आयुर्वेद की गरिमा और आदर लौटाना भारतवासियों की प्रथम जिम्मेदारी

मानव जीवनशैली का अनंत विज्ञान- आयुर्वेद, कहां से कहां आ गया !

 आयुर्वेद सदियों से मानव जीवन के स्वास्थ्य की रक्षा करता रहा है. आयुर्वेद ग्रंथों में निरोग और दीर्घजीवी  होने के मंत्र हैं. आयुर्वेद की भावना मुनाफ़ाख़ोरी के बजाय सेवा की है .  लेकिन हमारी शासन व्यवस्था  और नीति निर्माताओं का अपेक्षित सहयोग न मिलने से आज आयुर्वेद का पठन – पठन और चिकित्सा उपेक्षित है. इसीलिए कोरोना महामारी के दौरान आयुर्वेद चिकित्सा सर्व सुलभ नहीं हो सकी. पढ़ें जोधपुर निवासी सुप्रसिद्ध वैद्य ड़ा वेदप्रकाश त्यागी का विचारोत्तेजक लेख.

ड़ा वेदप्रकाश त्यागी
ड़ा वेद प्रकाश त्यागी, जोधपुर

ध्यान देने पर पता चलता है कि आयुर्वेद में सभी वेदों का सार भाग है और हमारे वेद मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन लिखे गए ज्ञान के साधन हैं | सब प्रकार के विज्ञान की धाराओं का प्रारंभिक स्रोत यह वेद ही हैं | जीवन शैली और स्वास्थ्य से संबंधित आयुर्वेद का उपवेद माना गया है आयुर्वेद को |

आयुर्वेद के सहारे हजारों वर्षों तक मानव जाति ने जीवन व स्वास्थ्य रक्षा की है | एक लंबा इतिहास गवाह है कि आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक भगवान धन्वंतरी द्वारा इसका ज्ञान उनके अनेक शिष्यों द्वारा प्रवाहित होता रहा है, वही आज हमारे सामने है | भारतवर्ष के संपूर्ण क्षेत्रफल तथा आसपास के अनेक देश व द्वीपों का इसमें उल्लेख है जहां आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक काशीराज धनवंतरी के शिष्य आचार्य सुश्रुत तथा भगवान आत्रेय के शिष्य आचार्य चरक, निरंतर अपने शिष्यों के साथ देश-विदेश की पदयात्रा करते हुए विभिन्न आंकड़ों को एकत्रित करते चले गए और अंततः सुश्रुत संहिता और चरक संहिता के रूप में जो ग्रंथ इन आचार्यों द्वारा लिखे गए थे आज हमारे सामने हैं |

अष्टांग हृदयम

उपरोक्त दोनों ग्रंथों के सार भाग को और भी सरल रूप में आचार्य वाग्भट ने अष्टांग आयुर्वेद के रूप में लिखा है जिसे हर कोई सरलता से समझ सकता है | आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांत, लंबे कालचक्र के बाद भी उतने ही प्रमाणिक और कारगर है जितने प्राचीन काल में थे, जब यह लिखे गए |

सुश्रुत संहिता

शल्य तंत्र के जनक कहे जाने वाले आचार्य सुश्रुत का नाम विश्व में बड़े आदर के साथ लिया जाता है क्योंकि इन्होंने सुश्रुत संहिता में विभिन्न शल्य कर्मों का, शस्त्रों, यंत्रों, शवच्छेदन विधि, शरीर तंत्र आदि का इतना सटीक और गहन वर्णन किया है कि जिसे आधार बनाकर मात्र 300-400 वर्ष पहले चिकित्सा विज्ञान में अनेक अनुसंधान हुए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान एवं शल्यक्रिया की विधियाँ पूर्णरूपेण आचार्य सुश्रुत की ही देन है |

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आयुर्वेद मूलतः आठ अंगों में विभाजित है- शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, बालरोग, भूत विद्या, अगद तंत्र, रसायन और वाजीकरण | परंतु आज के युग में आयुर्वेद को संपूर्ण चिकित्सा शास्त्र के रूप में आधुनिक विभाजन अनुसार कॉलेजों में पढ़ाया जाता है जैसे- Anatomy, Physiology, Surgery, ENT, Gynaecology, Pathology, Forensic and Pharmacology.

चरक संहिता

 कौन जिम्मेदार है इस अवनति के लिए ?

किंतु दुर्भाग्य से आज भारत में ज्यादातर आयुर्वेद के कॉलेज बेहद दयनीय स्थिति में कार्य कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप आयुर्वेद की दुर्दशा हो रही है मात्र कुछ ही निजी तथा सरकारी आयुर्वेद के कॉलेज को छोड़ दें तो अन्य सभी लोभ और स्वार्थवश ही कालेज खोले और चलाए जा रहे हैं | आयुर्वेद के शिक्षक जो चिकित्सक भी हैं, हमें देखने को मिलता है कि वह महाविद्यालय जाते ही नहीं है, मात्र प्रमाण पत्र जमा कराकर अपना नाम चला रहे हैं और दोगुना मुनाफा कमाने के लिए वे प्रैक्टिस भी करते हैं | यह कृत्य खुलेआम बिना किसी खेद के कई वर्षों से चल रहा है और सरकार द्वारा इसे रोकने के अनेकों विफल प्रयास किए जा चुके हैं |

किंतु दुर्भाग्य से आज भारत में ज्यादातर आयुर्वेद के कॉलेज बेहद दयनीय स्थिति में कार्य कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप आयुर्वेद की दुर्दशा हो रही है मात्र कुछ ही निजी तथा सरकारी आयुर्वेद के कॉलेज को छोड़ दें तो अन्य सभी लोभ और स्वार्थवश ही कालेज खोले और चलाए जा रहे हैं | आयुर्वेद के शिक्षक जो चिकित्सक भी हैं, हमें देखने को मिलता है कि वह महाविद्यालय जाते ही नहीं है, मात्र प्रमाण पत्र जमा कराकर अपना नाम चला रहे हैं और दोगुना मुनाफा कमाने के लिए वे प्रैक्टिस भी करते हैं | यह कृत्य खुलेआम बिना किसी खेद के कई वर्षों से चल रहा है और सरकार द्वारा इसे रोकने के अनेकों विफल प्रयास किए जा चुके हैं |

आयुष मंत्रालय को किसी विश्वसनीय संगठन को यह कार्य सौंप देना चाहिए जो स्थानिक एवं प्रांतीय स्तर पर  निष्पक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करें, तभी उस कॉलेज की मान्यता निर्धारित की जाए | आज के युग में कम ही लोग ऐसे मिलेंगे जो अपनी पूर्ण सामर्थ्य व निष्ठा से कार्य करते हैं अन्यथा जहां देखो सभी खानापूर्ति करने में ही लगे हैं कि बस नौकरी पूरी हो जाए | समाज को यशस्वी चिकित्सक देना प्राथमिकता होनी चाहिए, तभी आयुर्वेद का सम्मान वापस लौटकर आएगा | यह समय है पुनः एकजुट होकर बेहतर कल और बेहतर भारत बनाने का, अतः जिम्मेदारी मात्र सरकार की नहीं स्वयं हम सब की है I 

 भूतकाल में आयुर्वेद की अवनति के चाहे जो भी कारण रहे हो ( जैसे- नालंदा विश्वविद्यालय जहां भारत के अनगिनत अभिलेख रखे थे वह बख्तियार खिलजी द्वारा जलाकर नष्ट कर दिए गए इसमें लगभग 9 मिलीयन पुस्तकें और अभिलेख शामिल हैं I समय-समय पर मुगल तथा अंग्रेज शासकों द्वारा भारतीय विज्ञान और परंपराओं को दबा दिया गया ) परंतु इसे अपनी गरिमा और आदर लौटाना यह भारत वासियों की प्रथम जिम्मेदारी है |

ध्यान देने की बात यह है कि क्या हमारे आयुर्वेदिक कालेजों और अस्पतालों में संसाधनों में तो कोई कमी नहीं जो उत्कृष्ट कोटि के अध्ययन और अध्यापन में आवश्यक हैं ? बात जब उत्कृष्टता की होती है तब स्वार्थ का नामोनिशान नहीं होता | अतः आयुर्वेद के कॉलेज मात्र वे ही लोग खोलें जो ज्ञान की उत्कृष्टता को महत्व देते हैं, भारतवर्ष को फिर से विश्व गुरु के रूप में देखना चाहते हैं अन्य और कोई आयुर्वेद के कॉलेज खोलने का प्रयास ना करें |

 आयुष मंत्रालय ध्यान दे

  1. न्यूनतम मानक से कम पर किसी सरकारी या निजी कॉलेज को मान्यता ना दी जाए I 
  2. मंत्रालय द्वारा कर्मचारी /इंस्पेक्टर/ मैनेजमेंट के लिए गलत रिपोर्ट या सूचना देने पर दंड का प्रावधान किया जाए I
  3. सरकारी सेटअप हेतु और अधिक फंड की तैयारी रखी जाए |
  4.  कॉलेजों में शुल्क को एक जैसा रखकर मॉनिटर किया जाए कि कोई ज्यादा शुल्क तो नहीं वसूल रहा I
  5. पिछले वर्षों की मान्यता के आधार पर 5 स्टार रेटिंग के साथ कॉलेजों की लिस्ट मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए जिससे अभिभावकों को बेहतर कॉलेज देखने में सुविधा हो I
  6. वरिष्ठ प्रोफेसर को प्राचार्य ना बनाकर एडवाइजर बनाया जाए तथा शिक्षकों में से ही युवा, समझदार, समर्पित एवं क्लीनिकल व्यक्ति को प्राचार्य का पद दिया जाए, जिससे कॉलेज व चिकित्सालय की भरपूर उन्नति हो सके और घोटाले ना हो सकें | कागजों पर उन्नति, उन्नति नहीं कही जा सकती | 
  7. कोर्ट से पहले ही, मंत्रालय को केव्यॅट ले कर रखना होगा जिससे कोई भी कॉलेज बिना मान्यता के कोर्ट से सीधे अनुमति लेकर नए बैच का दाखिला न ले सके | 

CENTRAL COUNCIL FOR INDIAN MEDICINE सी.सी.आई.एम में अध्यक्ष पद पर मेरे रहते, चाहे सिलेबस हो, शिक्षकों की कमी हो, परीक्षाओं में त्रुटि हो, या और कोई तकनीकी कमी, मैंने छात्रों की एक शिकायत पर त्वरित कॉलेज का निरीक्षण करवाकर तथ्यों को मालूम किया और जिन कॉलेजों में कमी पाई गई उनको मेरे कार्यकाल में मान्यता के लिए भारत सरकार को अनुशंसा के लिए नहीं भेजा गया, परंतु मेरे हटते ही उन्हें मान्यता दे दी गई | इस अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है ?

CENTRAL COUNCIL FOR INDIAN MEDICINE सी.सी.आई.एम में अध्यक्ष पद पर मेरे रहते, चाहे सिलेबस हो, शिक्षकों की कमी हो, परीक्षाओं में त्रुटि हो, या और कोई तकनीकी कमी, मैंने छात्रों की एक शिकायत पर त्वरित कॉलेज का निरीक्षण करवाकर तथ्यों को मालूम किया और जिन कॉलेजों में कमी पाई गई उनको मेरे कार्यकाल में मान्यता के लिए भारत सरकार को अनुशंसा के लिए नहीं भेजा गया, परंतु मेरे हटते ही उन्हें मान्यता दे दी गई | इस अवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है ?

आयुर्वेद को पुनर्स्थापित करने के लिए आप सभी शुभचिंतकों और आयुर्वेद के छात्र-छात्राओं के सहयोग की आवश्यकता है I जो भी व्यक्ति, डाक्टर वैद्य अथवा आयुर्वेद के छात्र-छात्राएं इसके लिए आगे बढ़कर सहयोग करना चाहते हैं वह मुझे सीधे मेरे ईमेल आईडी पर सूचित करें:

 dr.vptyagi@gmail.com I

आपका सहयोग आयुर्वेद को फिर से गरिमामयी बना सकता है I आपकी प्रतिक्रिया पर उक्त कॉलेज निरंतर निगरानी में रखा जा सकता है | सख्त नियमों के कारण कॉलेज का मैनेजमेंट, ऑन-पेपर शिक्षक तथा छात्र भी निर्धारित दंड के भागी होंगे I इसी प्रकार बिगड़ी हुई आयुर्वेद की तस्वीर को पुनः सुधारा जा सकता है |

ड़ा वेद प्रकाश त्यागी, जोधपुर

(पूर्व सी.सी.आई.एम अध्यक्ष) 

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