भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा 

डा चंद्र्विजय चतुर्वेदी ,प्रयागराज

भरद्वाज मुनि के सम्बन्ध में बाबा तुलसी ने मानस में लिखा –भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा ,तिनहिं रामपद अति अनुरागा |तापस सम दम दया निधाना ,परमारथ पथ परम सुजाना ||अर्थात ,भरद्वाज मुनि प्रयाग में रहते हैं ,उनका श्री रामचंद्र जी के चरणों में अधिक प्रेम है |

वे तपस्वी ,शांत स्वभाव ,इन्द्रियजित,,दयालु और परमार्थ के मार्ग में बड़े चतुर हैं |एक बार माघ मास में तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी तट पर भरद्वाज मुनि के आश्रम में बहुत सारे मुनियों के साथ भरद्वाज के गुरु महर्षि याज्ञवल्क पधारे |

भरद्वाज ऋषि के सम्मान में प्रयागराज में आयोजन

भरद्वाज मुनि ने याज्ञवल्क ऋषि के समक्ष अपना संशय प्रकट किया –रामु कवन प्रभु पूछऊँ तोही |याज्ञवल्क ऋषि ने जो रामकथा भरद्वाज मुनि को सुनाई  वही कथा मानस में बाबा तुलसी ने गाया |

वाल्मीकि रामायण और तुलसी के मानस दोनों में उल्लेख है कि राम वन जाते समय भरद्वाज आश्रम गए ,तथा भरत भीराम को वापस लाने के लिए जब चित्रकूट जा रहे थे तो प्रयाग में भरद्वाज मुनि के आश्रम में रुके थे |

वाल्मीकि रामायण में क्रौंच युगल में से नर पक्षी की निषाद द्वारा ह्त्या किये जाने पर महर्षि वाल्मीकि को जो शोक हुआ और काव्य की जो धारा फूटी —मा निषाद प्रतिष्ठाम त्वमगमः शाश्वतीह समाः ,यत क्रौन्च्मिथुनादेकमवाधिः काममोहितम |उसके साक्षी महर्षि वाल्मीकि के शिष्य भरद्वाज मुनि भी रहे |योगवशिष्ठ के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने सर्वप्रथम रामायण की कथा भरद्वाज मुनि की पत्नी पैठनसी  को ही सुनाई थी | वाल्मीकि रामायण में अयोध्याकाण्ड सर्ग 89श्लोक 23 में भरद्वाज मुनि को देव पुरोहित से संबोधित किया गया है |

श्रुति -स्मृति- पुराण में भारद्वाज मुनि का सन्दर्भ मिलता है |अंगिरस वंशीय वृहस्पति अंगिरस के पुत्र –भारद्वाज मुनि वैदिक सुक्त्-दृष्टा थे जिन्हें ऋग्वेद के छठवें मंडल के अनेक सूक्तों के प्रणयन का श्रेय दिया जाता है |अथर्ववेद और ब्राह्मण ग्रंथों में भरद्वाज मुनि का उल्लेख मन्त्र दृष्टा ऋषि के रूप में मिलता है |

भरद्वाज मुनि के सम्बन्ध में बहुत सी कथाएं वायुपुराण ,मत्स्यपुराण ,विष्णुपुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में मिलती हैं जिनके मंथन से स्पष्ट होता है की अंगिरस पुत्र वृहस्पति वैशाली के मरुत राजा के पुरोहित थे |

वैशाली में ही भरद्वाज का जन्म हुआ इनका लालन पालन मरुत राजा ने ही किया |आगे चलकर भरद्वाज मुनि काशिराज सुदेव् पुत्र दिवोदास के पुरोहित बने |वायुपुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार सुविख्यात पुरुवंशीय सम्राट राजा दुष्यंत और शकुन्तला के यशस्वी पुत्र महाराज भरत जिससे भरत राजवंश की उत्पत्ति हुई और इसदेश का नाम भारतवर्ष पडा ,उनके कोई पुत्र नहीं था |वैशाली के मरुतने पुत्र के रूप में भरद्वाज को भरत को प्रदान कर दिया |

भरद्वाज पहले ब्राह्मण थे ,भरत के पुत्र होने के बाद क्षत्रिय कहलाये |दो पिताओं का पुत्र होने के कारण भरद्वाज को द्वयामुश्यायण भी कहा जाता है |मत्स्य पुराण और वायुपुराण में उल्लेख मिलता है कि भरत के मृत्योपरांत भरद्वाज ने राजपाट अपने पुत्र को सौंप कर वन चले गए |भरतवंश कई शाखा  में बंटकर समस्त उत्तर भारत पर राज्य किया |भरद्वाज जन्मना कर्मणा ब्राह्मण और क्षत्रिय रहे इसलिए भरत वंश में एक शाखा ब्राह्मण -क्षत्रिय मिश्रित रही जिसे उरुक्षय वंश कहा गया जिसमे महर्षि काप्य ,महर्षि सांकृति ,महर्षि गार्ग्य प्रसिद्द हैं |

महाभारत में एक ऋषि भरद्वाज का उल्लेख मिलता है जो उत्तर पांचाल के राजा पृषत के मित्र थे और कौरव पांडव के गुरु द्रोणाचार्य जिसके  पुत्र थे |इन भरद्वाज को भी अन्गिराकुलोत्पन्न बताया जाता है पर यह संशय है की ये वही भरद्वाज हैं जो त्रेतायुग में प्रयाग में बसते थे |

भारद्वाज के सूक्तों से विदित होता है की महर्षि भरद्वाज का सम्बन्ध पायु ,रजि,पेरुक जैसे मध्येशिया की जातियों से था | हिलेब्रांट ने अपनी पुस्तक वैदिक माइथोलोजी में उल्लेख किया है की सृन्जयों के साथ भी भरद्वाज संबद्ध थे |

विद्वानों का मत है किमहर्षि भरद्वाज ने प्रयाग त्रिवेणी तट पर गुरुकुल स्थापित कर इसे ज्ञान का केंद्र बनाया जहाँ भारत के बाहर से भी विद्याध्ययन के लिए जिज्ञासु आते रहे |

मन्त्रदृष्टा के साथ साथ ,महर्षि भरद्वाज , धर्मशास्त्रकार ,व्याकरण ,आयुर्वेद धनुर्वेद के मनीषी तथा  ,राजनीतिशास्त्र कार तथा वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्द रहे |

वायुपुराण के अनुसार उन्होंने आयुर्वेद संहिता आठ भागों में लिखी |यंत्र सर्वस्व ग्रन्थ में वैमानिकी का वर्णन है |मुंबई विश्वविद्यालय के ग्रंथालय में श्रौतसूत्र की एक पांडुलिपि है जो भरद्वाज  द्वारा लिखी कही जाती है |

भरद्वाज का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सात बार आया है राजनीतिशास्त्र विषयक ग्रन्थ –यशस्तिलक ग्रन्थ में भरद्वाज के राजनीति विषयक श्लोक उपलब्ध हैं |

भरद्वाज ऋषि ही ऐसे गोत्रकार ऋषि हैं जो  सभी वर्णों -ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र के विभिन्न आस्पद में गोत्र के रूप में मिलते हैं |भरद्वाज मुनि बसही प्रयागा जिन्हें रामपद अति अनुरागा |

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