पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनाएं भारतीय जीवनशैली

पर्यावरण की रक्षा के लिए जरूरी है मानव और प्रकृति के बीच संतुलन

भारतीय जीवनशैली (Indian Life Style) का अर्थ प्रकृति (Nature) के साथ जीवनयापन है। प्रकृति  को मानव के लिए ईश्वर का सर्वोत्तम वरदान कहा गया है। भारतीय जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण पर अधिक ज़ोर देती है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं।

मानव और प्रकृति (Human and Nature) के बीच संतुलन का आधार समरसता है जो मानव और प्रकृति को आपस में जोड़ती है।

प्रकृति ईश्वर का सर्वोत्तम वरदान

भारतीय जीवनशैली प्रकृति और मानव के मध्य आश्रय और आश्रित के संबंध की शिक्षा देती है। भारतीय जीवनशैली में प्रकृति अपने भीतर संपूर्ण प्राणी जगत को संरक्षण देती है। भारतीय जीवनशैली के अनुसार ‘प्रकृति’ किसी व्यक्ति, समाज, राज्य, या देश, की निजी संपत्ति नहीं होती। भारतीय जीवनशैली से युक्त हमारे देश का प्रकृति के साथ सदियों से एक भिन्न एवं अनोखा संबंध रहा है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यता होने के कारण भारतीयों का जीवन अनुभव अन्य सभ्यताओं की अपेक्षा प्रकृति के समीप अधिक रहा है।

दुनियाँ की चिंता ग्लोबल वार्मिंग: 

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के अंतर्राष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट “रेड कोड”, जो ग्लोबल वार्मिंग के बारे में स्पष्ट चेतावनी है, से पूरी दुनियाँ में चिंता की लहर दौड़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2040 तक ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ चुका होगा। भारत के संदर्भ में तो ग्लोबल वार्मिंग की यह चेतावनी अधिक गंभीर है क्योंकि दूसरे महासागरों की तुलना में हिन्द महासागर का तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है। वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक और रिपोर्ट की सहलेखक लिंडा मर्न्स के औसर इससे बचाव का कोई रास्ता नहीं है। फिर भी, आज सभी एकमत हैं कि पृथ्वी पर मंडरा रहे इस भयानक संकट को टालने के लिए तत्काल कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है।  

चूंकि पर्यावरण प्रकृति का अभिन्न अंग है और पर्यावरण संरक्षण को लेकर दुनियाँ भर में जागरूकता अभियान भी चल रहे हैं। प्रकृति का जो मह्त्व पश्चिमी देश आज समझ रहे हैं और उसके संरक्षण के लिए अत्यधिक चिंतित हैं, वह महत्व भारतीय जीवनशैली में हजारों-लाखों वर्ष पूर्व हमारे देश के ऋषि-मुनियों द्वारा वेद, उपनिषद, शास्त्र महाकाव्य आदि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप में परिलक्षित किया गया है।  भारतीय जीवनशैली में हमारे तत्वज्ञानी ऋषि-मुनियों ने हजारों-लाखों वर्ष पहले ही यह पता लगा लिया था कि प्रत्येक जीव का शरीर पांच महाभूतों- आकाश, वायु, अग्नि तथा पृथ्वी से ही निर्मित है और वे इस बात को भलीभाँति जानते थे कि यदि इन पंच तत्वों में से एक भी प्रदूषित हो गया तो इसका दुष्प्रभाव समस्त मानव जाति को प्रभावित करेगा क्योंकि ये पंचमहाभूत ही समस्त समस्त सृष्टि का आधार हैं। 

पंचमहाभूतों से सृष्टि का निर्माण:

महाभारत के शांति पर्व में भारतीय जीवनशैली के विषय में उल्लेख है कि इत्यैतैः पञ्चभिभूतैयुक्तं स्थावरजंगमम्।” अर्थात संपूर्ण चल और अचल जगत इन पांच महाभूतों से बना हुआ है। इन पांच महाभूतों में क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गन्ध गुण विद्यमान होते हैं। भीष्म पर्व के अनुसार, गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां भूमिः प्रधानतः।।”, अर्थात, आकाश में 1 गुण ‘शब्द’, वायु में 2 गुण ‘शब्द एवं स्पर्श’, तथा अग्नि में 3 गुण ‘शब्द, स्पर्श, एवं, रूप’, जल में 4 गुण, शब्द, स्पर्श, रूप, एवं रस विद्यमान हैं किन्तु पृथ्वी में पांचो गुण व्याप्त होने के कारण पृथ्वी पंच महाभूतों में है और पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन भी श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है।

भारतीय जीवनशैली में प्रकृति का महत्व:

कल तक जो पश्चिमी देश सिर्फ तकनीकी सभ्यता में विश्वास करते थे और तकनीकी युग को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति का नृशंस दोहन कर रहे थे, आज “समस्त प्राणियों के जीवन की एकमात्र जननी प्रकृति को मानते हुये “विश्व पर्यावरण दिवस” (World Environment Day) मना कर दुनियाँ को जागरूक कर रहे हैं। जबकि भारत आदिकाल से प्रकृति का महत्व को जानते हुये इसके उचित संरक्षण के लिये प्रकृति के कण-कण को पूजनीय बताकर आँवला नवमी, तुलसी पूजा, वट सावित्री, गंगा दशहरा, इत्यादि पर्वों द्वारा इसकी रक्षा करता आ रहा है। यद्यपि कुछ मिथ्यावाचक इन परम्पराओं को तर्कहीन, मिथ्या और अंधविश्वास बता कर देश की युवा पीढ़ी को हमारी अनमोल धरोहर से दूर कर रहे हैं। 

हमारे शास्त्रों एवं वेदानुसार, जीवन को सुचारु रूप से चलाने वाली प्रकृति ही हमारी जननी है और इस प्रकृति को जीवन देकर सुचारू रूप से चलाने वाली वह परम शक्ति ही विधाता, ईश्वर, या सर्वोपरि सत्ता है। श्रीमद्भगवत्गीता के अनुसार निम्नोन्नतं वक्ष्यति को जलानाम् विचित्र भावं मृगपक्षिणां च।माधुयॆमिक्षौ कटुतां च निम्बे स्वभावतः सवॆमिदं हि सिद्धम्।। “अर्थात यह प्रकृति स्वयं में एक रहस्य है पानी को गहराई और पर्वतों को ऊंचाई किसने सिखाई, पशु एवं पक्षियों में विचित्रता किसने सिखाई, गन्ने में मधुरता और नीम में कड़वापन कहां से आया, यह सब स्वभाव प्रकृति के द्वारा दिए गए हैं, इसमें कोई भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

भारतीय जीवनशैली में ईश्वर से पहले प्रकृति पूजनीय है। वेद-पुराण, शास्त्र, उपनिषद आदि में जीवनदायिनी प्रकृति की दोहन से रक्षा हेतु सात्विक एवं धार्मिक दायित्वों का उल्लेख है और विभिन्न नदियां विशेषकर गंगा मां के समान पूजनीय हैं। आज स्थिति इतनी दयनीय है कि जिस गंगा माँ को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपना ही स्वरूप बताया है, अत्यधिक जीर्ण-शीर्ण हालत में है।

भारतीय आध्यात्मिक जीवनशैली में ॠग्वेद से लेकर अथर्ववेद और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य, उपनिषद तथा भिन्न-भिन्न शास्त्रों में धार्मिक कृत्यों द्वारा प्रकृति एवं पर्यावरण को दोहन से बचाने के लिए मानव को विभिन्न स्तर पर शपथ दिलाई गई है। इसके बावजूद, जहां आज आधुनिक सभ्यता के पोषक अपने भौतिक लाभ के लिए भारत की हरी-भरी धरती को वृक्ष विहीन,  वन विहीन करने में लगे हुए हैं, तो वहीँ अज्ञानी एवं रूढ़िवादी लोग अन्धविश्वास के कारण अपनी माँ समान प्रकृति नदी, वृक्ष, परिवेश, इत्यादि को अस्वच्छ कर प्रताड़ित कर रहे हैं। इसी अज्ञानता के कारण आज न जाने कितने क्षेत्र जलविहीन होकर जल संकट से जूझते नजर आ रहे हैं। न जाने कितनी नदियां, विशेषकर गंगा, पवित्र गंगाजल के स्थान पर गंदाजल का ढेर बनती जा रही हैं।

भारतीय जीवनशैली के उल्लंघन का परिणाम: 

वैदिक काल में भी जब देवताओं एवं असुरों द्वारा अमृतपान की लालसा में समुद्र मन्थन कर प्रकृति का निर्दयतापूर्वक दोहन करने से सम्पूर्ण पृथ्वी विचलित हो गई तो  अमृत के साथ-साथ हलाहल विष भी उत्पन्न हुआ। तब भगवान शिव ने इसी प्रदूषणरूपी हलाहल का पान कर सृष्टि को प्रदूषण मुक्त किया था। किन्तु आज के प्रदूषण से उत्पन्न जहरीली गैस रूपी हलाहल लाइलाज रोग एवं मृत्यु रूपी रौद्रावतार शिव के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। हमें भारतीय जीवनशैली में वर्णित प्रकृति के नियमों को उस परम सत्ता के रचनाकार के दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उसकी दृष्टि में पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी जीव उनकी संतान हैं, फिर चाहे उनका निवास जल, थल, या, नभ, कुछ भी हो और इतनी सरल सी बात खुद को सर्वबुद्धिमान एवं सर्वशक्तिशाली समझने वाले मनुष्य की समझ में नहीं आती ।

भारतीय जीवनशैली और प्रकृति के तीन गुण: 

आज हमारी समस्या, किसी अन्य के अधिकारों एवं भावनाओं की परवाह किए बिना अपनी इंद्रिय तृप्ति की इच्छा को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जाना है। सम्पूर्ण प्राणी जगत, प्रकृति के तीन गुणों सत, रज, तथा तम द्वारा, माया रूपी भौतिक शक्ति के अधीनस्थ जीवन यापन करता है। इस बात देवनागरी लिपि के “पवर्ग”  प, फ,ब,भ,म से और अधिक आसान रूप में समझा जा सकता है।

प – परिश्रम को दर्शाता है।अर्थात इस संसार का प्रत्येक जीव अपने भरण पोषण तथा अपने जीवन संरंक्षण के लिए संघर्ष रूपी परिश्रम करता है।

फ- फेन या फेना शब्द को दर्शाता है।अर्थात जब एक अश्व अत्यधिक मेहनत करता है, तो उसके मुख से झाग अर्थात फेना निकलता है।इसी प्रकार कठिन परिश्रम करने पर हमारी जिह्वा भी सूख जाती है और हमारे मुख में झाग बनने लगता है।

ब- बन्धन के लिए द्योतित किया गया है। जीव समस्त प्रयासों के फलस्वरूप सब कुछ पा लेने के पश्चात भी असंतुष्ट प्राणी की भांति बन्धनों में बंधा रहता है।

भ-भय को दर्शाता है। भौतिकता से परिपूर्ण जीवन में मनुष्य भय की प्रज्जवलित अग्नि में जलता रहता है क्योंकि कोई यह नहीं जानता कि आगे क्या होगा ?

अन्तिम अक्षर म है। म- मृत्यु का सूचक है।इस भौतिक संसार में सुख एवं सुरक्षा की हमारी सारी आशाएँ तथा योजनाएँ मृत्यु के द्वारा नष्ट हो जाती हैं। इस प्रकार, पवर्ग इस नश्वर संसार के लक्षण प्रर्दशित करता है। किन्तु इसमें अध्यात्म का प्रतीक अ उपसर्ग जोड़ देने पर भौतिकता रूपी पवर्ग ध्वस्त हो जाता है।

पर्यावरण प्रदूषण का कारण प्रकृति से दूरी: 

आज हम अपनी इसी आध्यात्मिक शक्ति से दूर होने से प्रकृति से भी दूर होते जा रहे हैं। अत्यधिक सरल एवं कोमल हृदय वाला आज का मानव आज पशु-हत्या से लेकर वर्षा-वनों का विनाश, नदियों का ह्रास इत्यादि जैसे अनेक निर्दयी एवं भयावह कृत्यों में लिप्त है। हमारी स्वाभाविक भूमिका ईश्वर की प्रकृति का संरक्षण करने की है न कि इसका भक्षण की।  वर्तमान पर्यावरणीय संकट का कारण प्रकृति का विवेकपूर्ण उपभोग के बजाय इसका अंधाधुंध दोहन है। यदि आज हमें जल संकट, भूकंप, भूस्खलन, महामारी इत्यादि जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भोगना पड़ रहा है तो इसके पीछे हमारा प्रकृति के प्रति निरंकुश,निर्दयी, एवं अनुशासनहीन व्यवहार है। मानव अपने अहंकारवश प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहता है जबकि यह निरर्थक एवं मिथ्या सोच है। कोई भी प्राकृतिक नियमों को नहीं रोक सकता ।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, कि भौतिक शक्ति दुरत्यया है, इसलिए प्रकृति को भौतिक उपायों से जीत पाना असंभव है। वास्तव में मातृ रूपी प्रकृति विभिन्न माध्यमों से हम सभी को जीवन के सही तरीके सिखा कर बता देती है कि जीवन के सभी पद अस्थाई हैं।

भौतिक जगत की महत्ता जीवों से

श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं,ययेदं धार्यते जगत।” अर्थात इस भौतिक जगत की महत्ता जीवों के कारण है जीवन तब तक सुरक्षित है जब तक प्रकृति सुरक्षित है किंतु आधुनिक सभ्यता के लोग अपने को सर्वोत्कृष्ट समझकर मदान्ध हो चुके हैं और सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन का दुरुपयोग कर इंद्रिय तृप्ति हेतु प्रकृति एवं पर्यावरण का दोहन करने मात्र में लगे हुए हैं किंतु वे यह भूल जाते हैं कि धरती का प्रत्येक प्राणी ईश्वर एवं प्रकृति के अधीन है किन्तु सभी सिर्फ हम केवल भौतिक जगत का भोग करना चाहते हैं और यही सबसे बड़ा मानसिक रोग है। आज के इस तकनीकी युग में कुछ भारतीय युवा भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का तिरस्कार करके प्रौद्योगिकी सीखने के लिए पश्चिम देशों में जाते तो पाते हैं कि जिन बातों को वे भारत में निरर्थक मानकर तिरस्कृत किया करते थे, आज पश्चिमी देश उन्हीं बातों का अनुसरण कर रहे हैं, तो उन्हें आश्चर्य होता है।

आध्यात्मिक उन्नति ही वास्तविक सुख:

आज का भारत, भारतीय जीवनशैली एवं उससे संस्कारित ज्ञान की धरोहर और शक्ति के बजाय पाश्चात्य सभ्यता एवं तकनीक का अनुकरण कर सुखी बनना चाहता है परंतु, आधुनिक तकनीकी से विकसित देश भी आज सुखी नहीं हैं। भारतीय जीवनशैली आध्यात्मिक ज्ञान के साथ भौतिक ज्ञान से भी परिपूर्ण है।  वेदों में खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा विज्ञान, एवं अनेक अन्य विषयों पर जो सिद्धान्त वर्णित हैं, आज का आधुनिक जगत उनको अपनी खोज बता कर इतरा रहा है। वैदिक युग में भौतिक विज्ञान की उन्नति हुई थी किन्तु तत्कालीन लोग इसे महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। उनकी रूचि पर्यावरण संरक्षण में अधिक थी। अपनी इसी शक्ति के बल पर भारत विश्व गुरु के रूप में सम्मानित हुआ। किंतु आज भौतिकतावाद एवं पाश्चात्य सभ्यता में डूबे लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए आर्थिक विकास के नाम पर अज्ञानतावश प्रकृति का शोषण कर रहे हैं, किंतु तथाकथित भौतिक आवश्यकताओं की वस्तुएं समय के साथ नष्ट हो जाने वाली हैं।

भारतीय जीवनशैली से ही प्रकृति का संरक्षण संभव: 

अतः प्रकृति के प्रति निष्ठुरता एवं अनुशासनहीनता को त्याग कर, आर्थिक विकास तथा भौतिक प्रगति का उपयोग यदि भारतीय जीवनशैली का अनुसार प्रकृति को सुरक्षित और संरक्षित करने के साथ हो तो प्रगतिशील मानव जीवन के एक नवीन पक्ष का उदय होगा। भारतीय जीवनशैली कल भी सर्वोत्तम थी, आज भी सर्वोत्तम है और यदि भारतीय जीवनशैली का पूर्ण सम्मान किया जाए तो पर्यावरण संरक्षण तो होगा ही बल्कि यह आने वाले समय में भारत विश्वगुरू बनकर पुनः स्वयं भारतीय जीवन शैली की उत्कृष्टता सिद्ध करेगा।

आलोक वाजपेयी (एमए (मनो. एवं अंग्रेजी)

Alokbajpai054@gmail.com

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