भारत में आयुर्वेद का शोर और सच

बीएचयू आयुर्वेद अस्पताल पूरे कोविड काल में लाकडाउन का शिकार रहा

डा आर अचल
डा आर अचल

आयुष की छह विधाओं में सबसे अधिक चर्चा आयुर्वेद की होती है।इसधर कुछ वर्षो में यह माना जा रहा है कि आयुर्वेद लोक प्रिय हो रहा है,विस्तार पा रहा है।यह भी माना जा रहा है कि आयुर्वेद के काढ़े पीकर देश 75 % लोग कोरोना से बच गये है।उस काढ़े का फार्मुला सीधे आयुष मंत्रालय की साईट पर उपलब्ध है। ये बाते सोलह आने सच है।परन्तु इसके साथ यह भी एक सच है कि आयुर्वेद चिकित्सकों एवं संस्थानों भूमिका इसमें नगण्य सी रही । आयुर्वेद का विस्तार सेल्फ मेडिकेशन के रूप मे हुआ है।एक दवा बनाने वाली कम्पनी कोरोना जैसे संवेदनशील महामारी की दवा बनाती है,उसे मंत्रियों की उपस्थिति में सीधे पब्लिक के लिए टेलीविजन पर लांच कर देती है।विरोध विवाद के बीज कोरियर द्वारा दवाई कोरोड़ो परिवारों में पहुँच जाती है।इस दवाई के सेवन के लिए वैद्य या आयुर्वेदिक चिकित्सक की कोई जरूरत नहीं है।ऐसा टेलीविजन पर आम बात है,रोज गैस,लीवर,स्त्रीरोग,गठिया,वात,बवासीर,पौरुषवर्धक आदि की गारंटी वाली दवायें अखबारों,  टेलीविजन पर दिख जाती है।

इससे आधुनिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सको एवं जनता के बीच यह संदेश जाता है,आयुर्वेद पब्लिक मेडिकेशन है,इसके लिए क्या डाक्टर से मिलना ?इसका परिणाम यह भी होता है,कि कई साल तैयारी के बाद 5 साल का बीएएमएस करके प्रेक्टिश करने वाला युवक मजबूर होकर एलोपैथिक नर्सिग होम में 20 हजार की नौकरी करते हैं या अंग्रेजी दवाओं से प्रेक्टिश करने लगते है।शायद इसी लिए एलोपैथी संगठन आयर्वेद को आभासी विज्ञान कहने का दुस्साहस कर बैठता है। इससे स्थिति यहाँ तक देखने को मिलती है,कि बहुत से लोग यह भी नहीं जानते कि आयुर्वेद के मेडिकल कालेज भी होते है,जिसमें पढ़ने के लिए नीट का एक्जाम पास करना पढ़ता है,जहाँ बीएएमएस,एमडी,एमएस,पीएचडी की डिग्री भी होती है,जिसे लेने में 8 से 12 साल लगते है।

ये स्थितियाँ सरकार की नीतियों के कारण उत्पन्न हुई है।हमारे जनप्रतिनिधि मंचों या संसद मे आयुर्वेद का गुणगान करते हुए थकते नहीं है,पर बीमार होने पर कभी भी आयुर्वेद चिकित्सक या संस्थान मे नहीं जाते है।आयुर्वेद दवाओं का जनता में प्रचार का कार्य खुद सरकार ही करने लगती है।आयुष मंत्रालय के ट्वीट भी दवाओं के बारे आ जाते है।कम्पनियों द्वारा दवाओं के प्रचार पर कोई लगाम नहीं है।

अभी कोराना के लिए इम्यूनिटी बढ़ने वाले उत्पादों की भरमार हो गयी है।जिसके अधिक सेवन बहुत सारे लोगो को समस्यायें भी उत्पन्न हुई है।हालाँकि मंत्रालय द्वारा प्रोटोकाल जारी करने के बाद कुछ चिकित्सकों ने कोविड संक्रमितों का सफल चिकित्सा प्रबंधन भी किया है, फिर भी कालेजों , अस्पतालों में चिकित्सा नहीं शुरु गयी है।यदि शुरु हुआ होता तो वास्तव ने जनता में आयुर्वेद चिकित्सकों के प्रति विश्वास बढ़ता जो आयुर्वेद का वास्तविक विकास व  विस्तार होता ।

इसके लिए पूरे देश के प्रोफेसर्स,चिकित्स्कों ने सरकार को अपना प्रोटोकाल भेज चिकित्सा की इजाजत भी माँगी पर नहीं मिल सका . फिलहाल निजी सत्तर पर अपने परिचितों को चिकित्सा लोग देते रहे ।मीडिया में बहस चलती रही, इसमे एक छौका लग गया एक पब्लिक मार्केटिग वाली आयुर्वेद कम्पनी के नायक ने एलोपैथी सिस्टम पर सवाल उठाकर एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का मिडिया को मसाला दे दिया ।

मीडिया ने आयुर्वेद का पक्ष रखने वाले नाम लोगो कों पकड़ कर खूब उल्टे सीधे बयान दिलवाये। ई टी वी की बहस में बीएचयू के आयुर्वेद संकाय जैसे शिखर संस्थान के नान आयुर्वेदिक डीन का बयान देखा जा सकता है जिसमें वह कह रहे है कि कोविड की चिकित्सा मे आयुर्वेद की मात्र 10 प्रतिशत भूमिका है.

मीडिया ने आयुर्वेद का पक्ष रखने वाले नाम लोगो कों पकड़ कर खूब उल्टे सीधे बयान दिलवाये। ई टी वी की बहस में बीएचयू के आयुर्वेद संकाय जैसे शिखर संस्थान के नान आयुर्वेदिक डीन का बयान देखा जा सकता है जिसमें वह कह रहे है कि कोविड की चिकित्सा मे आयुर्वेद की मात्र 10 प्रतिशत भूमिका है.

बीएचयू के इस आयुर्वेद संकाय का समृद्ध अस्पताल पूरे कोविड काल में लाकडाउन का शिकार रहा है. इसके चिकित्सकों से सरकार एलोपैथिक प्रोटोकाल के अनुसार कोविड अस्पतालों में चिकित्सा करवा रही थी ।फिर कैसे पता चलेगा कि आयुर्वेद कितना प्रभावी है।यदि एलोपैथिक दवाओं का प्रयोग हो सकता है तो आयुर्वेद की लाक्षणिक दवाओं का प्रयोग क्यों नही हो सकता है ?

यह यक्ष प्रश्न किसी ने नहीं उठाया । कुल लब्बो लुआब यह कि आयुर्वेद के इस विकृत विस्तार में आयुर्वेद  की डिग्री व संस्थानों की कोई जरूरत नहीं दिखती है, केवल एक मंत्रालय की वेबसाइट,कुछ मठ,कुछ दवा निर्माता कम्पनियाँ पर्याप्त है। आयुर्वेद के अस्पतालों और प्रशिक्षित डाक्टरों/ वैद्यों की ज़रूरत नही समझी जा रही है. आयुर्वेद के शोर और सच में यही फर्क है।

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