ब्लैक फंगस का ईलाज भी आयुर्वेद में संभव है

कोविड प्रबंधन में चमत्कारिक परिणाम

डा आर अचल
डा आर अचल

कोरोना से उबरे लोगो ब्लैक फंगस के दुष्चक्र में फँस रहे हैं ।इसकी गंभीर स्थिति में आँख भी गवाँने का खतरा है।हिमाचल एवं उत्तर प्रदेश में इसे एक साल के लिए महामारी घोषित कर दिया है। तेलंगाना व आन्ध्र प्रदेश,महाराष्ट्र सरकारो ने ब्लैक फंगस की लड़ाई में आयुर्वेद को भी शामिल कर लिया ।

इसकी भयावहता कोरोना की ही तरह फैलती जा रही है। इसे डाक्टरी भाषा में म्यूकोरमाईकोशिस कहा जा रहा है, हाँलाकि यह कोई नयी बीमारी नहीं है,यह सुगर को रोगियों को पहले से संक्रमित करता रहा है।परन्तु इस समय कोरोना चिकित्सा प्रबंधन में आक्सीजन सपोर्ट वाले रोगियों में पाया जा रहा है।जिसका कारण अभी स्पष्ट रूप से नहीं पता चला है।

कुल लोगों का विचार है कि आधिक समय तक आक्सीजन लगने के कारण नाक,मुँह के आस-पास नमी के कारण हो रहा है।कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि स्टेरायड दवाओं के अघिक प्रयोग के कारण भी म्यूकोर्माइकोशिस हो सकता है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने एक एडवाइजरी जारी की है।

आईसीएमआर की एडवाइजरी के मुताबिक यह एक खतरनाक फंगल इंफेक्शन है, जो आमतौर पर डायबिटीज के रोगियों में पाया जाता है। जिन लोगों का शुगर कंट्रोल में नहीं है और वह कोरोना से संक्रमित हो जाएं, तो यह इंफेक्शन होने का खतरा काफी बढ़ जाता है । इसके इंफेक्शन के प्रमुख लक्षणो में सिरदर्द, बुखार और आंखों के नीचे दर्द होना हैं। इसके अलावा नाक और साइनस में जकड़न होना और आंशिक रूप से दिखाई न देना भी इस इन्फेक्शन के लक्षण हो सकते हैं।अभी तक इसकी चिकित्सा भी कोविड की ही  तरह उलझी हुई है। इस स्थिति में तेलंगाना के आयुर्वेद चिकित्सकों ने ब्लैक फंगल संक्रमण के इलाज का दावा किया है,जिसे सरकार ने भी इजाजत दे दी है।

आयुर्वेद के आनुसार जब रोग के विषय में ठीक से ज्ञान न हो पाये तो दोष व लक्षणों की चिकित्सा की जाती है। इसी सूत्र पर आयुर्वेद चिकित्सकों ने कोविड प्रबंधन में चमत्कारिक परिणाम दिया है।इसके अनुसार ब्लैक फंगस कफ-पित्त दोष के कारण यह इसका संक्रमण हो सकता है।इसकी चिकित्सा के लिए आयुर्वेद अनेक दवायें है । मुख-नाक के घाव,संक्रमण में प्रभावी दवाओं में आरोग्यवर्धिनी, रसमाणिक्य, स्वर्णबंग,प्रवाल पिष्टी,सूतशेखररस,कामदुग्धा रस,गंधक रसायन,रससिंदूर, चोपचिन्यादि चूर्ण,नीम्बादि चूर्ण,पंचतिक्त घृत गुगुलु  तथा वाह्य प्रयोग के लिए इरिमेदादि तैल,जात्यादि तैल,खादिराधि बटी आदि है। इनके  प्रयोग से इस संक्रमण की चिकित्सा संभव है। ये सभी दवायें चिकित्सक परामर्श से ही ली जा सकती है। 

डा आर अचल , देवरिया में आयुर्वेद के प्रैक्टिशनर हैं.

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