त्याग जीवन का मूल तत्व

आज का वेद चिंतन विचार

त्याग
प्रस्तुति : रमेश भैया

संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद अंश पढ़ते हुए कहते हैं कि

ईशावास्यम इदम् सर्वं यत किंचित जगत्याम जगत् तेन त्यकतेन भुनजीथा: मा गृद्: कस्यस्विद् धनम्*।।

*ईशावास्य इदं सर्वम* –

इस दुनिया में जो कुछ जीवन है, वह सब परमेश्वर का निवासस्थान है। सारी दुनिया में परमेश्वर ही वास करता है।

*तेन त्यक्तेन भुंजीथा*-

इसलिए तू उसके नाम से त्याग करके भोग कर। त्याग जीवन का मूल तत्व है।

शरीर के के लिए कुछ थोड़ा- सा भोग आवश्यक है, इसलिए भोग करना पड़ता है। परंतु प्रथम त्याग।

हम आज जो खाते हैं, उस पर दुनिया की वासना चिपकी रहती है। इसलिए पहले देना चाहिए और पीछे खाना चाहिए।

जो दूसरों को देकर खाता है, उसके लिए सारी दुनिया के आशीर्वाद मौजूद हैं। जो देकर खाएगा, वह धर्मनिष्ठ तो होगा ही, शक्तिवान और वीर्यवान भी बनेगा।

जिसके पास संपत्ति है, उसे समझना चाहिए कि मैं उसका ट्रस्टी संरक्षक हूँ, मालिक नहीं।

जैसे हवा, प्रकाश का कोई मालिक नहीं हो सकता, वैसे संपत्ति का भी कोई मालिक नहीं हो सकता, वैसे संपत्ति का भी कोई मालिक नहीं है।

सम्पति किसी के पास विशेष मात्रा में आ पहुंची है, पर वह उसके अकेले के श्रम से पैदा नहीं हुई है।

संपत्ति सामूहिक होती है, व्यक्ति निमित्त् मात्र बनता है। उसके पास संपत्ति सबके लिए आती है।

पिता के पास तनख़्वाह आती है तो वह महसूस करता है कि वह मेरे अकेले के श्रम से नहीं आई है, न अकेले के लिए आयी है।

सबके सहकार से जीवन में आनंद आता है और इसलिए वह काम कर सकता है। इसलिए उस संपत्ति पर परिवार का हक भी है।

वैसे ही सोचने पर ध्यान में आएगा कि यह सारी संपत्ति समाज की है। हम तो केवल उसके संरक्षक हैं और एक हिस्सा भर अपने लिए खर्च कर सकते हैं।

तो एक अंश समाज को समर्पण करके बचे हुए का भोग भोगने का अधिकार मनुष्य को है, अन्यथा भोग भोगने का अधिकार दरिदृ को भी नहीं है।

हम त्याग करने में हिचकिचायेगें तो भोग न सधेगा। दरिद्र किसान है। घर में अत्यंत सुंदर बीज रखा है।

उस उत्तम से उत्तम बीज को वह सुरक्षित रखता है। खाने के लिए कम पड़ने पर भी वह उसे काम में नहीं लाता और खेतों में छिटक देता है।

वह यह त्याग इसलिए करता है कि समाज को अधिक से अधिक भोग सुलभ हो। इसलिए उसके त्याग का मूल्य है।

त्याग का बोझ नहीं होना चाहिए। यदि मानव को त्याग का भार मालूम पड़े तो वह त्याग ही नहीं रह जाता। वह त्याग तो मिथ्या त्याग है।

वास्तव में त्याग तो उस तरह होना चाहिए जिस तरह कि मां बच्चे के लिए करती है।

उसे उस त्याग से बड़ा ही आनंद मिलता है, तनिक भी थकान महसूस नहीं होती। यह खुद को त्यागी मानती भी नहीं है।

वह कहती है, मैं त्यागी कैसे बन गई! मैं तो बच्चे की सेवा करती हूं, इससे मुझे आनंद होता है।

जिस तरह माता पुत्र के प्रति वात्सल्य रखती है, उसी तरह समाज के वात्सल्य या करुणा के लिए त्याग किया जाए।

support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

five × 2 =

Related Articles

Back to top button