13 दिसंबर को आकाश और जल मार्ग से ये ‘प्रवासी’ काशी विश्वनाथ धाम लोकार्पण के साक्षी बनेंगे

साइबेरिया बहुत ही ठंडी जगह है, जहां नवंबर से लेकर मार्च तक तापमान जीरो से बहुत ज्यादा -50, -60 डिग्री नीचे चला जाता है. इस तापमान में इन पक्षियों का जिंदा रह पाना बहुत मुश्किल हो जाता है इसीलिए ये पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके इन दिनों भारत आते हैं.

यूं तो वाराणसी में हर रोज पूरी दुनिया से पर्यटक घूमने आते हैं, लेकिन ठंड में काशी के घाटों पर गर्म चाय और सुबह-सुबह ठंडे पानी में डुबकी लगाकर महादेव के दर्शन का अपना अलग ही आनंद होता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि पीएम मोदी द्वारा 13 दिसंबर को काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण कार्यक्रम में इस बार कुछ ‘प्रवासी’ ऐसे भी शामिल होंगे, जो जल और आकाश मार्ग से इसका आनंद लेंगे.

जी हां, हम बात कर रहे हैं उन साइबेरियन पक्षियों की, जो इन दिनों रूस से काशी प्रवास के लिये आये हुये हैं.

ये एक खास किस्म के सफेद पक्षी हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर से हर साल नवंबर के अंत से फरवरी के बीच गंगा तट पर पहुंचते हैं. ये पक्षी रूस के साइबेरिया इलाके से आते हैं इसलिये इन्हें साइबेरियन पक्षी भी कहते हैं.

बता दें कि ये एक खास किस्म के सफेद पक्षी हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर से हर साल नवंबर के अंत से फरवरी के बीच गंगा तट पर पहुंचते हैं. ये पक्षी रूस के साइबेरिया इलाके से आते हैं इसलिये इन्हें साइबेरियन पक्षी भी कहते हैं. 13 दिसंबर के दिन भी ये हजारों की संख्या में आपको यहां नजर आ जाएंगे. ये ऐसे पक्षी हैं जो हवा में उड़ते हैं और पानी में तैरते भी हैं. सफेद रंग के इन पक्षियों की चोंच और पैर नारंगी रंग के होते हैं.

बता दें कि साइबेरिया बहुत ही ठंडी जगह है, जहां नवंबर से लेकर मार्च तक तापमान जीरो से बहुत ज्यादा -50, -60 डिग्री नीचे चला जाता है. इस तापमान में इन पक्षियों का जिंदा रह पाना बहुत मुश्किल हो जाता है इसीलिए ये पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके इन दिनों भारत आते हैं.

जीवों में माइग्रेशन यानी प्रवास एक बहुत आम प्रक्रिया है. एक ही प्रजाति के जीवों में मौसम की वजह से बहुत बड़ी संख्या में एक साथ दूसरे स्थान पर चले जाने की प्रक्रिया को माइग्रेशन कहते हैं. यह माइग्रेशन अक्सर एक तय तरीके से बार-बार हर साल किया जाता है.

जीवों में माइग्रेशन यानी प्रवास एक बहुत आम प्रक्रिया है. एक ही प्रजाति के जीवों में मौसम की वजह से बहुत बड़ी संख्या में एक साथ दूसरे स्थान पर चले जाने की प्रक्रिया को माइग्रेशन कहते हैं. यह माइग्रेशन अक्सर एक तय तरीके से बार-बार हर साल किया जाता है.

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यानि जैसे ही मौसम खराब हुआ, ये जीव अपना घर छोड़कर किसी दूसरी जगह चले जाते हैं और मौसम ठीक होते ही वापस अपने घर आ जाते हैं. साइबेरियन पक्षियों के अलावा भी इसके बहुत से उदाहरण हैं. अधिकतर यही होता है कि जिन इलाकों में बहुत अधिक ठंड पड़ती है, वहां के जीव दूसरी जगह बेहतर भोजन, प्रजनन और सुरक्षा के लिए चले जाते हैं.

साइबेरियन पक्षियों की सैकड़ों ऐसी प्रजातियां हैं, जो हर साल अपना घर छोड़कर दुनियाभर में पनाह लेने के लिये पहुंचती हैं. भारत आने के लिए ये पक्षी 4000 किलोमीटर से भी ज्यादा लम्बा सफर उड़कर तय करते हैं. ये पक्षी ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करते हुए भारत आते हैं.

इतना लम्बा सफ़र ये लाखों के समूह में उड़ते हुए पूरा करते हैं. भारत में भी इनका एक लैंडिंग स्थान है. ये पक्षी सबसे पहले महाराष्ट्र के बारामती पहुंचते हैं यानि अगर सफर में कोई पक्षी बाकियों से अलग भी हो गया तो उसे पता है कि उसके साथी उसे बारामती में स्थित ‘बिग बर्ड सेंचुरी’ में मिलेंगे. यहां इकठ्ठा होकर ये पक्षी भारत के कोने-कोने में जाते हैं और पूरी ठंड यहीं बिताते हैं.

इतना लम्बा सफ़र ये लाखों के समूह में उड़ते हुए पूरा करते हैं. भारत में भी इनका एक लैंडिंग स्थान है. ये पक्षी सबसे पहले महाराष्ट्र के बारामती पहुंचते हैं यानि अगर सफर में कोई पक्षी बाकियों से अलग भी हो गया तो उसे पता है कि उसके साथी उसे बारामती में स्थित ‘बिग बर्ड सेंचुरी’ में मिलेंगे. यहां इकठ्ठा होकर ये पक्षी भारत के कोने-कोने में जाते हैं और पूरी ठंड यहीं बिताते हैं.

माइग्रेशन से करीब दो महीने पहले से ही ये पक्षी इसकी तैयारी करना शुरू कर देते हैं. जैसे ही गर्मियां खत्म होती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं, इन पक्षियों के दिमाग के फोटो रिसेप्टर इनके शरीर के हार्मोन में बदलाव करने लगते हैं.

हार्मोन में इन बदलावों से उनके शरीर पर पंख बढ़ जाते हैं, जो लंबे समय तक उड़ने के लिए जरूरी हैं. साथ ही ये पक्षी अपने शरीर पर फैट इकट्ठा करने के लिए खूब खाते हैं और वजन बढ़ाते हैं.

हार्मोन में इन बदलावों से उनके शरीर पर पंख बढ़ जाते हैं, जो लंबे समय तक उड़ने के लिए जरूरी हैं. साथ ही ये पक्षी अपने शरीर पर फैट इकट्ठा करने के लिए खूब खाते हैं और वजन बढ़ाते हैं.

बॉडी फैट बढ़ जाने से इन्हें लंबे सफर में गर्माहट मिलती है और भोजन की भी कमी नहीं खलती. इस तरह करीब 2 महीनों की तैयारी के बाद ये पक्षी लाखों की संख्या में इकट्ठे उड़ान भरते हैं, लेकिन इनका सफर इतना आसान नहीं होता. रास्ते में बहुत सी मुश्किलें आती हैं. आंधी, तूफान और तेज हवाओं से इस दौरान कई पक्षी अपनी जान से हाथ भी धो बैठते हैं, लेकिन फिर भी हर साल भयानक ठंड से भागते हुए वो भारत की ओर रुख करते हैं.

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