राष्ट्रीय स्वदेशी कृषि नीति प्रख्यापित करने से ही किसानों की समस्या का समाधान संभव है

इन कृषि कानूनों को वापस लेते समय माननीय प्रधानमन्त्री का यह कहना कि वे देश को पचासी प्रतिशत किसानों को इन कानूनों की भलाई और उपयोगिता को न समझा सके इसलिए कानून की वापसी हो रही है, इसे तर्कपूर्ण नहीं कहा सकता।

इस देश के अभूतपूर्व किसान आंदोलन की भावनाओं का आखिरकार स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बहु चर्चित और बहु चर्खित तीन कृषि कानूनों को वापस ले ही लिया तथा इसे क़ानूनी जामा पहनाने के लिए वर्त्तमान संसदीय सत्र में प्रक्रिया भी प्रारम्भ कर दिया। अंत भला तो सब भला।

डा चन्द्रविजय चतुर्वेदी, प्रयागराज।

आजादी के बाद यह किसानों का अनूठा अभूतपूर्व आंदोलन रहा जिसे इतिहास में कई कारणों से याद किया जाएगा। लोकतांत्रिक देश में संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में, इस आंदोलन को जिस अलोकतान्त्रिकता और असंसदीयता को झेलना पड़ा, वह भी अभूतपूर्व ही रहा।

इन कृषि कानूनों को वापस लेते समय प्रधानमन्त्री का यह कहना कि वे देश को पचासी प्रतिशत किसानों को इन कानूनों की भलाई और उपयोगिता को न समझा सके इसलिए कानून की वापसी हो रही है, इसे तर्कपूर्ण नहीं कहा सकता। वस्तुतः शासनतंत्र की हठधर्मिता यह नहीं समझ सकी कि ये तीन कानून देश के कृषि अर्थशास्त्र पर प्रहार करते ही हैं, सामान्य उपभोक्ता का अर्थशास्त्र भी प्रकारांतर से इससे प्रभावित होता है। आवश्यकता यह है कि देश का संसद खुले मन से देशहित और लोकहित में कृषि नीतियों पर चर्चा कर उपयोगी कानून प्रख्यापित करें।

किसानों की बेहतरी का प्रचार करते हुए केंद्र सरकार ने कृषि से सम्बंधित तीन विधेयक 2020 में पारित किये। पहला- आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम, दूसरा- किसान उत्पाद व्यापार वाणिज्य संवर्धन और सुविधा अधिनियम, तीसरा किसान सशक्तिकरण और संरक्षण मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा समझौता अधिनियम।

सरकार का कहना है कि पहले कानून से कृषि व्यापार को उदार और सरल बनाना है। इस कानून द्वारा अनाज, दाल, तिलहन, खाद्यतेलों, आलू प्याज को आवश्यक वस्तु से बाहर कर दिया गया है, क्योंकि इनका उत्पादन बढ़ता जा रहा है। अतः इनका भण्डारण वह भी असीमित भंडारण, निजी क्षेत्रों द्वारा किया जाएगा।

सरकार के अनुसार दूसरे कानून की मंशा ऐसी व्यवस्था लानी है जिससे किसान को बिचौलियों से मुक्ति मिल सके और किसान अपना उत्पाद खुले बाजार में बेच सके। किसानों को मंडी शुल्क नहीं देना होगा, बिचौलियों को कमीशन नहीं देना होगा, सरकार के अनुसार खुले बाजार में किसान को अच्छी कमाई हो सकेगी।

तीसरे कानून द्वारा कृषि उत्पाद के लिए निजी कम्पनियाँ या व्यक्ति किसानों के साथ संविदा किसानी या कांट्रैक्ट फार्मिंग के समझौते की व्यवस्था की गई है। खेत किसान की होगी किसानी कंपनी की होगी, उसे छूट होगी कि वह खेत में क्या उगायेगा।

देश के किसानों को ये कानून किसानी के विरोध में ही नहीं, कृषि संस्कृति को समाप्त करते हुए दीख पड़े। फलतः वे आंदोलित हो गए। आंदोलन का एक वर्ष तक चलना कुछ मायने रखता है।

हरित क्रांति से जब कृषि का उत्पादन बढ़ा तो यह आशंका भी बढ़ी कि व्यापारियों से किसान को उपज की कीमत कहीं कम न मिले इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा अस्तित्व में आया। व्यापारी जब समर्थन मूल्य पर नहीं लेते तो सरकार भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से किसान की उपज खरीदेगी। पिछले साठ साल से पंजाब में यह व्यवस्था बहुत ही कारगर रही।

युगों से भारत कृषि प्रधान देश रहा है। यह हमारे अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश के कृषि क्षेत्र की उत्पादन क्षमता कारपोरेट जगत के आँखों की किरकिरी बनी हुई है। आज देश में दो सौ मिलियन टन से अधिक चावल और गेहूं का उत्पादन हो रहा है, दो सौ मिलियन टन सब्जी, सौ मिलियन टन फल किसान अन्नदाता दे रहे हैं और खुद भूखे मर रहे हैं। शीर्ष कृषि आधारित उद्योग चाहे वे बीज के क्षेत्र के हों या फर्टिलाइजर के, या उपकरणों के या खाद्य सामग्री के, कुल तीन हजार कम्पनियाँ करोड़ों कमा रही हैं। लाभ की प्रतिशतता हजार में है। और किसान दीन हीन है।

आजादी के पहले के भारत का किसान अपनी पीढ़ी के लिए ऋण छोड़कर जाता था। क्या स्थिति परिवर्तित हो गई पिछले बीस वर्षों में लाखों करोड़ रूपये की ऋणमाफी का बोझ सरकार को ढोना पड़ा है इसके बाद भी बीस वर्षों में किसानो के आत्महत्या की संख्या डेढ़ लाख रही है। किसान की यह दशा देश से कुछ कहता रहा जिसकी बराबर अनसुनी की गई। ऐसी विकट परिस्थिति में किसान के व्यापक हित में किसान को समृद्ध बनाने के लिए राष्ट्रिय कृषि नीति बनाये जाने की आवश्यकता है। ये तीन कानून किसान के हित का कैसे संरक्षण करते हैं यह बड़ा प्रश्न है?

किसान के लिए आज किसानी इसलिए दुखदाई हो गई है की अच्छे फसल के लिए बीज, सिंचाई और खाद चाहिए जिससे खेती पर लागत बढ़ गई है ऐसी स्थिति में समर्थन मूल्य की व्यवस्था किसान का प्राण है, जो स्वामीनाथन कमेटी की संस्तुतियों के अनुसार लागत का डेढ़ गुना होना चाहिए। कुछ प्रांतो को छोड़कर देशभर के किसान न तो समर्थन मूल्य पाते हैं और न तो मंडियों तक पहुँच ही पाते हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक है की समर्थन मूल्य के लिए कड़े नियम बनाये जाएँ।

सरकार तो तीन नियमो के द्वारा वामन की तरह किसान के तीन लोकों को नाप कर कारपोरेट जगत की झोली में ही डालने जा रही थी। अनाज, दाल, तिलहन, जो जीवन के लिए बुनियादी रूप से आवश्यक हैं, उनके भण्डारण को निजी क्षेत्र को –अकूत भंडारण के अधिकार के साथ सौंप देना देश की आर्थिक व्यवस्था को चरमराने वाली थी। व्यापारी और कारपोरेट जगत वेलफेयर स्टेट नहीं होता। विश्व बाजार की नजर भी भारत के कृषि उत्पादों पर लगी हुयी है। खाद्य पदार्थो के बजाय कल ये उस कच्चे माल का उत्पादन करने लगे जो दुनिया के बाजार में मॅहगे दर पर खपत हो रहा है तो इसे कौन रोक पायेगा। ऐसी स्थिति में खाद्य पदार्थों का अकूत भण्डारण –उपभोक्ता को महंगे दर पर उपलब्ध हो पायेगा। क्या खाद्य पदार्थों के विक्रय का खुदरा मूल्य सरकार तय कर पाएगी? वर्त्तमान समस्या केवल किसानों की ही नहीं है, उपभोक्ता के भी चिन्तन का विषय रहा है।

इस संविदा किसानी से भारत के नील के खेती का इतिहास याद आ जाता है। भारत में सोलहवीं शताब्दी से पहले भी नील की खेती होती थी जिसकी खपत देशी बाजारों के साथ साथ विदेशी बाजारों में भी होती थी। ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत आकर संविदा किसानी के माध्यम से सबसे पहले नील की खेती को अपने कब्जे में लिया और इसका संवर्धन किया भारतीय इतिहास की यह कारुणिक गाथा है जिसने भारतीय किसानी को चौपट कर दिया।

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देश हित में यह आवश्यक है कि संसद में इन तीन कानूनों के तीन विन्दुओं –न्यूनतम समर्थन मूल्य, निजी क्षेत्र द्वारा अकूत भण्डारणके साथ विक्रय का खुदरा मूल्य तथा सविदा किसानी के विभिन्न प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष पहलुओं पर किसानो, अर्थशास्त्रियों की भावनाओं विचारों के परिप्रेक्ष में व्यापक गंभीर विचार विमर्श किया जाए।

माननीय संसद को एक विशेषज्ञ समिति भी इन तीन कानूनों के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय स्वदेशी कृषि नीति के बारे में गठित करना चाहिए। किसानों की दशा को सुधारने और कृषि जगत को कारपोरेटीकरण से बचाने के लिए स्वावलम्बी स्वदेशी कृषि नीति की आवश्यकता है जिसमे स्थानीय स्तर ग्रामपंचायत या ब्लाक स्तर पर बीज, खाद, सिंचाई के साथ साथ भण्डारण, विनिमय तथा वितरण सुलभ हो। स्थानीय स्तर पर ही कृषि आधारित लघु कुटीर उद्योग स्थापित किये जाएँ।

एक उदाहरण कच्चे घानी तेल के उत्पादन का लिया जा सकता है। कृषि जगत के लिए अभिशाप बन रहे बैलों से पेराई का कार्य व्यापक रूप से लिया जा सकता है। ऐसे अन्यान्य कृषि आधारित लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर एक ओर किसान को समृद्ध किया जा सकता है तो दूसरी ओर शोषण से मुक्ति के साथ बेरोजगारों को रोजगार मुहैय्या कराया जा सकता है। देश की कृषि संस्कृति की रक्षा स्वावलम्बी किसानी के लिए राष्ट्रीय स्वदेशी कृषि नीति प्रख्यापित करके ही की जा सकती है।

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