अब विज्ञान का ज्ञान अपने उद्देश्य से भटक गया है

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। कल ही दिल्ली हाई कोर्ट ने जूही चावला की पेटीशन को निरस्त कर उन पर २० लाख का जुर्माना लगाया। यहां इस सवाल में जाने के बजाय की न्यायालय का निर्णय सही है या गलत ये जानना ज्यादा जरूरी है कि क्या इंटरनेट से प्रदूषण होता है?

 तो इसका जवाब है हां। दुनिया में जो भी गतिमान है उसे ऊर्जा की जरूरत होती है। इंटरनेट के सुचारू रूप से संचालन को सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे सर्वर और टॉवर लगाए जाते है। इनको चलाने के लिए उपयोग होने वाली ऊर्जा बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन करती है। विशेषज्ञों की मानें तो डिजिटल टेक्नोलोजी से होने वाला कार्बन उत्सर्जन एविएशन अर्थात वैमनिकी से होने वाले कुल उत्सर्जन से भी कहीं ज्यादा है।जैसे जैसे टेक्नोलोजी ज्यादा उन्नत होगी और हम अगले लेवल की टेक्नोलोजी पर जाएंगे वैसे वैसे  ऊर्जा की जरूरत भी बढ़ेगी और कार्बन उत्सर्जन भी।एक आंकड़े के मुताबिक 2019 में केवल गूगल ने 12 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा की। 


तो क्या विज्ञान के नए आयाम हमारे लिए नई चुनौती है? या विज्ञान अपने उद्देश्य से भटक गया है?वास्तव में विज्ञान का उद्देश्य सत्य खोजना है।

याद रखिए  आज भी विज्ञान सत्य खोजता है। और वो सत्य पहले से ही विद्यमान है। जैसे ” गुरूत्वाकर्षण” को खोजना या ” कोशिका” या “अणु/ परमाणु” की रचना को खोजना। ये पहले से हैं , विज्ञान ने इन्हे खोजा। 

पर अब विज्ञान का ज्ञान अपने उद्देश्य से भटक गया है।  अब ये खोजे हुए सत्य को पूरा नहीं बताता। सिर्फ इतना बताता है जिससे कुछ लोगो को फायदा हो। इसीलिए आज विज्ञान के रहस्य और उपयोगिता कुछ बड़ी कंपनियों की मुट्ठी में हैं। इसीलिए तो पेटेंट जैसे कानून बनाए गए। विज्ञान के ज्ञान के आर्थिक शोषण के लिए।

अब विज्ञान और ज्ञान में “अर्थ ” यानी फायदे का प्रवेश हो चुका है। लेकिन इस फायदे के सिद्धांत ने विश्व का बहुत नुकसान किया और आज भी कर रहा है। विज्ञान अपने रास्ते से भटक चुका है। ये कभी वायरस बनाता और कभी एटम बम।इसकी कीमत हम सब चुका रहे।

विकास का परिणाम विनाश के रूप में सामने आ रहा। कटते जंगल और प्रति व्यक्ति घटती ऑक्सीजन की उपलब्धता इसका उदाहरण है। परन्तु इस आपदा में भी विज्ञान ने अवसर खोज लिया। अब ऑक्सीजन बेचेंगे। कंटेनरों में । शायद कुछ दिन में पोर्टेबल ऑक्सीजन चैंबर भी बिकने लगे।

पर  कितना भी अस्वीकार करने पर भी एक बात माननी पड़ेगी और वो ये कि प्रकृति का अपना इंटेलिजेंस है जो मानव के इंटेलिजेंस से कई गुना आगे है। प्रकृति की अपनी याददाश्त है और ये वैज्ञानिक तौर पर भी सिद्ध है। प्रकृति कुछ भी भूलती नहीं । सब याद रखती है। आइंस्टीन के उसी सिद्धांत की तरह जो कहता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती सिर्फ अपना रूप बदलती है। प्रकृति में भी मनुष्य की तरह त्रिगुन ( रज- तम और सत्व) है।हमारे कर्मों के अनुसार ये अपने गुण को धारण करती है। प्रकृति अर्थात “रचना करने की शक्ति”। लेकिन ये नष्ट भी करती है।  जो हम इसे देंगे वो ही ब्याज समेत वापस पाएंगे। 

आज प्राकृतिक आपदा सारे विश्व के लिए एक चुनौती है। भारत जैसे देशों में प्रति वर्ष ये गंभीर आर्थिक व्यय और लाखों की संख्या में लोगों का विस्थापन लेकर आती है।हमारे लिए ये ही अच्छा है कि हम सुधार जाएं।  अपने लालच से उबर जाएं और अपने जीवन में प्रकृति के महत्व को समझें।

दुनिया का सबसे अमीर आदमी भी पानी की आखिरी बोतल को पाने के लिए अपनी पूरी दौलत दांव पर लगा देगा। इसलिए अमीरी धन से अधिक पंच तत्वों के संरक्षण में है। यही कारण था कि भारतीय ज्ञान परंपरा में  हर उस चीज को धन माना गया जो नष्ट ना हो। जो खर्च होने पर भी खत्म ना हो। 

विद्या धन है ,  पशु धन है , प्रकृति धन है।अब समय प्रकृति को समझ कर उसके साथ तारतम्य बिठाने का है।

यदि हमने इन बातों पर गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया तो हम कभी भी सतत और संयत विकास के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे और शीघ्र नष्ट हो जाएंगे। कोरोना हमारे लिए एक चेतावनी है। प्रकृति से छेड़छाड़ ना करने की।सिर्फ ” मैं और मेरा” की अभिलाषा एक दिन पूरी दुनिया खत्म कर देगी। ‘सब के सुख में ही हमारा सुख है ‘ भारतीय ज्ञान परंपरा का ये मूल सूत्र जल्दी ही पूरी दुनिया समझेगी। भले ही मज़बूरी में।

डॉक्टर सीमा सिंह

सहायक प्राध्यापक विधि विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय

singhseema01@gmail.com

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