दो व्यवस्था का और हांग-कांग की स्वयत्तता का हनन बताया। ट्रंप सरकार ने धमकी दी कि यदि चीनी सरकार ने सुरक्षा कानून को हांग-कांग पर लागने की कोशिश की तो चीन को अमरीकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।

हांक-कांग में पिछले साल हुए उग्र प्रदर्शनों की जड़ों को उखाड़ फेंकने के साथ-साथ हांग-कांग पर शिकंजा कसने का एक और कारण भी हो सकता है। चीन ताइवान को अपना नाराज़ होकर अलग हुआ प्रांत मानता है और हर उस देश और संस्था से नाराज़गी जाहिर करता है जो ताइवान के साथ एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह पेश आए। चीन की आपत्तियों की वजह से अभी तक ताइवान को संयुक्त राष्ट्र की पूरी सदस्यता हासिल नहीं है। लेकिन अमरीका विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर ताइवान के भाग लेने का समर्थन करता आया है। ताइवान इन संगठनों की बैठकों में एक प्रेक्षक की हैसियत से हिस्सा लेता है। 

लेकिन पिछले सप्ताह हुई विश्व स्वास्थ्य संगठन की वार्षिक बैठक में चीन के कहने पर ताइवान को नहीं बुलाया गया था। इसी बैठक में कोविड-19 की तटस्थ जाँच कराने का प्रस्ताव रखा जाना था। अमरीका विश्व स्वास्थ्य संगठन से नाराज़गी जताने के लिए इस बैठक में नहीं गया। लेकिन अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पेयो ने ताइवान को न बुलाने की बात पर विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन दोनों की कड़ी निंदा की। इसके बाद पोम्पेयो ने ताइवानी राष्ट्रपति डॉ त्साई इंग-वेन के भारी बहुमत से दोबारा चुने जाने पर उन्हें बधाई भेजी। जिसकी चीन ने कड़े शब्दों में निंदा की और कहा कि अमरीका एक ख़तरनाक परंपरा बना रहा है। हांग-कांग के लिए पारित किया गया प्रस्ताव अमरीका को ताइवान के मामले पर पटरी पर लाने के लिए खेली जा रही चीन की एक चाल भी हो सकता है।

ताइवानी राष्ट्रपति के दोबारा चुनाव पर भेजी गई बधाइयों को लेकर चीन अमरीका से नहीं भारत से भी नाराज़ हुआ है। जबकि भारत से केवल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के दो सांसदों ने राष्ट्रपति डॉ त्साई इंग-वेन के शपथ ग्रहण समारोह में वीडियो के ज़रिए भाग लिया था। अमरीका की तरफ़ से तो विदेशमंत्री माइक पोम्पेयो वीडियो के ज़रिए शामिल थे। लेकिन तब भी चीनी दूतावास के एक दूत ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नाराज़गी का संदेश पहुँचाया जिसमें सांसदों को सलाह दी गई थी कि ऐसे कामों से बचें जिनसे ताइवानी अलगाववादी गतिविधियों को समर्थन मिलता हो। 

इससे भी गंभीर बात यह है कि भारत में पिछले करीब बीस दिनों से सीमा के लद्दाख़ और सिक्किम सेक्टरों के तीन ठिकानों पर चीन और भारत के सैनिकों के बीच झड़पें हुई हैं जिनमें कई सैनिकों को चोटें भी आई हैं। इन ठिकानों पर सीमा रेखा को लेकर भारत-और चीन के बीच पुराने मतभेद हैं। चीन ने यहाँ पहले से ही अपने रक्षा ठिकाने बना रखे हैं। अब भारत भी यातायात संपर्क बेहतर होने के बाद अपने ठिकाने बनाने लगा है जिसे चीन आक्रामक गतिविधि मानता है। संभवतः चीन कोविड-19 की जाँच के प्रस्ताव पर भारत के समर्थन से भी नाराज़ हुआ है।

उधर दक्षिण प्रशांत सागर में मलेशिया और वियतनाम के साथ चीनी नौसैनिक गश्तों के टकराव की घटनाएँ भी हुई हैं जिनमें अमरीका को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा है। चीन पर इस बात के आरोप भी लग रहे हैं कि उसने कोविड-19 के संकट से लाभ कमाने की कोशिशें भी की हैं। महामारी के आरंभिक दिनों में उसने दुनिया भर से पीपीई यानी स्वास्थ्य कर्मियों के बचाव का सामान भारी मात्रा में ख़रीद कर जमा कर लिया जिससे दुनिया में इस सामान की तंगी हो गई। ख़ुद महामारी से उबर जाने के बाद उसी पीपीई के भंडार को मुनाफ़े पर या राजनीतिक लाभ कमाने की नज़र से संकट में फँसे देशों को बेचा और दान किया।

कुल मिला कर कोविड-19 महामारी से जूझती दुनिया के इस माहौल में चीन के बढ़ते आक्रामक तेवर और महामारी के आरंभिक चरणों में उसकी गंभीरता को छिपाने के प्रयासों ने चीन का असली चेहरा बेनकाब किया है और चीन की छवि एक खलनायक की बन रही है। लेकिन उधर चीन, रूस और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और संधियों पर ट्रंप सरकार के बढ़ते हमले उसके भी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और ओछे व्यवहार को उजागर कर रहे हैं। कार्ल बिल्ट, रिचर्ड हास, फ़रीद ज़कारिया, स्टीवन रोख़ और नूरिएल रुबीनी जैसे अधिकतर राजनयिक और आर्थिक विश्लेषणकर्ताओं का मानना है कि गहराते वैश्विक संकटों की इस घड़ी में दुनिया की दो धुरियाँ, अमरीका और चीन समाधान की एक साझी रणनीति बना कर चलने की बजाए शीत युद्ध जैसे टकराव की तरफ़ बढ़ रही हैं। इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए और अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकते हैं।

बात वैश्वीकरण की या स्वदेशीकरण की नहीं है। दुनिया संचार और यातायात की ऐसी डोर में बँध कर एक हो चुकी है कि दुनिया के एक कोने में पैदा हुए संकट की लहर पूरी दुनिया को हिलाती है। स्वदेशीकरण की कोई दीवार आपको दुनिया के एक सूत्र में गुँथ जाने के इस प्रभाव से नहीं बचा सकती। इसलिए समस्या चाहे जलवायु परिवर्तन की हो, महामारी की, आर्थिक संकट की हो या साइबर सुरक्षा की, आतंकवाद की हो या शरणार्थियों की, इन सबके समाधान के लिए ऐसी शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ज़रूरत है जो सब देशों का सहयोग लेकर स्थानीय समाधान तैयार कर सकें। हो इसका उलट रहा है। जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ पहले से मौजूद थीं उन्हीं को तात्कालिक स्वार्थों की बलि चढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं।

कोई मेरा देश महान और मेरा देश पहले की रट लगा रहा है तो कोई लोकल और स्वदेशी की तान छेड़ रहा है। बुनियादी बात यह है कि दुनिया का जिस तरह का ढाँचा खड़ा किया गया है उसमें एक ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत है जिसके सहारे दुनिया के किसी कोने से पैदा हुई नई बीमारी की सूचना तत्काल दुनिया के श्रेष्ठतम वायरस विशेषज्ञों तक पहुँच सके जो उसकी जाँच-परख कर दुनिया को उचित निर्देश दे सकें। लेकिन नेताओं और लोगों को भी उनकी बात सुनना और उनपर अमल करना सीखना होगा। बात-बात पर चंदा बंद कर देने की धमकियों से ऐसी संस्थाएँ खड़ी नहीं हो सकतीं जो हमें महामारियों से बचा सकें।

नारेबाज़ी से कुछ नहीं होने वाला 

रही अर्थव्यवस्था और रोज़गार की बात। तो पूँजी के तो बेरोकटोक हर जगह और हर देश में जाने की छूट है। लेकिन मज़दूर के कहीं जाने की छूट नहीं है। इसलिए यदि आपको वाजिब दाम पर अच्छा माल चाहिए तो पूँजी को वहाँ जाना होगा जहाँ मज़दूर सस्ता है, योग्य है और सुलभ है। इसीलिए अमरीकी और यूरोप की कंपनियाँ माल बनाने चीन गई थीं। भारत भी अगर श्रम सुधार करे और लाल फीता छोटा कर ले वहाँ भी जा सकती हैं। अमरीका और यूरोप को यदि कंपनियाँ वापस अपने यहाँ बुलानी हैं तो या तो लोगों को कम पैसे पर काम करना होगा या फिर कई गुना दाम पर माल ख़रीदना होगा। इसमें नारेबाज़ी से कुछ नहीं होने वाला।

नारेबाज़ी से उल्टा यह होगा कि कोविड-19 की मार और कर्ज़े के बोझ से दबी कंपनियाँ और सरकारें हाथ खड़े करने लगेंगी। लोगों को रोज़गार नहीं मिलेंगे तो माल कहाँ से ख़रीदेंगे। माल नहीं बिकेगा तो कंपनियाँ बनाएँगी किस लिए। और कंपनियाँ नहीं बनाएँगी तो या तो हाइपर इंफ़्लेशन पैदा हो जाएगी या फिर उससे भी ख़तरनाक डिफ़्लेशन जिसमें लोग, कंपनियाँ और सरकारें तीनों की बर्बादी होगी। इसलिए बेहतर यह होगा कि मौजूदा हालात में नेता लोग व्यापार और बढ़ाने की बात करें। व्यापार, अड़चनें और दीवारें गिराने से बढ़ेगा, उन्हें बनाने से नहीं। स्वदेशी और परदेशी की बात छोड़ कर वाजिब दाम और बढ़िया क्वालिटी की बात करें। यदि आत्मनिर्भरता करनी है तो ऊर्जा में की जा सकती है। जैसे अमरीका ने किया है। अमरीका आज तेल निर्यातक बन गया है। भारत उतना तेल नहीं निकाल सकता तो सारी बंजर ज़मीन पर सौर और पवन चक्की फ़ार्म बना कर अक्षय ऊर्जा तो बना सकता है। प्रदूषण भी घटेगा और आयात का बिल भी। कुछ करें तो! 

मुईन शादाब का शेर है:

तुम अभी आसमाँ को तकते हो,

शहर में सबने ईद भी कर ली!

आप सभी को ईद मुबारक!

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